पिछले कुछ दशक से प्रयोजनमूलकता के नाम पर हिंदी को विकृत करने का खेल चल रहा है। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, जनपदीय संस्कृति की पहचान भी होती है। सैकड़ों वर्षों तक, लूटपाट और तहस-नहस का शिकार रही यहां की सांस्कृतिक पद्धतियां भाषा के माध्यम से ही जन-जन की चित्तवृत्ति में बसी रहीं। सच है कि भाषा को मानवीय जीवन पद्धति के साथ विकासमान होना चाहिए, समयानुसार विकास होता भी रहा है। पर न जाने किस चक्कर में हमारे यहां स्वर-रहित आनुनासिक वर्णों की ध्वनियां मिटा दी गर्इं। ‘हँस’ और ‘हंस’, ‘बँटी’ और ‘बण्टी’ का फर्क मिट गया। पूर्णविराम की जगह फुलस्टॉप लिखने वालों का वह कौन-सा दुराग्रह है, वे ही जानते होंगे। भाषा और संस्कृति पर बाजार और पूंजी के अत्याचार का इससे बड़ा उदाहरण और कुछ नहीं हो सकता। टाइप फेस और हैंड कंपोजिंग वाली मुद्रण व्यवस्था खत्म हो चुकी, पर हिंदी के प्रकाशन संस्थानों, पत्र-पत्रिकाओं, लेखकों संपादकों द्वारा अब भी वही व्यवस्था लागू है। बल्कि अधिकतर स्थितियों में वही मान्य है। तर्क सिर्फ एक है- प्रयोजनीयता की सिद्धि। आश्चर्य नहीं कि देखते-देखते जिस तरह चार-छह वर्ण हमारी भाषा से लुप्त हो गए, आगे के पांच दशक में कुछ और लुप्त हो जाएं।

विशेषज्ञों ने अब यह निर्णय भी दिया है कि संयुक्ताक्षर हलंत लगाकर लिखे जाएं। इस निर्णय में द्व को द्व, द्य को द्य, द्ध को द्ध लिखने तक तो बर्दाश्त कर भी लिया जा सकता है; पर ‘द्वितीय’, ‘सिद्धि’, ‘खण्डित’ लिखने की पद्धति का स्रोत हम कहां जाकर ढूंढ़ें? असंख्य वर्षों से सुसंस्थापित संकेतों को विस्थापित कर हिंदी लिखने के लिए हम जिस संकेत-व्यवस्था को मानक बनाने के पीछे पड़े हुए हैं, इसका कोई संकेत हमें संस्कृत में भी नहीं दिखता। इस तरह हिंदी लिखने के चलन को अगर हम हिंदी-प्रेमियों ने मान्यता दी, तो निश्चय ही यह भाषा अपनी जड़ों से कट जाएगी।  मौखिक वार्तालाप में मनुष्य चाहे जो छूट ले ले, जब लिखित रूप में कोई बात सामने आए तो उसमें भाषा की गरिमा का खयाल रखा जाना चाहिए। आखिरकार हिंदी की व्यवस्थित वर्तनी है, सुगठित व्याकरण है। कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना, रेडियो, टेलीविजन में उसके अनुशासन का मान रखा जाना चाहिए। वहां उसे मातृभाषा की दादागिरी नहीं दिखानी चाहिए- क्योंकि हिंदी किसी जनपद की मातृभाषा नहीं है।

फणीश्वरनाथ रेणु के कथा-साहित्य की लोकप्रियता देख कर नई फसल ने साहित्य में जिस पात्रोचित भाषा का प्रयोग शुरू किया, उसने हिंदी को भ्रष्ट कर दिया। विसंगतियों से भरी ऐसी बातें आज किसी से छिपी नहीं हैं। प्रयोजनमूलक प्रयोग की सुविधा अवश्य रहे, पर उसका दुष्प्रभाव हिंदी की अस्मिता पर न पड़े, इस पर विचार कौन करेगा? भाषा के साथ मनमाना व्यवहार करने वालों की शह पाकर ही भूमंडलीकृत बाजार के विज्ञापनकर्ताओं ने सिरदर्द की टिकिया के प्रचार में राम और दशरथ का दुरुपयोग शुरू कर दिया। कॉस्मेटिक क्रीम के प्रचार में सामवेद की ध्वनियां ले लीं। मुरमुरे के प्रचार में जटायु का विवेक नष्ट कर दिया। मोबाइल फोन के नेटवर्क कनेक्शन में अकबर और सलीम का उपयोग कर लिया। रेडियो चैनलों में पता नहीं कौन-सी हिंदी विकसित कर दी गई। दूरदर्शन के धारावाहिकों में बिहार के लोगों की तर्ज पर बोली जाने वाली हिंदी के नाम पर न मालूम कहां की, और किस संरचना की हिंदी आने लगी। इन तमाम स्थितियों का समग्र प्रभाव यह पड़ा कि आज के स्कूली बच्चों को प्रेमचंद की कहानी कफन सुना कर पूछा जाता है कि इस कहानी से आपको क्या प्रेरणा मिलती है, तो वे कहते हैं- यह कहानी अच्छी है, घीसू और माधव को आलू बहुत टेस्टी लगता था।

प्रयोजन और प्रयोग का दिशाहीन अर्थ निकालने की प्रथा चला देने वाले इस संपद्राय के लोगों के कारण ही आज दुनिया की सबसे संपन्न भाषा-भूखंड के लोग दरिद्र भाषा का पल्लू पकड़ कर दरिद्र बनते जा रहे हैं। मनुष्य अपने आसपास के अनुशासनों, ज्ञान और व्यवहार की विभिन्न शाखाओं से ताउम्र कुछ न कुछ सीखता रहता है। एक समय था जब समय, भाषा-संस्कार और उच्चारण के लिए आकाशवाणी प्रामाणिक स्रोत था। अखबार पढ़ कर लोग अपनी भाषा मांजते-संवारते थे। विषय-वस्तु के विश्लेषण की क्षमता विकसित करते थे। अपने शब्द-प्रयोग की दक्षता बढ़ाते थे। आज कहा जाता है कि रेडियो-दूरदर्शन के चैनल या अखबार का काम संप्रेषण है, यहां भाषा की जटिलता नहीं चलेगी, यहां ऐसी भाषा दी जाए जो बोधगम्य हो, जो तुरंत समझ में आ जाए, आज लोगों के पास अधिक सिर खपाने का समय नहीं होता। उन्हें पता है कि मनुष्य की भाषा और उसका संस्कार, सामाजिक संरचना के समस्त संकायों का समन्वित उत्पाद्य होता है। भाषा की जटिलता उनके संप्रेषण को आहत करती है, तो उसे सरल बनाएं, भ्रष्ट क्यों बना रहे हैं!

सच है कि साहित्य की विवरणात्मक भाषा, गणित और विज्ञान में काम नहीं आएगी; कथा, कविता, उपन्यास का भाषा-रूप आलोचना के लिए मुफीद नहीं होगा, प्रेम, वात्सल्य, प्रार्थना का भाषा-रूप किसी व्यक्ति को डांटते समय काम नहीं आएगा, टेलीग्राम या कूट भाषा का उपयोग किसी की जीवनी लिखने में उपयुक्त नहीं होगा। प्रयोजन के आधार पर भाषा में प्रयोग की छूट है, शायद इसी की बदौलत हमारी जीवन-पद्धति में कहावत, लोकोक्तियां, मुहावरे आदि के प्रयोग हुए होंगे और वे समाज में मान्य और ग्राह्य होते गए।  असल बात है कि प्रयोजनमूलक प्रयोग की छूट लिखने-बोलने वालों को जब दी गई थी, उन दिनों लोग भाषाई अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान का अर्थ समझते थे, और किसी हद तक उन नियामकों से खुद को जोड़े हुए थे। आजादी के बाद के कुछ वर्ष तो जश्न और पुनर्संरचना के गर्दो-गुबार में बीत गए, फिर लोग सत्ता और शासन-व्यवस्था में अपनी जगह तलाशने में लग गए। लगे हाथ लेखक-शिक्षक-पत्रकार और भाषा के अन्य पुरोहित भी पहचान, प्रतिष्ठा, पुरस्कार और गद्दी की तलाश में हाथ-पांव मारने लगे। वे भूल ही गए कि हमें जो आजादी मिली है, उसका बिगुल हमारे पूर्वजों ने भाषा और संस्कृति की बुनियाद पर ही फूंका था।

इस मुकाम पर आकर हम देख सकते हैं कि भाषा और भाषा-रूपों के प्रचार-प्रसार का आधार पहले जो भी रहा हो, इस समय मनुष्य के भाषा संस्कार को सबसे अधिक प्रभावित-संचालित दूरदर्शन, सिनेमा, रेडियो, जनसंचार माध्यम और साहित्य कर रहा है। इसके साथ-साथ भूमंडलीय बाजार भी कम प्रभावी नहीं है। आज के विशिष्ट जनों को इस बाजार में अपनी भाषा और संस्कृति का सौदा करने में संकोच नहीं हो रहा है। दूरदर्शन, सिनेमा, रेडियो और संचार माध्यमों ने अपना दायित्व मनोरंजन और खबर प्रस्तुत करने तक सीमित कर लिया। साहित्य ने कहना शुरू किया कि हम विचार बांटेंगे। कार्यालयों के अधिकारियों ने राजभाषा अधिनियम का विवशतापूर्वक सम्मान करने के लिए अपनी टिप्पणियों का अंगरेजी से हिंदी अनुवाद करवाना शुरू कर दिया। प्राथमिक विद्यालयों में व्याकरण की पढ़ाई लगभग समाप्त है। ले-देकर सारा दारोमदार अब विश्वविद्यालयों में हिंदी शिक्षण कर-करा रहे अध्यापकों पर आया। यहां तक आते-आते बोझ इतना बढ़ जाता है कि शुद्ध रूप से व्यवहार के बल पर, और संचार संसाधनों द्वारा परोसे गए भाषा-ज्ञान के आधार पर भाषा-संस्कार खराब कर आए नौजवानों की भाषा कहां तक सही की जा सकेगी, पके घड़े पर कौन-सा रंग चढ़ेगा?

समाज और बाजार के पूरे परिदृश्य ने प्रयोजनमूलक प्रयोग के नाम पर भाषा को इस अराजक स्थिति में पहुंचाने के इतने मोर्चे खोल दिए हैं, इसकी संरचना को इस तरह प्रदूषित, आहत और इसके अंग-भंग कर दिए हैं कि पूरा वातावरण दिशाहीन लगता है। इस दिग्भ्रम के समय में समाज के षा संस्कार की उक्त नियामक शक्तियों का ज्ञान-चक्षु खोलने का प्रयोजन अधिक है। प्रयोजनमूलक प्रयोग की आजादी लोगों को अवश्य मिले, पर प्रयोगकर्ता मनमानी से परहेज रखें।