गुफा मानव की दीवार से लेकर फेसबुक की दीवार पर अभिव्यक्ति का आमंत्रण कि ‘वाट्स इन योर माइंड’ (आपके दिमाग में क्या है)। गुफा युग से ही मानव और दीवार का रिश्ता रहा है। यह आदिम अभिव्यक्ति से लेकर विभिन्न ऐतिहासिक कालों से आधुनिक युग तक जनसंपर्क का सबसे बड़ा औजार रहा है। जिसका माध्यम पर कब्जा होगा उसका सत्ता पर भी कब्जा होगा। आज जेएनयू में पोस्टरों पर प्रतिबंध लगाने की कवायद के बाद दीवार लेखन बहसतलब है। दीवारों पर आदिम अभिव्यक्ति और लोक की परंपरा से लेकर सत्ता के दखल तक पर बात कर रहे हैं सुशील राघव और मृणाल वल्लरी।
चर्च को ध्वस्त कर दो… दुनिया के मजदूरों एक हो… स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा… तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा… आप अपनी सरकारों से प्यार किए बिना अपने देश से प्यार कर सकते हैं… दिल्ली चलो, अयोध्या चलो…नारों और इबारतों से भरी दीवारें सभ्यता की कहानी हैं। गुफा मानव की सबसे पहली अभिव्यक्ति गुफा की दीवारों पर हुई। उसकी जरूरत भोजन से शुरू हुई, तो सबसे पहली अभिव्यक्ति उसी की थी। वह कैसा शिकार करता है, शिकार के पीछे कैसे भागता है, कौन-सा शिकार उसका प्रिय भोजन है यह दीवारों पर उकेरना शुरू किया। उसके दिमाग में क्या चल रहा है, यह दीवार पर उतरना शुरू हुआ। फिर इच्छाओं का विकास हुआ, उसे कैसा साथी चाहिए इसका भी इजहार दीवार पर हुआ। खंडहरों और ऐतिहासिक किलों में मिलते प्रेमी जोड़े ‘दीवार पर लिखना मना है’ के बगल में ‘राज लव्स सिमरन’ लिख कर अपना प्रेम दर्ज कर जाते हैं।
‘वाट्स इन योर माइंड (आपके दिमाग में क्या है)’ फेसबुक अपनी दीवार पर आज भी यही पूछ कर दो शब्द से लेकर हजारों शब्दों तक लिखवा डालता है। कल गुफा की दीवार पर आदिमानव का शिकार था, तो आज फेसबुक की दीवार पर जन्मदिन की बधाई से लेकर आज क्या खाया-पकाया है। गुफा मानव चित्र के द्वारा अभिव्यक्ति करता था तो इंटरनेट मानव के पास इमोजी है। हंसी, शर्म, गुस्सा, प्रणाम, मुक्का सबकी अभिव्यक्ति के लिए चित्र हैं। कागज के आविष्कार के पहले दीवार ही तो थी। इंसान और दीवार के बीच तीसरा कोई नहीं होता, तो अभिव्यक्ति दीवारों पर ही उभरती है। कई जेलें जहां दीवारों के सिवा कुछ नहीं था, वहां दीवारें कैदियों की कागज बनी। जेल की दीवारों पर कैदियों के उभरे भावों को लेकर कई मनोवैज्ञानिकों ने अध्ययन कर यह जानने की कोशिश की है कि इंसान के दिमाग को अपराध-मुक्त करने में दीवारों के पहरे की कोई भूमिका होती भी है या नहीं।
इंटरनेट की दीवार निजता की दीवार तोड़ कर सार्वजनिकता में भी प्रवेश करती है। एक ने वाट्सऐप पर कुछ लिखा और वह कई समूहों तक पहुंच गया। आपके फेसबुक की दीवार आपका पूरा चरित्र-चित्रण करती है, सिर्फ सेल्फी लगाई है या वैचारिकता का भी बोझ उठाया है। अपना कुछ लिखा है या दूसरों के शब्दों की उधारी है। दुनिया घूम-फिर कर दो शब्दों पर आती है लोक और परंपरा। अब चाहें हम पहली परंपरा की बात कर लें, दूसरी की या तीसरी की। सभ्यता ने जबसे दीवार का आविष्कार किया उस पर काबिज होने की सत्ता बनाम लोक की जंग छिड़ गई।
आज भी पारंपरिक हिंदू शादी का पहला करार दीवार से शुरू होता है। उत्तर और पूर्वी भारत के कई इलाकों में शादी की रस्मों में सबसे अहम है कोहबर लिखना। कोहबर के सैकड़ों गीत अब भी जीवित हैं और गाए जा रहे हैं। लड़की और लड़के का नाम एक साथ लिख कर मंगलकामना लिखी जाती है। पहले घर की पुताई और रंग-रोगन के वक्त इस मंगलकामना को सुरक्षित रख लिया जाता था। एक पीढ़ी के बाद जब अगली पीढ़ी आगे बढ़ती तो दीवार की मंगलकामना उसी तरह उसके नाम हो जाती, जिस तरह जमीन और जायदाद की वसीयत में उसका नाम आ जाता है। कोहबर की मंगलकामना का मालिकाना बदलता है। जन्म से लेकर शादी और मृत्यु के बाद श्मशान में दीवारों पर लिखे मरघट साहित्य पर भी नजर पड़ती है, क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाओगे।
दीवारें लोक और परंपरा की कहानी कहती हैं।
सिंधु घाटी की सभ्यता में दीवार की र्इंटों पर लिखे को पढ़ने की कोशिश भूत को समझ भविष्य से सतत संवाद के लिए ही है। सिंधु सभ्यता से लेकर दक्षिण भारत के मंदिर हों वहां की दीवारों ने वहां का इतिहास दर्ज कर लिया है। आधुनिक भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक जाती भारतीय रेलों के साथ पूरे भारत की दीवार लेखन और लोककला के दर्शन होते हैं। बिहार में मधुबनी रेलवे स्टेशन की दीवारों को स्थानीय कलाकारों ने मिथिला पेंटिंग से सजा दिया। पश्चिम बंगाल हो या महाराष्टÑ कई रेलवे स्टेशनों पर वहां के स्थानीय कलाकारों ने दीवारों पर अपनी परंपरा उकेर दी है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने जब मेरी दिल्ली मैं ही सवारूं और भागीदारी अभियान शुरू किया तो दिल्ली की दीवारों को सुंदर बनाने वाले कलाकारों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। दिल्ली में फ्लाईओवर के खंभों से लेकर सरकारी दीवारों को कलाकारों ने खूब कलात्मक बनाया।
सुभाषितानि, सूक्ति और विचार से लेकर विज्ञापन तक जिसे भी जनता तक पहुंचने की जरूरत महसूस हुई उसने दीवार का सहारा लिया। दीवारों पर कब्जे की एक वैचारिक लड़ाई भी शुरू हो गई। जिन राहों से देश की जनता से गुजरती है उन दीवारों पर राज करने की होड़ मची है। खास राजनीतिक रूझानों के लिए दिल्ली चलो से लेकर खानादानी शफाखाना तक। भारत की सड़कों पर यातायात के हर माध्यमों के साथ दीवार पर विज्ञापनों की कदमताल होती है। आज जमाना बाजार और विज्ञापन का है तो दीवार पर उसका ही कब्जा है। ‘ठंडा मतलब कोकाकोला’ से लेकर ‘आज कुछ तूफानी करते हैं’। दीवार पर ही सीमेंट का प्रचार है कि यह दीवार नहीं टूटेगी। दूर-दराज के गांवों की कच्ची मिट्टी की दीवार पर प्रचार है, सस्ता नहीं सबसे अच्छा। दीवार सस्ता को खारिज कर सबसे अच्छा की बात कर रहा है। जो जितना ज्यादा दीवारों पर रहेगा वही सबसे अच्छा माना जाएगा। सरकार ने भी दीवार का सहारा लेकर कह दिया, बच्चे दो ही अच्छे। दंपति जहां जाएंगे, वहां लिखा पाएंगे, हम दो हमारे दो और हम के बाद दो रखने का उपाय भी दीवार पर लिखा है। घूंघट की आड़ से भी कुछ तो पढ़ ही लिया जाएगा कुछ देख ही लिया जाएगा।
