मनुष्य को एक संसाधन मानना उस सोच का केंद्र है, जिसे ‘नव-उदारवाद’ के नाम से जाना जाता है। यह नाम अनूदित है और भ्रामक है। ‘नव-उदारवाद’ एक उदार सोच कतई नहीं है, बल्कि गहन संकीर्णता का सामाजिक दर्शन है। यह दर्शन राज्य की कल्याणकारी भूमिका को नहीं मानता। इसलिए नव-उदारवादी सोच शिक्षा में पूंजी के निवेश और मुनाफे को सही ठहराता है। इस राह पर चलनेवाला शासन अपने कई अहम फैसलों को अनकहा छोड़ने के लिए बाध्य रहता है। इस बाध्यता का एक कारण यह भी है कि संविधान और नव-उदारवादी सोच में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को लेकर एक बुनियादी टकराव है।
भारत में पिछले तीन दशक में शिक्षा का निजीकरण तेज हुआ है, मगर राज्य सत्ता खुलेमंच से इसे स्वीकारने में कतराती है। तीस साल पहले बनी शिक्षा नीति को एक बार फिर से जांचा-परखा जा रहा है और नए संदर्भ में फिर से एक नई-नवेली नीति गढ़ने की तैयारी चल रही है। अगर नाम बदलकर पुरानी नीतियों यानी बाजारवाद को ही बढ़ावा देने के लिए सारी कवायद की जा रही है तो उसका नतीजा जनहित से कैसे जुड़ेगा? असल सवाल यह है हमें स्पष्ट नीति चाहिए या सिर्फ कागजों पर गढ़ा गया एक चमकीला दस्तावेज? इन सवालों से रूबरू हो रहे हैं कृष्ण कुमार।
पिछले सात सालों में मानव संसाधन मंत्रालय कुछ ज्यादा ही अस्थिर रहा है। कपिल सिब्बल 2009 में मानव संसाधन विकास मंत्री बने, पर लगभग साढ़े तीन साल बाद हटा दिए गए। पल्लम राजू डेढ़ साल मंत्री रह पाए। सरकार बदली तो स्मृति ईरानी मंत्री बनीं, पर वे भी दो साल बाद स्थानांतरित कर दी गर्इं और अब उनकी जगह प्रकाश जावडेकर रखे गए हैं, जो सात साल के भीतर इस पद पर नियुक्त होने वाले चौथे व्यक्ति हैं।
शिक्षा अन्य विभागों की तुलना में धीमी गति से चलती है, इसलिए उसके मंत्रालय की यह अस्थिरता हमारी जिज्ञासा का विषय होनी चाहिए। जरूर शिक्षा में कुछ ऐसा हो रहा है जिसे राज्य के ढांचे में संभालना मुश्किल बनता जा रहा है। एक नई शिक्षा नीति बनाने की शुरुआत स्मृति ईरानी ने की थी, पर नीति की रचना का काम पूरा होने से पहले ही उन्हें कपड़ा मंत्रालय भेज दिया गया है। अब नीति-निर्माण फिर चर्चा में है। अगर कोई दस्तावेज सचमुच में आता है तो वह तीस वर्ष पुरानी इस नीति का स्थान लेगा जो राजीव गांधी के शासन का में नरसिंह राव ने बनवाई थी। शिक्षा को ‘मानव संसाधन विकास’ के दायरे में रखा जाना भी उसी दौर की देन है। यह परिर्वतन सिर्फ शाब्दिक नहीं था। मनुष्य को एक संसाधन मानना उस सोच का केंद्र है, जिसे ‘नव-उदारवाद’ के नाम से जाना जाता है।
यह नाम अनूदित है और भ्रामक है। ‘नव-उदारवाद’ एक उदार सोच कतई नहीं है, बल्कि गहन संकीर्णता का सामाजिक दर्शन है। यह दर्शन राज्य की कल्याणकारी भूमिका को नहीं मानता। इसलिए नव-उदारवादी सोच शिक्षा में पूंजी के निवेश और मुनाफे को सही ठहराता है। इस राह पर चलनेवाला शासन अपने कई अहम फैसलों को अनकहा छोड़ने के लिए बाध्य रहता है। इस बाध्यता का एक कारण यह भी है कि संविधान और नव-उदारवादी सोच में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों को लेकर एक बुनियादी टकराव है। इधर के दशकों में स्वास्थ्य के मामले में यह टकराव काफी सिमट गया है और राज्य ने इस क्षेत्र में अपनी कई बड़ी जिम्मेदारियां पूंजी और बाजार की शक्तियों को सौंप दी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा खुलेआम करना और कहना अभी तक संकोच का विषय बना रहा है।
इस संकोच को समझना कुछ कठिन है, क्योंकि वास्तविक स्थिति लगातार बाजार के पक्ष में जाती रही है। निजी स्कूल, संस्थान और विश्वविद्यालय बढ़ते चले गए हैं। उनकी संख्या ही नहीं, लोकप्रियता भी बढ़ी है। दूसरी तरफ सरकारी शिक्षा संस्थाएं पैसे और शिक्षकों के अभाव में लगातार कमजोर होती चली गई हैं। फिर भी कोई स्पष्ट नहीं कहता कि यह संयोग या कोताही नहीं, नीति है। कोई ऐसा कह दे तो माना जाता है कि व्यंग्य कर रहा है। सरकारी लोग और दस्तावेज कतई नहीं जताते कि जो हो रहा है और साफ दिख रहा है, वह नीति के तहत हो रहा है। जो लोग प्रखर आलोचना के आदी है, वे इसे सोची-समझी साजिश बताते हैं।
अगर वे सही हैं तो उनसे पूछा जाना चाहिए कि यदि साजिश काफी सोच और समझ पर आधारित है तो उसे नीति का नाम क्यों न दिया जाए। शायद उनका उत्तर होगा कि नीति से यह अपेक्षा रहती है कि वह जनहित में होगी। यह उत्तर सही होगा और इस रहस्य का खुलासा कर देगा कि शिक्षा के क्षेत्र में निर्णयों की स्थापित दिशा देखकर भी लोग इसे नीति क्यों नहीं मानते। उत्तर से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि साजिश की सोच और शब्दावली अपनी उपयोगिता खो चुकी है।
यथार्थ का रोब और नीति की घिसट
जो नीति 1986 में बनी थी, कभी वापस नहीं ली गई। इस दृष्टि से वह आज भी लागू मानी जा सकती है। पर ऐसा, मानना व्यर्थ होगा। संसद की स्वीकृति मिलने के एक दशक ही वह घिसने लगी थी। उसे छह साल के भीतर समीक्षा और पुनर्पाठ की कवायद से गुजरना पड़ा था। इस प्रक्रिया का फल 1992 में ‘पीओए’ यानी ‘प्रोग्राम आॅफ एक्शन’ की शक्ल में प्रकाशित हुआ था। इस दस्तावेज में शिक्षा की जिम्मेदारियों को मुख्यत: राज्य के हाथों में रखने की कोशिश की गई थी। मगर यथार्थ का दबाव विपरीत दिशा पर पड़ रहा था। इस बात का स्पष्ट संदेश 2000 की बिड़ला-अंबानी रिपोर्ट और 2008 की ‘ज्ञान-अयोग’ रिपोर्ट देती है। दोनों की विशेषता थी कि उनकी रचना प्रधानमंत्री कार्यालय ने करवाई थी, मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नहीं। यह बात शिक्षा को लेकर केंद्र सरकार के भीतर रहे संकोच और द्वैध की द्योतक है।
दोनों का कारण पूंजी के निवेश को बढ़ाने के लिए अपनाई गई उदारीकरण की वृहत्तर नीति थी। यह नीति शिक्षा में किस तरह लागू हो, इस बात को लेकर ही द्वैध था। उसका एक ‘प्रत्यक्ष’ रूप नेताओं की टकराहट में प्रकट हुआ। नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व में मानव संसाधन मंत्रालय अर्जुन सिंह को मिला। वे उदारीकरण के समर्थक नहीं थे, पर उनका विरोध स्पष्ट अभिव्यक्ति नहीं पा सका। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व के पहले दौर में अर्जुन सिंह फिर से मानव संसाधन विकास मंत्री बने। इस दौर में राजनीतिक परिस्थिति का तकाजा था कि उदारीकरण और राज्य की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन दिखे। उदारीकरण और बाजारीकरण की दिशा कायम रही, पर साथ में कुछ कल्याणमुखी योजनाओं में सरकारी निवेश बढ़ा। शिक्षा को भी इस दोमुंही परिस्थिति का लाभ मिला। पर यूपीए के दूसरे दौर में यह संभावना भी जाती रही। शिक्षा को बाजार में लाने के सरकारी प्रयास तेज हो गए। यह प्रवृत्ति कई राज्यों में आगे बढ़ चुकी थी। उच्च शिक्षा, खासकर, मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई में प्रवेश से लेकर परीक्षा तक व्यापारीकरण का दबाव बढ़ता जा रहा था।
यथार्थ के इस दबाव के चलते 1986 की शिक्षा नीति घिसटने लगी थी। सरकारी शब्दावली इस घिसट को व्यक्त करने में असमर्थ बनी रही, पर एक उदारीकरण की वृहत्तर सोच और नीति का साया अबाध प्रगति कर रहा था। सरकारी बोध और अभिव्यक्ति के अंतर्विरोध तीखे होते जा रहे थे। उत्तर के राज्यों में शिक्षकों की नियुक्ति लगभग रुक चुकी थी और संस्थाई कामकाज तदर्थ या दिहाड़ी पर निर्भर कर्मचारियों के सहारे होने लगा था। क्या यह नीति थी या उसका विचलन ?
इस प्रश्न का उत्तर किसी की व्यक्तिगत सदाशयता का मोहताज नहीं है। शिक्षा में उदारीकरण का अर्थ और उसकी सीमा तय करना सरकार का काम था और है, पर इस काम की एक बड़ी कठिनाई उस संकोच में निहित है, जो शिक्षा को सार्वजनिक हित में साधन मानने से स्वभावत: उत्पन्न होता है। कोई सरकार इस संकोच का पूर्णत्याग नहीं कर सकती। न ही समाज कर सकता है। शिक्षा चीज ही ऐसी है कि उसकी चर्चा आने पर हमारी आंखों पर भावनाओं का धुंधलका चढ़ जाता है। हम देखते हैं कि शिक्षा के उद्देश्य बाजार के बाढ़ में बह रहे हैं, पर हमारे मुंह से यही जाप निकलता है कि शिक्षा सबका अधिकार है, विवेक की आधारशिला है, आदि। जो द्वैध आम जुबान में है, वही सरकारी जुबान में रहता है। यूपीए के दूसरे दौर में अर्जुन सिंह को हटाकर कपिल सिब्बल को मानव संसाधन विकास मंत्री इस उम्मीद में बनाया गया था कि वे शिक्षा में उदारीकरण की नीति को स्पष्ट अभिव्यक्ति देंगे। उन्होंने प्रयास भी किया, पर सफल नहीं हो सके। उनके कार्यकाल में गढ़े गए एक दर्जन से ज्यादा विधेयक आज तक लंबित पड़े हैं। इनमें निजी विश्वविद्यालय और विदेशी विश्वविद्यालय संबंधी विधेयक शामिल हैं।
इस तरह के विधेयकों की स्वीकृति और उदारीकृत शिक्षानीति की स्पष्ट अभिव्यक्ति भले लंबित हो, बाजार का विस्तार शिक्षा में निर्विरोध होता चला गया है। यथार्थ का रोब देखिए, निजी विश्वविद्यालय राज्यों की विधानसभाओं के जरिए खुलते चले गए हैं और केंद्र की स्वीकृति भले न हो, उनकी डिग्रियों को यूजीसी की मान्यता मिल गई है। जाहिर है कि घोषित नीति का अभाव उदारीकरण में सहायक सिद्ध हुआ है। कोई कारण नहीं कि यह स्थिति बदले। स्मृति ईरानी ने मंत्री पद संभालने के बाद नई शिक्षा नीति लाने की घोषणा की थी। उनके जाने के बाद यह चर्चा जारी है। शायद कोई नीति आएगी भी, पर नीति और उसके दस्तावेज में फर्क करना समय की मांग है। दस्तावेज कुछ भी कहे, जो दबाव यूपीए के दूसरे कार्यकाल में पड़ना शुरू हुआ था, वह एकाएक घट जाए, यह संभव नहीं है। यह दबाव बाजार का है। शिक्षा को खरीद-बेच की वस्तु समझना आज कोई अपराध नहीं है। लगभग तीन दशकों से यह तर्क जोर पकड़ता जा रहा है कि जब समाज मं ऊंची कीमत देकर शिक्षा को खरीदने वाले बड़ी संख्या में हैं तो उसे बेचनेवालों को क्यों रोका जाए? आप यह दलील देते रहिए कि यह बात सारे समाज पर लागू नहीं होती, केवल एक वर्ग पर लागू होती है, जबकि शिक्षा के सरोकार वृहत्तर समाज से जुड़े होने चाहिए, वगैरह। इन तर्कों के लिए अब सरकारी दस्तावेजों में भी ज्यादा जगह नहीं रही।
दुष्परिणामों के प्रति निडरता
शिक्षा के क्षेत्र में बेलगाम उदारीकरण के कई परिणाम सामने आ चुके हैं, लेकिन इनकी चर्चा अक्सर उदारीकरण के संदर्भ में नहीं की जाती। मिसाल के तौर पर मध्यप्रदेश का व्यापमकांड मेडिकल और अन्य प्रवेश परीक्षाओं में राज्य और बाजार की मिलीजुली विकृतियों का आईना है, मगर इसकी चर्चा मात्र भ्रष्टाचार और अपराध के दायरे में की गई है। इसी तरह, समूची हिंदी पट्टी में, पर विशेषकर मध्यप्रदेश और बिहार में शिक्षकों की सेवाशर्तों में आए क्रमिक परिवर्तन मूलरूप से शिक्षानीति में चुपचाप लाए गए बदलाव से जुड़े हैं और ये बदलाव राज्य के खर्चे को घटाने की वृहत्तर नीति के अंग हैं। लेकिन, इस परिघटना की चर्चा व्यवस्था की वित्तीय क्षमता के संदर्भ में की जाती है। ये उदाहरण दिखाते हैं कि उदारीकरण एक गहन परियोजना है, जो सिर्फ कार्यक्रमों या संस्थानों को नहीं, हमारे विमर्शों और चीजों को समझने की हमारी सामर्थ्य को भी प्रभावित करती है। शिक्षा को उदारीकृत अर्थव्यवस्था में किस प्रकार नियोजित किया जाना है, इस प्रश्न पर विमर्श का अभाव व्यवस्था के बिखराव को तेजी से बढ़ाता रहा है। कई लोग अभी तक इस भ्रम में जीना पसंद करते हैं कि उदारीकरण को वापस मोड़ा या रोका जा सकता है। वे यह रोज देखते हैं कि उदारीकृत आर्थिकी ने संगठनों और उनकी प्रतिरोध क्षमता को तोड़-मरोड़ दिया है। प्रतिरोध को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए, यह आस्था हममें से कई में बनी हुई है। यह आस्था मात्र की शैक्षिक परिस्थिति को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
उदारीकरण के समर्थक यह तर्क देते हैं कि इस दौर के पहले भी शिक्षा की हालत कोई खास बेहतर नहीं थी। वे कहते हैं कि नौकरशाही का नियंत्रण या राजनीतिक निर्देशन शिक्षा के लिए बाजार के मुकाबले ज्यादा बुरे हैं। उनकी यह दलील सैद्धांतिक और ऐतिहासिक दोनों कसौटियों पर कसी जानी चाहिए। सैद्धांतिक स्तर पर नौकरशाही और बाजार के बीच विकल्प की बात सही हो सकती है, लेकिन पिछले तीस सालों का अनुभव बताता है कि भारत में बाजार की शक्तियां नौकरशाही की ताकत को घटा नहीं पाई है। ऐसा क्यों हुआ, यह समझने के लिए हमें अपने औपनिवेशिक अतीत का अन्वेषण करना होगा। पूंजीवाद की जिन शक्तियों ने यूरोप में सामंतवाद को उखाड़ा, वे क्या हमारे जैसे औपनिवेशिक ढांचे में अफसरशाही को कमजोर करेंगी?
फिलहाल, ऐसा मानने के पर्याप्त प्रमाण पैदा नहीं हुए हैं। इस समय चल रही शिक्षा नीति के निर्माण की चर्चा इस सच्चाई का संकेत देती है। शुरुआती दस्तावेज एक सेवानिवृत्त अधिकारी के नेतृत्व में बनवाया गया है। इसमें अकादमिक भागीदारी नगण्य रही है। वैसे भी सरकार विशेषज्ञों को विचारधारा के चश्मे से देखने-तौलने की आदी रही है और इस कारण प्रशासनिक अधिकारियों पर ज्यादा भरोसा करती है। बाजारवाद का दर्शन अफसरशाही की हैयिसत को प्रभावित किए बगैर आगे बढ़ रहा है।
इस दर्शन पर बहस अच्छी बात है, पर ज्यादा उपयोगी होगा कि शिक्षा के संदर्भ में यह दर्शन पिछले तीन साढ़े तीन दशकों में कौन-कौन से निर्णायक प्रभाव ला चुका है, उसकी व्यवस्थित सूची बनाई जाए। किस राज्य में यह सूची कितनी लंबी है, इस बात को ध्यान में रखकर आज की शैक्षिक परिस्थिति में मौजूद विकृतियों में विविधता का ब्योरा तैयार किया जाना चाहिए। ऐसा कोई निर्णय जो केरल की शिक्षा व्यवस्था को सुधार सकता है, बिहार में भी उपयोगी ठहरेगा, ऐसा नहीं माना जा सकता। यदि विविधता से उत्पन्न जटिलताओं पर ध्यान नहीं दिया जाता तो नीति का दस्तावेज भले बन जाए, नीति वही रहेगी जो बाजारीकृत यथार्थ में खप सकेगी। नव-उदारवाद एक विश्वव्यापी सोच है। उसका वरण 1980 के दशक के उत्तरार्ध से सिलसिलेवार घटनाक्रम के तहत हुआ है। राजनीतिक दलों की आम सहमति के अलावा उसे समाज के मुखर वर्गों की सहमति भी प्राप्त है, शिक्षा के क्षेत्र में इसके मायने देर से ही सही, मगर लगन से जांचे जाएं, तभी कोई नीति बन सकती है, वर्ना सिर्फ दस्तावेज बनेगा। १

