यवसाय की नजर से देखा जाए तो वकील और मुवक्किल या प्रार्थी और आरोपी आदि आपस में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह आवश्यक रूप से अंग्रेजी नहीं होती। हमारी हिंदी-फिल्मों में भी अदालतों के दृश्यों में हिंदी का ही प्रयोग होते दिखाया जाता है। लेकिन असल में प्रार्थना-पत्र आदि के दाखिल करने से लेकर आगे की कार्यवाही और निर्णय अक्सर अंग्रेजी में होते हैं।
हिंदी के घरेलू और वैश्विक महत्त्व को लेकर पर्याप्त सैद्धांतिक विचार हो चुका है। भारत के संदर्भ में अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में इसे संपर्क भाषा मानने-मनवाने की सैद्धांतिक कवायद भी भरपूर हो गई है। फिर भी क्या कारण है कि हर सितंबर आते-आते हिंदी के बोलबाले को लेकर तमाम चिंताएं-चिंतन रह रह कर शुरू होने लगता है। क्या कारण है कि राजभाषा के रूप में हिंदी के आंकड़ों की बहार लादी जाने लगती है। वह भी एक ऐसी हिंदी में जिसे फिर हिंदी बनाने की जरूरत पड़ने लगती है। व्यक्यिों का एक ऐसा वर्ग भी है जो राष्ट्रभाषा या राजभाषा की समस्या को हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं के संबंधों में न ढूंढ़कर हिंदी और अंग्रेजी की प्रतिद्वंद्विता के रूप में उभारना चाहता है।
एक शोध के अनुसार 137 देशों में हिंदी भाषा विद्यमान है। इन देशों में हिंदी एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है और विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी के पठन-पाठन और शोध की लंबी परम्परा की व्यवस्था है। एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिंदी पढाई जा रही है। पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव अदि में हिंदी बोली जाती है। भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, जैसे- इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया और जापान में इसका प्रयोग होता है। सच है कि भारत की अनेक सरकारी या सरकार से मदद प्राप्त संस्थाएं हैं जो विश्व के संदर्भ में हिंदी के कदम बढ़ाने में गतिशील हैं। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, केंद्रीय हिंदी संस्थान, केंद्रीय हिंदी निदेशालय और महात्मा गांधी हिंदी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय सहित अनेक भारतीय विश्वविद्यालय इस दिशा में अपनी.अपनी क्षमताओं और सीमाओं के अनुसार गतिशील हैं।
संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी स्वीकृत की गई। अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप माना गया। लेकिन राजभाषा के कार्यों के निर्वाह में हिंदी भाषा की तैयारी को देखते हुए यह उल्लेख भी किया गया था कि अंग्रेजी 1965 तक राजभाषा के रूप में काम में आती रहेगी और इस अवधि में हिंदी भाषा के साहित्य निर्माण के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में उसके उपयोग के प्रयत्न किए जाते रहेंगे। 1963 में हिंदी को एकमात्र राजभाषा घोषित किया जाना था लेकिन अंग्रेजी हटाने को लेकर कुछ स्थानों पर विरोध हुआ। 1967 में अधिनियम में संशोधन हुआ और अंग्रेजी को सह-राजभाषा बनाए जाने की नीति स्वीकार कर ली गई। इसके बाद क्या होता आ रहा है वह सुधी जनों से छिपा हुआ नहीं है । एक वर्ग हमेशा अंतरराष्ट्रीय संबंधए और वैज्ञानिक उपलब्धियों, विकसित मानी गई
अंग्रेजी भाषा की सदा वकालत करता रहा है और हिंदी को व्यवहार में उसके उचित पद पर आने की राह में बाधा डालता रहता है। अपने देश की सबसे बड़ी मुश्किल यह भी है कि यहां कानून तो बन जाते हैं लेकिन उनके पालन कराने के लिए न कोई समुचित व्यवस्था और इच्छाशक्ति होती है और न हीं जिन्हें पालन करना होता है उनमें ललक और समझ ही पैदा की जाती है । रस्म अदायगी जरूर होती रहती है । हिंदी का भी यही सच है । न्यायपालिका एक संवैधानिक संस्थान है जो सरकार का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करता है। इस संस्थान की बुनियादी जिम्मेदारी जनता के प्रति होती है। 27 अप्रैल 1960 को राष्ट्रपति ने आदेश दिया कि विधि मंत्रालय को जो काम सौंपे जाएं, उनमें यह भी था कि वह हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में केंद्रीय अधिनियमों के अनुवाद के लिए और उच्च न्यायालयों में निर्णय, डिक्री और आदेश आदि में हिंदी और राज्य की राजभाषाओं के प्रयोग के लिए आवश्यक अधिनियम बनाए। एक आदेश के अनुसार न्यायालयों में जिला न्यायालय स्तर तक सभी कार्य राज्य की राजभाषा में होंगे। इसका उपबंध दंड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता में किया गया है। उच्च न्यायालय में कार्य दो भाषाओं में हो सकेगा। हिंदी में या राज्य की राजभाषा में।
उच्चतम न्यायालय में कार्य केवल हिंदी में होगा। विधेयकों का प्रारंभ में प्राधिकृत अनुवाद हिंदी में होगा। बाद में विधेयक हिंदी में रखे जाएंगे। एक सूचना के अनुसार विधि मंत्रालय ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए 1961 में राजभाषा आयोग बनाया जिसका स्थान 1976 में राजभाषा खंड ने ले लिया। राजभाषा खंड ने केंद्रीय अधिनियमों के हिंदी में प्राधिकृत पाठक तैयार कर लिए। मानक विधि शब्दावली तैयार हो गई। इसलिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केंद्रीय हिंदी समिति में यह निर्णय हुआ कि विधेयक मूलरूप से हिंदी में बनाए जाएं। 1998 के राष्ट्रपति के आदेश में भी यह कहा गया। लेकिन इस दिशा में जो प्रगति होनी थी वह फाइलों और सिद्धांतों में ही कैद है। यह आश्चर्य और दुख का विषय है ।
व्यवसाय की नजर से देखा जाए तो वकील और मुवक्किल या प्रार्थी और आरोपी आदि आपस में जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वह आवश्यक रूप से अंग्रेजी नहीं होती। हमारी हिंदी-फिल्मों में भी अदालतों के दृश्यों में हिंदी का ही प्रयोग होते दिखाया जाता है। लेकिन असल में प्रार्थना-पत्र आदि के दाखिल करने से लेकर आगे की कार्यवाही और निर्णय अक्सर अंग्रेजी में होते हैं। जिन नागरिकों को अंग्रेजी नहीं आती वे वकील और व्यवस्था पर आस्था और भरोसे के रहम पर ही जीते रहते हैं। क्या कथनी और करनी या सिद्धांत और व्यवहार की इस विडंबना को दूर नहीं किया जाना चाहिए? प्रयोग के स्तर पर अगर हिंदी, किसी उपयुक्त कारणवश अपने मानक रूप में कुछ छूट लेती और अपने भीतर कुछ अन्य बोलियों और भाषाओं के शब्दों को समेटती नजर आए तो उसे फिलहाल स्वीकार करना होगा। हिंदी को, भारत की राजभाषा के रूप में जरूरत और प्रतिष्टा भाषा का दर्जा दिलाने के लिए जब तक आवश्यक हो संघर्ष करना ही होगा। किसी अन्य भाषा का विश्व की भाषा के रूप में अपमान किए बिना इसे उपेक्षा की मार से बचाना होगा। लेकिन यह लक्ष्य रस्म अदायगी से नहीं बल्कि संकल्प, संघर्ष और सूझबूझ से ही प्राप्त होगा।

