अतुल कनक
राजस्थान के कोटा शहर को उसके कोचिंग संस्थानों की चमकदार सफलता के लिए देश भर में पहचाना जाता है। हर साल लाखों बच्चे अपनी आंखों में सुनहरे भविष्य का सपना लिए इस शहर में आते हैं। कोटा पिछले दिनों एक बार फिर चर्चा का विषय बना। लेकिन अपने कोचिंग संस्थानों की नहीं, बल्कि यहां के एक सरकारी अस्पताल में एक महीने में सौ से अधिक नवजात बच्चों के मरने वजह से। यह आंकड़ा संवेदनशील नागरिकों को परेशान करता है। लेकिन जब यह पता चलता है कि देश में हर घंटे औसतन पांच नवजात मर जाते हैं, तो यही परेशानी चिंता में बदल जाती है। जो समाज अपने नौनिहालों को स्वस्थ जीवन का अधिकार तक नहीं दे सकता, वह आखिर सुनहरे भविष्य के सपने कैसे देख सकता है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि अगर जन्म के बाद बच्चे बचते भी हैं, तो उनमें से कई कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।
मगर बच्चों के लिए जीवन का संघर्ष जन्म के बाद बचे रहने या कुपोषण की चुनौतियों का सामना करने तक ही सीमित नहीं रहता। हम जितने सभ्य होने का दावा करते हैं, बच्चों के लिए दुविधाएं उतनी ही बढ़ती जा रही हैं। दो बरस पुरानी बात है। राजस्थान के ही बूंदी जिले के हरिपुरा गांव में एक छह वर्षीय बालिका जीवन में पहली बार स्कूल गई थी। प्रार्थना सभा में उसका पांव अनजाने में पास ही पड़े टिटहरी के अंडे पर चला गया। लोकमान्यता टिटहरी के अंडों के फूटने को अच्छा नहीं मानती। गांव वालों ने जब सुना कि उस बच्ची का पांव पड़ने से टिटहरी के अंडे फूट गए हैं, तो पंचायत जुड़ी और दस दिनों तक बच्ची को घर से बाहर एक बाड़े में रहने का फरमान सुना दिया गया।
मामला जब सामने आया तो हंगामा हुआ। तमाम एजेंसियां भी हरकत में आर्इं। लेकिन बच्चों के साथ जिम्मेदार लोगों की ज्यादतियों का यह पहला उदाहरण नहीं है और इसीलिए अगर समाज बच्चों को सुरक्षा का माहौल देना चाहता है, तो उसे अपनी संवेदनाओं के प्रति ईमानदार होना होगा। इस घटना के कुछ दिनों पूर्व राजस्थान के ही उदयपुर जिले के एक गांव में एक स्कूल का पोषाहार सिर्फ इसलिए फेंक दिया गया, क्योंकि उसे एक दलित वर्ग की बालिका ने छू लिया था। यह असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी अगर समाज के दलित और उपेक्षित वर्ग के बच्चों को इस तरह के व्यवहार का सामना करना पड़ता है, तो लोकतंत्र स्वयं पर शर्मिंदा होता है। भारतीय चेतना बच्चों के प्रति अतिरिक्त रूप से संवेदनशील होने का दावा करती है, लेकिन जो घटनाएं खबरों के माध्यम से बार-बार हमारे सामने आती हैं, उन्हें जान कर सचमुच कलेजा कांप उठता है। कुछ समय पहले यह खबर भी सामने आइ थी कि दिल्ली के एक महंगे स्कूल में छह छात्राओं को सिर्फ इसलिए स्कूल के तहखाने में बंद कर दिया गया, क्योंकि उनके अभिभावकों ने फीस चुकाने में कुछ विलंब कर दिया था।
कथित धमर्गुरुओं द्वारा अपनी मासूम शिष्याओं के साथ अवांछित बर्ताव की तो कई शिकायतें पिछले दिनों सामने आई हैं, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक आदमी का अपनी पत्नी से झगड़ा हो गया, तो उसने अपने मासूम बेटे का कत्ल कर दिया। मानो घर, परिवार, स्कूल, आश्रम, देवालय से लेकर पंचायतों तक मासूम बच्चे किसी वहशियाना बर्ताव झेलने को अभिशप्त हैं। कुछ दिनों पहले यह सनसनीखेज बात भी सामने आई थी कि नर्मदा किनारे बसे कुछ गांवों में बेटियों को जन्म के तुरंत बाद जीवित जलसमाधि दे दी जाती है। बेटों की इच्छा में भ्रूण में पल रही बेटियों को चोरी-छिपे मारे जाने की घटनाएं तो आम हैं, लेकिन जन्म ले चुकी बेटी को जीवित जलसमाधि दे देना क्रूरता के नए किस्से कहता है।
मगर मासूम बच्चे केवल अंधविश्वासों के शिकार नहीं होते। सयानों के लालच, परस्पर प्रपंच और संपत्ति के लिए किए जाने वाले षड्यंत्र भी उन्हें अपना शिकार बनाते हैं। पिछले साल आई एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन देश में नौ सौ से अधिक बच्चे यौन अपराधों के शिकार होते हैं। हालांकि इन बच्चों में समाज के उपेक्षित वर्ग के बच्चों की संख्या अधिक होती है, लेकिन मध्यवर्ग और उच्च वर्ग के बच्चों को भी कम खतरों का सामना नहीं करना पड़ता। कोई पारिवारिक दुश्मनी निकालने के लिए उनकी हत्या कर देता है, तो कोई फिरौती की लालसा में उनका अपहरण कर लेता है। असुरक्षा के इस माहौल ने मासूम बच्चों के व्यवहार को भी प्रभावित किया है। उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन शामिल हो गया है। अमेरिका सहित पश्चिम के कई देशों में तो यह भी हुआ है कि किसी बात पर परस्पर झगड़ा होने पर बच्चा हथियार लेकर स्कूल पहुंच गया। कुछ घटनाएं दुर्योग या तात्कालिक परिस्थितियों का परिणाम हो सकती हैं, लेकिन दुनिया भर के बच्चों के स्वभाव में बढ़ता चिड़चिड़ापन और उग्रता निश्चित रूप से हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
बच्चों में उग्रता को समझने के लिए उनके मन को समझना आवश्यक है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में एकल परिवारों की संख्या बढ़ी है। ऊपर से माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं। पुराने जमाने में भारत जैसे परंपरागत देशों में तो बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का और बच्चों को उनके व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक साहचर्य मिल जाया करता था, लेकिन अब परिवार की बढ़ती हुई जरूरतों ने अधिकांश बच्चों को एकाकीपन की अंधेरी गुफा में धकेल दिया है। यह एकाकीपन भी उन्हें अपराध का शिकार होने की परिस्थितियों की तरफ धकेल देता है। शातिर दिमाग लोग इस या उस बहाने बच्चों से निकटता स्थापित करके उनका अपहरण कर लेते हैं, उन्हें यौन कुंठाओं का शिकार बना देते हैं, उन्हें कुकृत्यों की ओर प्रवृत्त कर देते हैं या फिर अवैध तरीके से उन्हें बेच कर उन्हें भीख मांगने पर विवश कर देते हैं। हालांकि बच्चों से रोजगारपरक श्रम लेना अपराध है, लेकिन ऐसे बच्चों की संख्या कम नहीं है, जो हाड़ तोड़ मेहनत करके अपने परिवारों का पेट पाल रहे हैं।
एक लोकप्रिय फिल्मी गीत बच्चों के स्वभाव को रेखांकित करते हुए कहता है- ‘तन कोमल मन सुंदर है/ बच्चे बड़ों से बेहतर हैं/ झगड़ा जिसके साथ करें/ अगले पल ही बात करें/ इनका भोलापन मिलता है, सबसे बांह पसारे/ ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे।’ लेकिन बांह पसार कर अपने आत्मीयों से मिलने को आतुर बचपन अपने घर के आसपास ही अनेकानेक संकटों का सामना कर रहा है। महानगरों में तो कामकाजी माता-पिताओं के बच्चे क्रेच या घरेलू बाइयों के भरोसे होते हैं और इनके बुरे बर्ताव की खबरें आए दिन टेलीविजन के माध्यम से सामने आती रहती हैं। कुछ समय पहले एक चैनल पर खबर थी, जहां परिवार द्वारा बच्ची की देखरेख के लिए रखी गई स्त्री ने दिन में बच्ची के रोने से अपनी नींद में खलल पड़ने पर उस मासूम को इतनी बुरी तरह से उठा कर सोफे पर फेंका कि खबर देखने वालों की आत्मा सिहर गई। जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों के संवेदनशीनल मन की जरूरतों को समझें और इससे पहले कि उनका अकेलापन किसी उग्रता या उद्दंडता से ग्रसित हो, प्रेम की एक जादू भरी झप्पी के साथ उन्हें संस्कारित करें, क्योंकि बच्चों के प्रति निभाया गया यह दायित्व ही हमारे भविष्य को सुनहरा करेगा।
