मोन ने लिखा है- औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। यह बात गंभीरता से विचार करने की है। औरत बनाई जाती है, उसके बाद उसके लिए कुछ कानून, नियम-कायदे भी बना दिए जाते हैं, जिसके इर्द-गिर्द घूमने के लिए उसे मजबूर कर दिया जाता है। वे कायदे भी इतनी होशियारी से गढ़े जाते हैं कि औरत उसे जिंदगी का हिस्सा मान ले, उसे कभी एहसास ही न हो कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है। ऐसे कायदे मजहब के नाम पर गढ़ना बेहद आसान होता है। पुरुष प्रधान समाज औरत को दीन यानी धर्म सिखाते रहना जरूरी समझता है। यह औरत को काबू में रखने का एक बेहद आसान जरिया भी है। सुल्ताना (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उसकी शादी को दस साल हो गए, उसके आठ बच्चे हैं। पति को एक दिन शक हुआ कि सुल्ताना का संबंध किसी और से है। उसने शक की बिना पर सुल्ताना को तीन बार तलाक बोला और कहीं भाग गया। उसके बाद सुल्ताना आठ बच्चों के साथ अकेले रहती रही। जब एक-दो साल बाद उसके पति को एहसास हुआ कि उसने गलत किया, तो वह बार-बार सुल्ताना के दरवाजे पर आने लगा, उसे वापस ले जाने की मिन्नतें करने लगा। मोहल्ले वालों ने उसके यों आने-जाने पर आपत्ति की और हलाला का सवाल उठा दिया। सुल्ताना बताती है कि फिर उसका पति अपने एक दोस्त और एक मौलाना को साथ लेकर आया। मौलाना ने ढाई सौ रुपए लिए और दोस्त के साथ निकाह करा दिया। रात गुजारने के बाद सुबह चार बजे वह बिस्तर पर तलाक तलाक तलाक बोल कर चला गया। वही मौलाना सुबह आए, दुबारा ढाई सौ रुपए लेकर उसके पहले पति के साथ फरजाना का निकाह कराया।
निकहत की जब शादी हुई तो उसे यह नहीं पता था कि उसका पति पहले से शादीशुदा है और अपने पहली बीवी को तलाक दे दिया है। कुछ समय बाद निकहत का पति पहली पत्नी के घर भी जाने लगा। पहली पत्नी शन्नो को यह नहीं पता चला कि इस बीच उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। शन्नो को अपने साथ रखने की जिद करने लगा। उसने पास के गांव जाकर एक आदमी से कहा कि एक रात तुम्हारी, बाकी हमारी। उसे हलाला के लिए तैयार कर लाया। शन्नो ने कहा, मैं दो बच्चों की मां, मैंने उस गैर-आदमी के साथ पूरी रात जो यातना झेली, उसे बयान नहीं कर सकती। और जब यहां आई तो पता चला कि यहां एक बीवी और मौजूद है।
नुजहत ने बताया कि उसके पति ने उसे तलाक तलाक तलाक कह कर घर से निकाल दिया। उसके तीन बच्चे थे। मायके में भी जीना बहुत मुश्किल हो रहा था। पति दुबारा आए वापस ले जाने के लिए, साथ में एक को लाए हलाला कराने के लिए। उस आदमी से मेरा निकाह कराया, लेकिन आज तक उस आदमी ने मुझे तलाक ही नहीं दिया। न मैं इधर की हूं न उधर की। परवीन उच्च शिक्षा प्राप्त टीचर है, जिस पर शादी होते ही नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया गया। न छोड़ने पर एक दिन फोन से तलाक बोल दिया गया। दुबारा ले जाने की शर्त थी कि बिना हलाला नहीं ले जाएंगे। जिसे परवीन ने अस्वीकार कर दिया। वह आज तक मायके में रह रही है। ऐसी ही कुछ और बातें, कुछ और औरतें उसमें जोड़ती हैं। शादी के लिए तो वकील, गवाह लेकर आते हैं और तलाक बंद कमरे में कह कर चले जाते हैं। यह कैसा अंधेर है। एक किलो सेब महंगा मिलेगा बहन जी, पर एक औरत सस्ते में मिल जाएगी। औरतों की ये जिगर के हजार टुकड़े कर देती हैं।
यह इस्लाम पूर्व की प्रथा है। प्राचीन अरब के अधिकतर बद्दू समुदाय, जो कबीलों में रहते थे, औरतों को अपने यौन सुख के लिए भेड़-बकरियों की तरह अपने नियंत्रण में रखते थे। यहां तक कि उनकी संख्या पांच सौ से हजार दो हजार तक भी होती थी। उन्हें वे जब चाहते थे, रखते थे और जब चाहते थे तलाक तलाक कह कर निकाल बाहर कर देते थे और फिर जब चाहते थे वापस रख लेते थे। इस्लाम आने के बाद मुहम्मद साहब ने इस प्रथा का विरोध किया। यह बात सामने आई कि औरतों को यों ही गुलाम बना कर अपने नियंत्रण में नहीं रखा जा सकता। वे महिलाएं,
जो बेसहारा हैं या जिनके पति युद्ध में मारे गए हैं, उनका यौन शोषण न हो, ऐसी महिलाओं से मर्द बाकायदा निकाह करें और उन्हें उनका पूरा हक दिया जाए। एक औरत को अगर तलाक दे दिया गया है, तो फिर वह मर्द जिसने उसे तलाक दिया है, उसे अपने नियंत्रण में अपनी इच्छानुसार नहीं ला सकता। जब तक कि उस महिला का किसी अन्य से निकाह न हुआ हो और जीवन में उसका किन्ही अन्य कारणों से वहां तलाक न हो गया हो। इसके समर्थन में कुरान (पारा 2 सूर: बकर आयत 230) में भी हवाला मिलता है, जो इस बात की तस्दीक है कि कुरान औरतों को यौन दासी बना कर रखे जाने का समर्थन नहीं करती। कुरान के ही पारा 5 सूर: निसां की आयत 3, 19 और 24 भी इस बात के
लिए बार-बार आगाह करती है कि शारीरिक संबंधों में नाइंसाफी से बचो। पाकदामनी पर कुरान का जोर है। साथ ही कुरान में सूर: निसां में लिखा है कि मोमिनों तुमको जायज नहीं कि जबरदस्ती औरतों के वारिस बन जाओ, खुदा की हदों को पहचानो। यह कहना बेहतर होगा कि हलाला प्रथा उस समय एक तरह से मर्दों के साथ सख्ती और उन्हें सजा थी कि वे कभी भी अपनी इच्छानुसार किसी औरत को यौन दासी बना कर नहीं रख सकते। कौन-सी औरत तुम पर हलाल और कौन-सी हराम है, इस बात का भी कुरान में उल्लेख मिलता है, लेकिन इस प्रथा का आज बहुत गलत इस्तेमाल हो रहा है। जब चाहा तलाक कहा, फिर पत्नी को वापस लाने के लिए खुद ही किसी से निकाह और यौन संबंध बनाने को मजबूर किया और वापस पहले पति से निकाह। यह झटपट व्यवस्था कुछ लोगों ने खुद बना ली और वे लोग इसके समर्थन में पैगंबर मुहम्मद साहब की उस बात का हवाला देते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि जब किसी और से निकाह और तलाक न हो जाए, तब तक दुबारा निकाह नहीं कर सकते।
अफसोस कि मुहम्मद साहब के उस हवाले को अपनी मन मर्जी से गलत इस्तेमाल इस सदी में भी किया जा रहा है। हालिया मुरादाबाद, दिल्ली, बिजनौर के कुछ मामलों में, जिनमें मौलवी बाकायदा हलाला सेंटर चला रहे हैं और पकड़े गए हैं। फिक्र की बात यह है कि इसे धर्म का डर दिखा कर स्थापित किया जा रहा है, और जो लोग हलाला कर रहे हैं मोटी रकम लेकर, वे भी इसे धार्मिक काम मान रहे हैं। यह दीन की बेटियों के लिए गंभीर चिंता का विषय तो है ही, जिसकी सजा उन्हें ही भोगनी पड़ रही है। यह बात ध्यान देने वाली है कि मुसलिम समाज का एक बड़ा वर्ग यह दलील देते नहीं थकता कि औरत को परदे में रहना फर्ज है, वह किसी के सामने न जाए। यहां तक फतवे आ चुके हैं कि जिस दफ्तर में मर्द हों, वहां औरत काम न करे। ऐसी तमाम औरतें मिल जाएंगी, जो सिर से लेकर पैर तक काले बुर्के में ढकी-छिपी रहती हैं। वहीं यह विरोधाभास कि अगर तीन तलाक के बाद अपनी ही बीवी को वापस रिश्ते में लेना है, तो उसे वही मर्द दूसरे मर्द के साथ यौन संबंध बनाने को भेजता है! कितने मामले ऐसे भी आए, जिनमें अगर हलाला करने वाले व्यक्ति ने रात में औरत के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाया, तो उसे हलाला ही नहीं माना गया।
इधर एक बदलाव देखने में आ रहा है कि शोषण सह रही औरतों ने अब लामबंद होना शुरू कर दिया है। वे अब मजहब के नाम पर किए जाने वाले किसी भी जुल्म को सहने को तैयार नहीं हैं। लकीर के फकीर बने रहने से अब बात नहीं बनेगी। यह बात औरतों ने समझ ली है और मजहब के नाम पर सभी हदबंदियों को तोड़ना शुरू कर दिया है। कोई भी परंपरा, जो मानवता के खिलाफ हो, इंसान की अस्मिता के खिलाफ हो, वह कितनी भी पुरानी और स्थायी क्यों न हो, उसका खुल कर विरोध होना चाहिए, उसे उखाड़ फेंकना चाहिए। एक सभ्य समाज की बुनियाद इन अमानवीय परंपराओं पर नहीं रखी जा सकती।
कुछ बुनियादी बातें, जो समझ में आर्इं और इस समस्या के समाधान की ओर भी रास्ता बनाती हैं, वे यह कि-
तीन तलाक गैर-कुरानी है, हलाला की घटनाएं इसी से जुड़ी हैं। अगर तीन तलाक बंद होगा तो हलाला भी बंद होगा।
दूसरी बात, 1939 का मुसलिम विवाह विच्छेद कानून मुसलमान औरत को तलाक के लिए कोर्ट जाने की इजाजत तो देता है, लेकिन मुसलिम मर्द द्वारा दिए जाने वाले तीन तलाक पर रोक नहीं लगाता। इस कानून में भी बदलाव की सख्त जरूरत है।
तीसरी बात- भारत सरकार को जल्द से जल्द एक इन्साफ पसंद पारिवारिक कानून, जो भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित हो, बनाने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए और महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित और सुनिश्चित करना चाहिए। भेदभाव और हिंसा पर आधारित सभी धार्मिक और परंपरागत प्रथाओं को अपराध अधिनियम के दायरे में लाना चाहिए। तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है। उसने तलाक को अनुचित ठहराते हुए सरकार को इस मसले पर कोई व्यावहारिक कानून बनाने को कहा है। अब सरकार को इस मामले में कदम बढ़ाना है। तलाक के खिलाफ कड़ा कानून बनेगा, तो इससे नाइंसाफी के और दरवाजे, मसलन हलाला अपने आप बंद हो जाएंगे। ध्यान यह भी रखना होगा कि औरत विरोधी प्रथाएं किसी एक धर्म में नहीं हैं, इसलिए निशाना भी कोई एक धर्म न बने। इस मुल्क में आस्था के नाम पर अमानवीय प्रथाओं को रोकने की नजीरें मौजूद हैं। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह को लागू करना, यह सब कुछ बंद हुआ है, तो निश्चित ही तीन तलाक भी बंद होगा और उसके साथ जुड़ा हलाला भी। ०
तलाक के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है। उसने सरकार को इसके खिलाफ कानून बनाने को कहा है। मगर अब भी कुछ लोग तलाक प्रथा के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। ये वही लोग हैं, जो तलाक और हलाला जैसी प्रथाओं को कुरान से जोड़ कर उनकी गलत व्याख्या करते आ रहे हैं। तलाक मुसलिम महिला समाज के लिए नासूर तो है ही, उससे कम यातनादेह हलाला नहीं है। हलाला यानी तलाक दी गई बीवी को उसका पति दुबारा साथ रखना चाहे तो उसे पहले किसी दूसरे से निकाह करना पड़ता है और फिर उससे तलाक लेकर अपने पहले पति के साथ निकाह पढ़ना पड़ता है। इस प्रथा के चलते न जाने कितनी औरतें शोषण और यातना का शिकार हो रही हैं। किस तरह हलाला के नाम पर मजहब के साथ खिलवाड़ हो रहा है, बता रही हैं नाइश हसन।

