सेंसर बोर्ड कई स्तर की छानबीन के बाद फिल्मों को पास करता है। ऐसे में सेंसर बोर्ड की मंजूरी पाने वाली फिल्म पर प्रतिबंध की मांग करना इस वैधानिक संस्थान की उपयोगिता पर सवाल उठाता है। इससे तो यही संदेश जाता है कि सेंसर बोर्ड अक्षम है और वह पहली नजर में भांप नहीं पाता कि फिल्म का कोई अंश आपत्तिजनक है या नहीं?

फिल्म ‘द लेजेंड आफ माइकल मिश्रा’ कब आई और कब चली गई, इसकी भनक भी नहीं लग पाई। लेकिन रिलीज से पहले पंजाब सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन पर दो महीने का प्रतिबंध लगा कर उसे बेवजह सुर्खियों में ला दिया। प्रतिबंध की वजह यह बताई गई कि फिल्म में वाल्मीकियों को लेकर अभद्र टिप्पणियां की गर्इं, जिससे उनकी भावनाएं आहत हो सकती हैं। ‘द फ्लाइंग जट’ के प्रोमो देख कर ही गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी ने उस पर आपत्ति कर दी। आपत्ति फिल्म के नायक टाइगर श्राफ के कास्ट्यूम और उस पर निशान साहिब के इस्तेमाल पर है। इसे सिखों की धार्मिक भावनाओं पर हमला बताया गया है। ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर पहले सेंसर बोर्ड ने तमाशा किया और जब अदालती दखल से मामला सुलझा तो कई सामाजिक और राजनीतिक संगठन फिल्म के खिलाफ लामबंद हो गए।

पिछले कुछ सालों से एक अजीब तरह की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है। भावनाएं आहत होने का झंडा उठा कर धार्मिक, सामाजिक या राजनीतिक स्तर पर ही नहीं व्यक्तिगत तौर पर भी किसी फिल्म का विरोध करना फैशन बन गया है। कई मौके तो ऐसे आए हैं जहां सेंसर हो जाने के बाद फिल्म को अनधिकृत सेंसर से जूझना पड़ा। ‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ पर खाप पंचायत ने मुजफ्फरनगर में प्रतिबंध लगा दिया। अहलानत खाप ने तो फिल्म के निर्देशक का सिर कलम करने का फरमान तक जारी कर दिया। ‘गुड्डू रंगीला’ के गीत ‘माता का इ-मेल’ को फिल्म से हटाने के लिए निर्माता को धमकियां दी गर्इं। फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन करने, सिनेमाघरों में तोड़फोड़ करने और अदालत तक का दरवाजा खटखटाने की कोशिश आए दिन होती है। अचानक कोई धार्मिक या सामाजिक संगठन उठ खड़ा होता है और शुरू हो जाता है फिल्म के किसी हिस्से की छीछालेदर करने का सिलसिला। ‘खाप : स्टोरी आफ आॅनर किलिंग’ को तो हिंसक प्रदर्शन के बाद हरियाणा के सिनेमाघरों से पहले ही दिन उतार दिया गया।

विरोध का आधार अक्सर बेहद हास्यास्पद होता है। दो साल पहले बुंदेलखंड में महिला हितों की सुरक्षा के लिए ‘गुलाबी गैंग’ बनाने वाली संपत पाल ने अदालत में फरियाद की कि फिल्म ‘गुलाब गैंग’ में उनके व्यक्तित्व और काम का विकृत चित्रण किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने संपतपाल की दलीलों को मान कर फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी। दो जजों की पीठ ने रोक हटा कर संपत पाल से सवाल किया कि उन्हें कब पता चला कि फिल्म उनकी जीवनी पर आधारित है तो विरोध जताने के लिए उन्होंने फिल्म के रिलीज होने का इंताजर क्यों किया? फिल्म देखकर अगर वे आपत्ति करतीं तो बात समझ में आती है। बिना फिल्म देखे उसका विरोध करना तो यही जताता है कि वे किसी न किसी तरह सुर्खियों में बने रहना चाहती हैं।

यह तो एक मिसाल है। हर दो तीन महीने में कोई न कोई फिल्म व्यक्तिगत, जातीय, सांप्रदायिक, सामाजिक या धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप में उलझ जाती हैं। 2013 में संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘राम लीला’ निशाने पर आई। उत्तर प्रदेश में बहराइच की मर्यादा पुरुषोत्तम राम लीला समिति ने फिल्म के शीर्षक और कुछ संवादों पर एतराज करते हुए याचिका दायर कर दी।

यह हालांकि पहली बार हुआ कि किसी फिल्म के रिलीज होने के बाद उस पर उंगली उठी। नहीं तो फैशन फिल्म की ऐन रिलीज से पहले विरोध जताने का रहा है। ‘राम लीला’ के शीर्षक पर धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने बवाल काटा तो फिल्म का नाम बदल दिया गया। इसके बावजूद फिल्म के रिलीज होने के करीब एक हफ्ते बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फिल्म के पूरे उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक लगा दी। जगह-जगह फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन हुए। पोस्टर फूंके गए। सिनेमाघरों में तोड़ फोड़ की गई।
इस तरह विरोध के निशाने पर आने वाली ज्यादातर फिल्में आम तौर पर सेंसर बोर्ड से हरी झंड़ी पा चुकी होती हैं। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या फिल्मकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। यह बहस का मुद्दा है कि फिल्मों में कितना और क्या स्वीकार किया जा सकता है?

फिल्मकारों की कल्पनाशीलता की क्या सीमा होनी चाहिए? ऐसी कोई स्पष्ट रेखा नहीं है कि फिल्म क्या दिखाए और क्या नहीं? सही-गलत का फैसला करने के लिए सेंसर बोर्ड है। अश्लीलता और क्रूरता को अनदेखा करने का उस पर जरूर आरोप लगता रहा है लेकिन धार्मिक या सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने वाली फिल्मों के प्रति सेंसरबोर्ड सतर्कता भी दिखाता है। पंजाबी फिल्म ‘साड्डा हक’ के एक प्रमोशन गीत में जरनैल सिंह भिंडरवाले, जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह राजोआना जैसे आतंकवादियों की तुलना सिख गुरु गोविंद सिंह से करने पर सेंसर बोर्ड ने फिल्म को पास नहीं किया। फिल्म किसी तरह पास हुई तो पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में उसके प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सेंसर बोर्ड कई स्तर की छानबीन के बाद फिल्मों को पास करता है। ऐसे में सेंसर बोर्ड की मंजूरी पाने वाली फिल्म पर प्रतिबंध की मांग करना इस वैधानिक संस्थान की उपयोगिता पर सवाल उठाता है। इससे तो यही संदेश जाता है कि सेंसर बोर्ड अक्षम है और वह पहली नजर में भांप नहीं पाता कि फिल्म का कोई अंश आपत्तिजनक है या नहीं?

सेंसर बोर्ड निमार्ताओं में इस बात के लिए शुरू से बदनाम रहा है कि वह संदर्भ जाने बिना फिल्मों पर बेतरतीब कैंची चला देता है। इसके बावजूद सेंसर प्रक्रिया से निकली फिल्मों को सामाजिक सेंसर का सामना करना पड़ता है। यह अपने आप में विचित्र बात है। आपत्ति अक्सर हास्यास्पद कुछ मामलों में फिल्मों को अदालत से राहत मिल जाती है लेकिन कई फिल्में अदालती फैसले का शिकार हो जाती है। यह न्यायिक व्यवस्था का दोष है कि अदालती फैसला जल्दी नहीं आ पाता। सवाल यह है कि सेंसर हो जाने के बाद भी अगर निर्माताओं को इधर-उधर के विरोध के बाद अपनी फिल्मों में और छंटाई करनी पड़े तो सेंसर बोर्ड को बचाए रखने का क्या औचित्य है? किसी संवाद या दृश्य में सामाजिक या धार्मिक भावनाएं आहत होने या व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होने को अगर सेंसर बोर्ड नहीं रोक सकता तो वह किस काम का है? सेंसर बोर्ड में हर संप्रदाय के लोग होते हैं जो बारीकी से इस बात की पड़ताल करते हैं कि फिल्म से किसी को धार्मिक भावना को ठेस न पहुंचे और उससे कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के हालात न बनें।

कई बार सेंसर बोर्ड इन्हीं कारणों से फिल्म में काफी काट-छांट कर देता है और कभी-कभी किसी फिल्म को रोक भी देता है। लेकिन सेंसर बोर्ड से पास होकर निकली फिल्म पर भी किसी न किसी आधार पर हमले करना, फिल्म का संदर्भ जाने बिना उसे धार्मिक भावनाओं के प्रतिकूल और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन बता कर उसका विरोध करना और उस पर यह दलील देना कि विरोध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक जरिया है, कहां तक सही है? कोई यह नहीं स्वीकार करता कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार फिल्मकार का भी है।