चौदह साल की अपराजिता नौवीं कक्षा की छात्रा थी। वह बचपन से ही तीव्र बुद्धि की थी। सामान्य ज्ञान की बातों में तो वह बड़ों को भी छकाती थी। इसके अतिरिक्त उसे कंप्यूटर और शास्त्रीय नृत्य में भी रुचि थी। लेकिन, सांवली होने की वजह से उसके मन में कुछ लोगों ने यह हीनताबोध बिठा दिया था कि गोरे लोग ज्यादा सुंदर होते हैं। हालांकि, उसकी अध्यापिका अर्चना शर्मा उसे हमेशा प्रोत्साहित करती रहतीं और कहत्की रंग से कुछ नहीं होता। दुनिया में दो ही रंग काला या गोरा। कोई भी इंसान इन्हीं में से कुछ होगा। यह दो भौगौलिक वातावरण में रहने का नतीजा है।
अर्चना मैडम की बातों से अपराजिता को बहुत संबल मिलता था। उसे अपना नाम भी बहुत प्रिय था क्योंकि उसका अर्थ था कभी पराजित न होने वाला। वाकई अपराजिता थी भी अपने नाम के अनुरूप ही। अपराजिता की कक्षा में एक और लड़की रूपाली पढ़ती थी। रूपाली भी अपराजिता की तरह पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में आगे रहती थी, लेकिन दोनों में बहुत फर्क था। अपराजिता जहां अपने गुणों और प्रशंसा पर सामान्य रहती थी, वहीं रूपाली अपने गुणों पर बहुत गर्व करती थी। असल में वह खूब गोरी थी। उसे अपराजिता से ईर्ष्या भी होती थी। पढ़ाई में अपराजिता पहले स्थान पर रहती थी और रूपाली दूसरे स्थान पर।
जब रूपाली दूसरे स्थान पर आती थी तो उसे अपराजिता से बहुत जलन होती थी । रूपाली हमेशा अपराजिता को नीचे गिराने और उसे अपमानित करने के अवसर ढूंढ़ती रहती थी। एक दिन अपराजिता और रूपाली राज्य स्तर की सामान्य ज्ञान की प्रतियोगिता में भाग लेने प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचीं। प्रतियोगिता में निरीक्षक ने सभी प्रतियोगियों से उनके आवेदन पत्र और रोल नंबर मांगे। बस उसी समय रूपाली के मन में एक कुत्सित योजना ने सिर उठाया। उसने आवेदन पत्र में कुछ समझ न आने के कारण व रोल नंबर में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए अपराजिता से उसका आवेदन पत्र और रोल नंबर मांगा ।
अपराजिता ने अपना आवेदन पत्र भरकर रोल नंबर के साथ उसे पकड़ा दिया। वह काफी देर तक उसे लेकर भरने का और रोल नंबर जांचने करने का नाटक करती रही । इतने में ही निरीक्षक सबके आवेदन मांगने आए। जब वे अपराजिता के पास पहुंचे तो उसने रूपाली से अपना आवेदन पत्र मांगा। यह सुनकर रूपाली तुनक कर बोली, ‘मेरे पास तुम्हारा आवेदन पत्र कहां से आया? मेरे पास तो केवल मेरा है।’ अपराजिता के बहुत कहने पर वह निरीक्षक से बोली, ‘सर, यह रोल नंबर और आवेदन पत्र घर पर ही भूल आई है। इसने अभी कुछ देर पहले मुझसे यही कहा था ।’
रूपाली के झूठ पर अपराजिता हैरान रह गई। निरीक्षक को उसने हर तरह से सफाई दी, लेकिन उन्होंने उसे परीक्षा में नहीं बैठने दिया। अपराजिता परीक्षा में न बैठने पर रोने लगी और रूपाली उसको दुखी देखकर बहुत खुश हुई। दरअसल, रूपाली ने अपराजिता का पत्र और रोल नंबर अपनी शर्ट के अंदर छिपा लिया। उसे पता था कि निरीक्षक उसकी ऐसी जगह की चेकिंग नहीं करेंगे। इस प्रकार अपराजिता सामान्य ज्ञान की उस प्रतियोगिता में नहीं बैठ पाई। रूपाली होशियार तो थी ही इसलिए परिणाम आने पर वही विजेता चुनी गई। स्कूल में भी जब उसे विजेता का ताज पहनाया गया तो उसके दिल को यह जानकर बेहद सुकून मिला कि आज उसने अपराजिता को हरा दिया है।
उस दिन से अपराजिता और रूपाली में एक दूरी सी बन गई। स्कूल की परीक्षाएं शुरू हो गर्इं। एक दिन स्कूल बस कुछ दूरी पर खराब हो गई। उस दिन सभी बच्चों की परीक्षा थी इसलिए सब बस का ठीक होने का इंतजार करने की बजाय पैदल ही स्कूल को रवाना हो गए। वैसे भी स्कूल नजदीक ही था केवल मार्ग में एक बड़ी सी सड़क थी । उस सड़क पर वाहनों का आवागमन लगा रहता था। इसलिए कंडक्टर बारी-बारी से सब बच्चों को सड़क पार करा रहा था। अपराजिता और रूपाली भी लाइन में लगी हुई थीं। जैसे ही कंडक्टर रूपाली को सड़क पार कराने लगा वैसे ही बड़ी तेजी से एक कार आई और कंडक्टर और रूपाली को टक्कर मारते हुए निकल गई। यह देखकर सब हक्के-बक्के रह गए। अपराजिता ने सबसे पहले गाड़ी का नंबर नोट किया और फिर वह घटनास्थल पर रूपाली और कंडक्टर के पास पहुंची। दोनों ही जख्मी हो गए थे। उनके शरीर से खून रिस रहा था और वे कराह रहे थे। शीघ्र ही घटनास्थल पर भारी भीड़ जमा हो गई।
अपराजिता ने लोगों से निवेदन कर उन्हें शीघ्र ही अस्पताल पहुंचाया। अपराजिता भी उनके साथ बैठ गई। उसने उस सज्जन से मोबाइल फोन मांगकर स्कूल में और रूपाली और कंडक्टर के घरों में दुर्घटना की सूचना दी । सूचना पाते ही सब अस्पताल में पहुंच गए। होश में आने पर रूपाली ने स्कूल की प्रधानाचार्य, अपने माता-पिता और अपराजिता को अपने पास पाया। रूपाली अपराजिता को अपने पास देखकर बोली, ‘आज तो परीक्षा है न, फिर तुम यहां क्या कर रही हो ?’ जवाब अपराजिता के बजाय प्रधानाचार्या देते हुए बोली, ‘तुम ठीक कह रही हो रूपाली । आज अपराजिता के कारण ही तुम्हें चिकित्सा मिल पाई। अपराजिता ने अपनी परीक्षा से ज्यादा अपने स्कूल के सहयोगियों की जान की कीमत को अधिक अहम समझा। मैंने स्कूल की प्रबंधक समिति और शिक्षा के मुख्याधिकारी से बात कर ली है और उन्होंने तुम दोनंो को अगले हफ्ते आज की परीक्षा देने को कहा है।’
रूपाली हैरानी से अपराजिता को देखती रही और उससे माफी मांगते हुए गले लगाकर बोली, ‘अपराजिता, आखिर आज तुमने मेरे गलत कामों का जवाब दे ही दिया लेकिन मुझे नुकसान पहुंचा कर नहीं, मेरी रक्षा करके और मुझे भरपूर प्यार देकर। आज से मैं तुम्हें तो क्या किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाऊंगी।’ ०

