स्कूल की छुट्टियां खत्म होने को हैं। जिन लोगों ने पहले से बाहर घूमने-फिरने की योजना बनाई होगी, वे घूम कर लौट चुके होंगे या घूमने निकल गए होंगे। पर, बहुत से लोग ऐसे होंगे, जो किन्हीं कारणों से बाहर घूमने नहीं जा पाए होंगे। खासकर जिन बच्चों की इस साल बोर्ड परीक्षाएं होने वाली होंगी, उन्हें चिंता लगी होगी कि कैसे अधिक से अधिक अपनी पढ़ाई पूरी की जाए। जो छोटी कक्षाओं के बच्चे हैं, उन्हें हॉलीडे होमवर्क पूरा करने की चिंता लगी होगी। पर, अब भी स्कूल खुलने में एक-डेढ़ हफ्ते का समय है, इस समय का बेहतर ढंग से इस्तेमाल कर सकते हैं। छुट्टिटयों का कैसे बेहतर उपयोग करें बता रहे हैं रवि डे।
मैदानी इलाकों में गरमी की छुट्टियां प्राय: जून के महीने में होती हैं, इसलिए कि इस महीने में तेज गरमी पड़ती है। लू चलती है और ज्यादा देर धूप और गरमी में रहने से बीमार पड़ने की आशंका बनी रहती है। मगर पहाड़ी इलाकों में ये छुट्टियां थोड़ा बाद में होती हैं- प्राय: जुलाई-अगस्त के महीने में, जब वहां बारिश शुरू हो जाती है। मैदानी इलाकों के शहरी लोग अक्सर गरमी की छुट्टियां मनाने के लिए ऐसी जगहों पर जाते हैं, जहां पर गरमी कम पड़ती है। ऐसे में पहाड़ उनके पसंदीदा जगह होते हैं। यही वजह है कि इन छुट्टिटयों में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों पर सैलानियों की भीड़ सामान्य दिनों की अपेक्षा काफी बढ़ जाती है। इस तरह वहां रहने-ठहरने, घूमने-फिरने में दिक्कतें भी पेश आती हैं। जो लोग पहाड़ों पर गरमी की छुट्टियां बिता आए हैं, वे इन दुश्वारियों से वाकिफ होंगे। पर जो अभी कहीं नहीं गए हैं, वे अपनी छुट्टियों की योजना बना सकते हैं।
आसपास की जगहों को देखें
छुट्टियां बिताने का मतलब सिर्फ पहाड़ नहीं होता, आपके शहर-कस्बे के आसपास की जगहों पर भी बहुत कुछ ऐसा देखने, घूमने लायक होता है, जिसे आप प्राय: देखने से टालते रहे हैं। बच्चों को छुट्टिटयों में घुमाना हो, तो अपने आसपास ऐसी जगहों का चुनाव कर सकते हैं, जहां ऐतिहासिक, धार्मिक महत्त्व की चीजें हैं। पहाड़ों पर ठंडक और पेड़-हरियाली देख कर मन को अच्छा जरूर लगता है, पर ऐतिहासिक-धार्मिक महत्त्व की जगहों पर घूमने से बच्चों को उन्हें पाठ्य-सहायक बहुत सारी सामग्री देखने-समझने को मिल जाती है, जिनके बारे में वे किताबों में तो पढ़ते रहते हैं, पर उन्हें प्रत्यक्ष देखने का मौका नहीं मिलता। जैसे दिल्ली के लोग शिमला, कुल्लू-मनाली, नैनीताल, देहरादून जाने के बजाय आगरा, मथुरा, वृंदावन या फिर दिल्ली के आसपास बिखरी ऐतिहासिक धरोहरों को देखने का कार्यक्रम बना सकते हैं।
अपने आसपास की जगहों पर घूमने का कार्यक्रम बनाने में सुविधा यह होती है कि आप दिन भर में घूम-फिर कर वापस आ सकते हैं। इसके लिए न तो होटल बुक कराने की जरूरत होती है न रेल का टिकट। इन जगहों पर अपनी गाड़ी लेकर या स्थानीय परिवहन सुविधा का लाभ उठाते हुए पहुंच सकते हैं। ऐसी जगहों पर घूमने का कार्यक्रम आप सप्ताहांत में भी बना सकते हैं।
स्थापत्य और पुरातत्त्व को समझें
जब भी बच्चों को लेकर ऐतिहासिक या धार्मिक स्थलों पर जाएं, तो वहां की इमारतों, पुरातात्त्विक अवशेषों को स्थापत्य यानी उस जमाने में घर-इमारतें बनाने में किस तकनीक और हुनर का उपयोग होता था, उसे समझने का प्रयास करें। बच्चों को उनके बारे में बताएं। अगर हो सके, तो उनके बारे में उनकी किताबों में लिखी बातों से जोड़ कर समझाएं। इस तरह बच्चों को उन जगहों को देखने में बहुत आनंद आएगा। धार्मिक जगहों पर मंदिरों का महत्त्व सिर्फ देवी-देवताओं की वजह से नहीं, बल्कि स्थापत्य की वजह से भी होता है। हमारे देश में मंदिर और धार्मिक स्थल स्थापत्य कला के भंडार हैं। बच्चों को उनकी बनावट और उन पर उकेरी गई रचनाओं को समझने के लिए प्रेरित करें।
इसी तरह आपके आसपास पुराने जमाने के कुएं-बावड़ियां वगैरह होंगी, उनके बारे में दिखा-समझा और जल संचय का महत्त्व बता सकते हैं। इन कुएं बावड़ियों के माध्यम से पानी की संस्कृति, लोक संस्कृति के अनेक पक्षों को समझ और समझा सकते हैं।
अब तो महानगरों के आसपास निजी प्रयासों से ऐसी जगहें भी बन गई हैं, जहां बच्चे पुरानी चीजों को देख-समझ सकते हैं। वहां लोक संस्कृति की झलक पा सकते हैं। बच्चों को ऐसी जगहों पर भी ले जाया जा सकता है।
दोस्तों-रिश्तेदारों से मेल-मिलाप
पहले गरमी की छुट्टिटयों में बच्चे अपनी दादी-नानी के घर जाया करते थे। वहां खेत-खलिहान, बगीचों में खेलते-कूदते और आनंद से भर जाया करते थे। अब शहरी जीवन में सुख-सुविधाओं के आदी बच्चे गरमी में गांव जाने से प्राय: बचते हैं। पर गांवों में अब भी बहुत सारी पुरानी परंपराएं और खेल वगैरह बचे हैं, जिनके बारे में बच्चे किताबों में तो पढ़ते हैं, पर उन्हें प्रत्यक्ष रूप से देखते-जानते नहीं। गांव जाकर वे उन सारी चीजों से परिचित होते हैं, बहुत सारे नैतिक मूल्य सीखते हैं, जो शहरों में प्राय: नहीं मिलता। गांवों के नदी-पोखर, फसलों आदि से भी परिचित हो पाते हैं।
रिश्तेदारों के घर छुट्टियां मनाने का फायदा यह भी है कि बच्चे सामाजिकता सीखते हैं, वे जान-समझ पाते हैं कि जीवन केवल सुख-सुविधाओं, फैशन का नाम नहीं है। वे देसी खानपान, लोकाचार से परिचित हो पाते हैं। इस तरह वे शहरी होने के दंभ में गांव के गंदे-से दिखते लोगों से दूरी बना कर नहीं रहते। वे अपने आसपास के गरीब और मैले-कुचैले कपड़े पहने बच्चों से सहानुभूति का रिश्ता बना पाते हैं। इसी तरह बच्चों को अपने करीबी दोस्तों के घर ले जाएं, उन्हें उनके बच्चों के साथ मेल-मिलाप बढ़ाने को प्रोत्साहित करें। इससे बच्चे एक-दूसरे से अपने अनुभव साझा करते और कई नई बातें सीखते हैं। समाज में मेल-जोल रखने से आदमी बहुत कुछ सीखता है। एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आना सीखते हैं। मेल-जोल से वे आपके रिश्तेदारों और दोस्तों से निकटता हासिल करते हैं और वह रिश्ता ताउम्र कायम रहता है।
छुट्टियों में गृहकार्य
गरमी की छुट्टिटयों में छोटी कक्षाओं के बच्चों को आमतौर पर गृहकार्य मिलता है। उसमें पाठ्यक्रम से जुड़ी चीजें तो होती ही हैं, ज्यादातर चीजें उनके कौशल विकास और पाठ्य सहायक सामग्री के तौर पर उन्हें सीखने-समझने के लिए प्रेरित करने के मकसद से दी जाती हैं। उनसे प्राय: छुट्टिटयों में बिताए दिनों के अनुभव साझा करने को कहा जाता है। ज्यादातर बच्चे बढ़-चढ़ कर अपनी पहाड़ों आदि पर बिताई छुट्टिटयों के अनुभव लिखते हैं। जो बच्चे पहाड़ों वगैरह पर नहीं जा पाते, वे प्राय: मायूस हो जाते हैं या हीन महसूस करने लगते हैं। इस तरह उनका गृहकार्य करने में मदद करें और उन्हें समझाएं कि छुट्टियां बिताने का मतलब सिर्फ पहाड़ों पर जाना या समंदर में तैरना नहीं होता।
उनके अनुभवों में ऐतिहासिक-धार्मिक स्थलों के महत्त्व को शामिल करें, दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलने, ग्रामीण संस्कृति, लोकाचार आदि के महत्त्व के बारे में लिखने को कहें। इस तरह बच्चे अपने समाज को समझते और उससे लगाव महसूस करते हैं। लोककलाओं, जैसे कुम्हारी, बढ़ईगीरी, लुहारी आदि के बारे में समझाएं, दिखाएं, बताएं और उनके बारे में उनसे लिखने को कहें। इस तरह बच्चों के मन में पहाड़ या समंदर देखने का मलाल नहीं रहेगा, बल्कि वे पर्यटन को अलग दृष्टि से देख और समझ पाएंगे।
