अभिजीत राय

देश के पर्यावरणविद लंबे समय से इस बात को लेकर आगाह करते रहे हैं कि अगर जल्दी कुछ ठोस पहलकदमी नहीं हुई, तो आने वाले समय में भारत में गंभीर जल-संकट का दौर शुरू हो सकता है। मगर सरकार की ओर से ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा, जिससे जल संकट से निपटने की तैयारी का आभास हो। हमारे देश में पानी की समस्या दिनोंदिन गंभीर होती जा रही है। अगले दस सालों में देश व्यापक जल संकट के मुहाने पर खड़ा होगा। पानी के मसले पर काम करने वाली वैश्विक परामर्शदार्ती कंपनी ईए वाटर के अध्ययन के मुताबिक भारत में पानी की मांग सभी मौजूदा स्रोतों से होने वाली आपूर्ति के मुकाबले काफी ज्यादा होने की आशंका है।

मौजूदा समय में देश में सिंचाई का लगभग सत्तर प्रतिशत और घरेलू खपत का अस्सी प्रतिशत हिस्सा भू-जल से पूरा होता है, जबकि भूजल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। घरेलू और औद्योगिक क्षेत्रों में पानी की मांग में काफी बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में स्थिति विकट से विकटतम होने वाली है। इस वजह से कनाडा, इजराइल, जर्मनी, इटली, अमेरिका, चीन और बेल्जियम जैसे देशों की कंपनियां पानी की घरेलू जरूरत के बाजार में तेरह अरब डॉलर तक के निवेश का मौका देख रही हैं। ईए वाटर की ताजा रिपोर्ट में उद्योग क्षेत्र को अगले तीन साल में अठारह हजार करोड़ रुपए का बाजार मिलने की उम्मीद जताई गई है। यानी भारत में पानी की आपूर्ति और दूषित जल के प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे के विकास सहित इससे संबंधित अलग-अलग क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर अवसर होगा। ऐसे में आश्चर्य होता है कि एक ओर लंबे समय से चिंता जताई जाने के बावजूद केंद्र की सरकार उदासीन है, वहीं दूसरी ओर विदेशी कंपनियां इस मुश्किल से लड़ने के नाम पर अपनी कमाई के अवसर देख रही हैं।पेयजल की लगातार बढ़ती समस्या के बीच बोतलबंद पानी का कारोबार आज सौ अरब डालर तक पहुंच चुका है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर स्थानीय स्तर पर बोतलबंद पानी तैयार करना भारी अनियमितता वाला व्यापार बन चुका है। ऐसे हजारों संयंत्र हैं, जो बिना किसी लाइसेंस और निगरानी के चल रहे हैं। वहां मानकों का पालन करना जरूरी नहीं समझा जाता। ऐसे में इस बात की क्या गारंटी है कि विदेशी कंपनियों के हाथों में पानी का प्रबंधन जाने के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र ने 2010 में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को नागरिक अधिकारों में शुमार किया। देश का सर्वोच्च न्यायालय भी साफ पेयजल को नागरिकों का संवैधानिक अधिकार बता चुका है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार भारत में साठ प्रतिशत बीमारियों का कारण अशुद्ध जल है। भारत में बच्चों की मौत की एक बड़ी वजह जलजनित बीमारियां हैं। अशुद्ध पानी पीने से हर साल डायरिया के चलते बाईस लाख मौतें होती हैं। पृथ्वी पर कुल इकहत्तर प्रतिशत जल उपलब्ध है, इसमें से 97.3 प्रतिशत पानी खारा होने की वजह से पीने के योग्य नहीं है। सारी दुनिया पानी की समस्या से जूझ रही है। राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम की एक रिपोर्ट के अनुसार जम्मू कश्मीर की केवल 34.7 प्रतिशत आबादी को नलों के जरिए पीने का साफ पानी उपलब्ध है, जबकि बाकी की 65.3 प्रतिशत आबादी को हैंडपंप, नदियां, नहरों, तालाबों और धाराओं का अशुद्ध पानी मिलता है। ऐसे में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की 2011-2022 की रणनीतिक योजना के अनुसार वर्ष 2017 तक पचपन प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पाइपों के जरिए पानी उपलब्ध कराने का दावा दिवास्वप्न लगता है।
बोतलबंद पानी की पहली कंपनी 1845 में पोलैंड के मैनी शहर में ‘पोलैंड स्प्रिंग बाटल्ड वाटर कंपनी’ नाम से लगी थी। आज दुनिया में दसियों हजार कंपनियां इस धंधे में लगी हुई हैं। भारत में बोतलबंद पानी की शुरुआत 1965 में इटलीवासी सिग्नोर फेलिस की कंपनी बिसलरी ने मुंबई से की। इस समय भारत में इस कंपनी के आठ संयंत्र और ग्यारह फ्रेंचाइजी कंपनियां हैं। बिसलरी का भारत के कुल बोतलबंद पानी के व्यापार के साठ प्रतिशत पर कब्जा है। पारले समूह का बेली ब्रांड इस समय देश में पांच लाख खुदरा बिक्री केंद्रों पर उपलब्ध है। इस ब्रांड के लिए देश में चालीस बॉटलिंग संयंत्र काम कर रहे हैं। भारत में बोतलबंद पानी का कुल व्यापार चौदह अरब पचासी करोड़ रुपए का है। यह देश में बिकने वाले कुल बोतलबंद पेय का पंद्रह प्रतिशत है। एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय दुनिया की ज्यादातर बड़ी कंपनियां भारत के बाजार में अपने पेय पदार्थ बेच रही हैं।

कुछ साल पहले बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोतलबंद पेय पदार्थ सिर्फ यहां के धनी तबके की पसंद हुआ करते थे, लेकिन आज औसत आदमी भी इन कंपनियों का बोतलबंद पानी और दूसरे पेय पदार्थ खरीद रहा है। हांलाकि यहां इनके माल का मानक यूरोप, अमेरिका और एशिया के दूसरे मुल्कों की अपेक्षा पिछड़ा हुआ है। इस समय देश में सैकड़ों बोतलबंद कंपनियां अपना माल बेच रही हैं। भारत में बोतलबंद पानी के व्यापार में लगी अस्सी प्रतिशत कंपनियां देशी हैं। दुनिया में बोतलबंद पानी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने वाले देशों की सूची में भारत दसवें स्थान पर है। भारत में 1999 में बोतलबंद पानी की खपत एक अरब पचास करोड़ लीटर थी, जो 2004 में पांच अरब लीटर हो गई।

प्रकृति का जीवनदायी अमोघ वरदान पानी अब नकली बाजार में भी मुनाफे का खरा सौदा बन गया है। रेलवे स्टेशन और बस स्टैंडों पर यात्रियों की सुविधा के लिए लगाए जाने वाले प्याऊ को पानी माफिया ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। इन स्थानों पर बिकने वाली पानी की अधिकतर बोतलें नकली होती हैं। ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती हैं। पिछले साल केंद्रीय गुप्तचर संस्था (सीबीआई) ने कई जगहों पर छापे मार कर रेलों में पानी आपूर्ति करने वाले ठेकेदारों के यहां से बीस करोड़ रुपए बरामद किए। रेलवे बोर्ड के आदेश के मुताबिक रेल नीर की बोतलें आईआरसीटीसी से निजी आपूर्तिकर्ताओं को साढ़े दस रुपए प्रति बोतल कीमत पर मिलनी थी, जबकि ये आपूर्तिकर्ता रेल नीर का शुद्ध सुरक्षित पानी लेने के बजाय बाहर से सस्ता पानी खरीदने लगे, जो छह-सात रुपए प्रति बोतल कीमत पर मिल जाता था, लेकिन उसकी शुद्धता की कोई गारंटी नहीं होती थी। रेल यात्रियों को यही पानी पंद्रह रुपए में बेच कर ये आपूर्तिकर्ता मोटी कमाई करते रहे।

बोतलबंद पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए झारखंड जैसे कुछ राज्यों में अब तक कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं है। झारखंड में बिना आइएसआइ मार्क वाली जो बोतलें बिक रही हैं, उसे रोकने की दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाया जा सका है। ब्यूरो आॅफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआइएस) के बिहार-झारखंड शाखा द्वारा राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रधान सचिव को भेजी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में संचालित बोतलबंद पानी की कंपनियां खुलेआम ऐसी बोतलों का उपयोग कर रही हैं, जो मानकों पर बिल्कुल खरे नहीं उतरतीं। उस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत सरकार के नियमों के तहत कोई भी पानी का बोतल या मिनरल वॉटर बिना बीआइएस के प्रमाणन की बिक्री अवैध है। १