आज हम जिन चुनौतियों को झेल रहे हैं, उन्हें हमने खुद पैदा किया है। हमने उद्योगों का ऐसा जाल बिछाया है, जो तात्कालिक सुविधा और दूरगामी बीमारी पैदा कर रहा है। हमने ऐसा ढांचागत निर्मित किया है, जिसमें ऊर्जा और पूंजी तो खूब लगती है, लेकिन वह दो-तीन प्रतिशत आबादी को आराम और बाकी को तकलीफ देता है। दिल्ली में 1998 में जब मेट्रो का शिलान्यास हुआ, तो कहा गया था कि अब शहर जाम-मुक्त होगा, प्रदूषण का नामोनिशान नहीं रहेगा, कारों पर लगाम लगेगी, कार-स्वामी मेट्रो से आया-जाया करेंगे, रोजगार में इजाफा होगा, आदि। अब दो दशक के बाद भी हम उसकी समीक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि अब हर दस लाख की आबादी वाले शहर को सरकार मेट्रोमय कर रही है।

हमने शहर को कारों और प्रदूषण आदि से बचाने के नाम पर मेट्रो बनाया। आज मेट्रो भी बढ़ रहा है और कारों की संख्या भी। लेकिन प्रदूषण की मार कम होने की बजाय नए-नए रूप में और गहराने लगी है। हमारी सरकार इस बीमारी का इलाज सम-विषम में ढ़ूढ़ते हुए अब आॅक्सीजन टॉवर लगाने की दिशा में बढ़ती दिख रही है। इससे शहर की बीमारियों का इलाज नहीं हो रहा है, बल्कि नए-नए रोग पैदा हो रहे हैं। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन की सुविधा देने वाले दिल्ली परिवहन निगम के बेड़े में ग्यारह हजार बसों की जरूरत है- यह आकलन दो दशक पहले हुआ था। इस लक्ष्य को किसी भी सरकार ने पूरा नहीं किया। आज दिल्ली में बसों की संख्या पांच हजार से भी कम है। परिवहन के मद का पूरा बजट मेट्रो में खप जाता है तथा बस-आधारित सार्वजनिक परिवहन की हालत बद से बदतर हो रही है। इसका शिकार यहां का कामकाजी वर्ग हो रहा है। दिल्ली में बस की यात्रा सस्ती है। यह गंतव्य-स्थल के करीब तक सुविधा देने वाली सवारी है। मेट्रो की सवारी महंगी है और यह खास दूरी तक ही सुविधा देती है।

हमारे शहरों की वास्तुकला महिला-विरोधी, वरिष्ठ नागरिक-विरोधी, बच्चों का बचपन छीनने वाली और गरीबों की दुश्मन है, क्योंकि हमारे शहर का पूरा तंत्र कार-स्वामियों और संपन्न लोगों के लिए है। यहां पैदल चलने वालों के लिए न जगह है, न इज्जत। साइकिल, साइकिल रिक्शा और सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने वाले लोग शहर के नागरिक नहीं, ‘घुसपैठिए’ हैं। इनके ही कर से बनाया जाने वाला शहर इन्हें ही वंचित कर रहा है। ये लोग ही प्रदूषण के शिकार हैं। ये छतविहीन लोग आवासहीन हैं और रोजगार-विहीन जीवन जीने को अभिशप्त हैं।

आज शहर की अवधारणा में परिवर्तन हो रहा है। अब आधुनिक शहर वह नहीं है, जो मेट्रो रेल और फ्लाइओवर बना रहा है। वह भी शहर आधुनिक नहीं है, जो शहरी गतिविधियों को अलग-अलग सेक्टर में बांट कर देख रहा है। आज तो आधुनिक और समावेशी शहर वह है, जो अपना खाना खुद पैदा करता है और अपने कचरे के निष्पादन की जिम्मेवारी भी स्वयं लेता है; जो अपने बच्चों के लिए खेल के मैदान बनाता है और अपने नागरिकों के लिए खुली सांस के लिए हरियाली उपजाता है; जो तकनीक और विज्ञान का इस्तेमाल हर तरह की गैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने के लिए करता है। शहरी खेती, पशुपालन और उससे जुड़ी हजारों गतिविधियां ऐसा शहर बनाने का नया मार्ग दिखाती हैं।

लेकिन हम उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। हमारा राजनीतिक तंत्र चिंतनहीन और विचारहीन हो गया है। यह अपनी सामुदायिक समझ को आधुनिक परिवेश में नवसृजित नहीं कर पा रहा है। ऐसी ही हालत हमारे बौद्धिक समूहों और परिवर्तनकारी जमातों की है। इसलिए हम पुराने और रूढ़िवादी विकास को आधुनिक मान कर ढोने को अभिशप्त हैं। हम जिन विचारधाराओं से प्रेरणा लेते हैं, अगर उनकी मौलिकता को आधुनिक कालखंड के अनुकूल ढाल पाने में असमर्थ रहे तो हमें विलुप्तीकरण के रास्ते पर जाने से कोई नहीं बचा पाएगा। आज गांधीवाद के प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और साम्यवाद के मानवीय गैर-बराबरी के सिद्धांतों को बदले हुए परिवेश के अनुसार चिंतनधारा विकसित करनी होगी। नई धारा के साथ नेतृत्व विकसित करना एक चुनौती-भरा उपक्रम है, जिसमें आज की चुनौतियों से लड़ने की ऊर्जा मिलेगी।