सियासी हथकंडा
ममता बनर्जी खांटी राजनीतिक हैं। दांव-पेंच खूब जानती हैं। अलग गोरखालंैड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चे को खूब सबक सिखा दिया। इसके नेता बिमल गुरुंग एक दौर में उनके प्रशंसक थे। लेकिन जून में उन्होंने दार्जिलिंग और आसपास के पर्वतीय इलाकों में अलग राज्य की मांग को लेकर बेमियादी आंदोलन शुरू किया तो पश्चिम बंगाल सरकार के लिए परेशानी बढ़नी ही थी। शुरू में तो ममता बनर्जी ने धैर्य से निपटने की रणनीति अपनाई पर आंदोलन गले की हड्डी बनता दिखा तो इलाके के क्षेत्रीय दलों की एकता को अपने पैंतरों से छिन्न-भिन्न कर दिया। तृणमूल कांग्रेस की सरकार पर दबाव बनाने की मंशा से गोरखा क्षेत्रीय अथारिटी (जीटीए) के मुखिया बिमल गुरुंग और पूरी 45 सदस्यीय समिति ने इस्तीफा दे दिया था।

राज्य सरकार को कब एक आइएएस बरुण राय के हवाले करनी पड़ी थी यह संस्था। इसके बाद क्षेत्रीय दलों को वार्ता के लिए कोलकाता बुलाया तो उनमें फूट पड़ गई। बिमल गुरुंग ने अपने कद्दावर साथियों विनय तमांग और अनिल थापा को पार्टी से निकाल दिया। लेकिन ममता ने इन दोनों को ताकतवर बना कर जनमुक्ति मोर्चे की सारी हेकड़ी निकाल दी है। जीटीए में नौ सदस्यीय प्रशासक बोर्ड को नामित कर इलाके के गोरखा लोगों को संदेश दिया है कि उनके विकास की राह में रोड़ा बनने का सरकार का कतई इरादा नहीं है। नौ सदस्यीय बोर्ड के मुखिया विनय तमांग होंगे और उपाध्यक्ष अनिल थापा। बाकी सदस्यों का चयन दूसरे क्षेत्रीय दलों से कर लिया है। इनमें गुरुंग की पार्टी के विधायक अमर सिंह राय भी हैं। इसी को कहते हैं कि विरोधियों में फूट डालो और राज करो।

यक्ष प्रश्न
गुजरात में पिछले दस साल से आयोजित हो रहा था गरीब कल्याण मेला। नरेंद्र मोदी ने अपने मुख्यमंत्री काल में 2009 में की थी इसकी शुरुआत। मेले में जगह-जगह जरूरतमंद गरीबों को सहायता और साजो-सामान का वितरण कराती थी राज्य सरकार। इस बार मेले की तारीखें तय हुई थी 20 से 22 सितंबर। लेकिन सरकार ने बिना कारण बताए टाल दिया यह दसवां गरीब कल्याण मेला। इससे मुख्यमंत्री विजय रुपाणी तो सवालों के घेरे में आए ही हैं, कांग्रेस को भी वार करने का मौका मिल गया है। दरअसल विधानसभा चुनाव में अब तीन महीने ही बचे हैं। अफसरों ने सरकार को सूचित कर दिया था कि दूसरी योजनाओं में व्यस्तता के चलते वे पुख्ता तैयारियां नहीं कर पाए इस मेले की।

लिहाजा इस साल फीका रह सकता है नरेंद्र मोदी का शुरू किया यह अभिनव मेला। सो, टालने में ही भलाई है। जानकार तो यहां तक कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी के गांधी नगर छोड़ने के बाद से गुजरात को अगर आनंदी बेन पटेल नहीं संभाल पाई थीं तो नाकाम रुपाणी भी हैं। ऊपर से हार्दिक पटेल अलग गुल खिला सकते हैं। यों भाजपा अभी गुजरात को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं है। उसे मालूम है कि विपक्ष बिखरा है। शंकर सिंह वाघेला अपना अलग मोर्चा बना कांग्रेस के वोटबैंक में सेंध लगाने की भाजपाई रणनीति पर चल रहे हैं। अफसरों ने तो यही कहा है कि स्वच्छ भारत मिशन, नर्मदा यात्रा, उज्ज्वला योजना और बाढ़ पीड़ितों के राहत शिविरों से ही अभी फुर्सत नहीं मिल पाई है उन्हें। ऐसे में मेला क्या खाक लगेगा। पर लोगों में तो खुसर-फुसर हो ही रही है। स्वाभाविक भी है क्योंकि दस साल में पहली बार रद्द हुआ है आयोजन।