श्रीश चंद्र मिश्र

फिल्मी सितारों की राजनीति में बढ़ती सक्रियता ने यह सवाल फिर प्रासंगिक कर दिया है कि चुनाव के वक्त उन पर न्योछावर होने वाली पार्टियां क्या इस बार राजनीति में उनकी कोई उपयोगिता बनने देंगी? अपवाद जरूर रहे हैं, लेकिन आमतौर पर चुनाव में फिल्मी सितारों की लोकप्रियता को भुनाने के बाद उन्हें नेपथ्य में धकेल देने की प्रथा तकरीबन हर पार्टी में रही है। शायद सितारों की प्रशासनिक क्षमता पर कोई भरोसा करने को तैयार नहीं है। ओडिशा में मंत्री रह चुके पंचानन कानूनगो ने एक बार फिर टिप्पणी की थी- ‘हम नेता लोग तो घटिया नौटंकी में व्यस्त रहने की वजह से मतदाताओं को ज्यादा लुभा नहीं पाते। फिल्मी सितारे ज्यादा रोचक नौटंकी कर सकते हैं, इसलिए चुनाव में वे सबके दुलारे हो जाते हैं।’ कुछ हद तक यह सही भी है। फिल्मी सितारों ने पिछले कुछ सालों में राजनीति में अपनी आमद तो बढ़ाई ही है, वोटरों को लुभाने में खासी सफलता भी पाई है। 1967 में पहली बार कांग्रेस ने एक पहल की थी, तेलुगू अभिनेता कोंगरा जगैया को आंध्र प्रदेश की ओंगोल सीट से चुनाव लड़ा कर। वे तकरीबन अस्सी हजार वोटों से चुनाव जीत भी गए। सत्तर के दशक में उड़िया सिनेमा से जुड़े सरत पुजारी, प्रफुल्ल कर, धीर बिस्वाल आदि ने राजनीति में हाथ आजमाया, लेकिन नाकाम रहे।

क्षेत्रीय राजनीति में फिल्मी आधिपत्य तो उससे पहले से जमना शुरू हो गया था, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति पर उसका असर तो तब दिखना शुरू हुआ जब अपनी सकुचाहट तोड़ कर मुंबइया सितारे मैदान में उतरे। उससे पहले सितारों की राजनीति से वितृष्णा कई कारणों से रही। एक तो वे अपने जमे-जमाए करिअर को छोड़ने का खतरा नहीं उठाना चाहते थे। दूसरे, राजनीति में सक्रिय रहने के लिए जिस ऊर्जा और समझ की जरूरत होती है, सितारों को शायद खुद में इसका अभाव दिखा। चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने वाले अपने साथियों की ‘दुर्दशा’ भी उन्हें उत्साहित न करने की एक वजह रही। दक्षिण भारत में राजनीति में उतरे लोगों को जो सम्मान, सत्ता और अधिकार में जिस तरह की भागीदारी मिली, वह मुंबई की फिल्मी हस्तियों को एक-दो मामलों को छोड़ कर नसीब नहीं हो पाई। गोविंदा इसीलिए कांग्रेस से नाराज हुए और शत्रुघ्न सिन्हा ने थक-हार कर पाला बदल लिया। सुनील दत्त ने 1984 से 2004 तक लगातार पांच बार सांसद रह कर फिल्मी सितारों में सबसे बेहतर साबित होने का रिकार्ड बनाया, लेकिन जीवन के आखिरी पड़ाव में कहीं जाकर केंद्र में उन्हें मंत्री का पद दिया गया और वह भी राज्यमंत्री का।

दूसरी पारी में कुछ ही चमके: दिलचस्प है कि चुनावी राजनीति में वही सितारे उतरे हैं, जिनकी अभिनय की पारी या तो खत्म हो गई या डगमगाने की स्थिति में आ गई। इसका एक सकारात्मक पहलू भी है। क्षेत्रीय राजनीति में जिस तरह का फिल्मी आधिपत्य रहा, उसका राष्ट्रीय राजनीति पर असर तब दिखा, जब मुंबइया सितारे मैदान में उतरे। 1967 की पहली दस्तक के बाद 1971 और 1977 में फिल्मी प्रतिनिधित्व शून्य रहने के बाद 1980 में अभिनेत्री वैजयंतीमाला ने इस जड़ता को तोड़ा। वे 1980 में पहले नई दिल्ली और फिर 1984 में मद्रास (दक्षिण) से दो बार चुनाव जीतीं। तब तक वे फिल्मों से रिटायर हो चुकी थीं। संसद में सजावटी ही रहीं। गांधी परिवार के करीब रहे अमिताभ बच्चन 1984 में इलाहाबाद से सांसद चुने गए थे और वह भी हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे दिग्गज को एक लाख सतासी हजार वोटों से हरा कर। पर इसमें उनकी खुद की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा कम, अपने पारिवारिक मित्र राजीव गांधी की मदद करने की मंशा ज्यादा थी। वैसे भी उन दिनों अमिताभ का करिअर ढीला चल रहा था। ऐसे में थोड़ी-बहुत राजनीतिक व्यस्तता वे झेल सकते थे। हालांकि उसके बाद बोफर्स मामले को लेकर जो छींटाकशी हुई उससे राजनीति से उनका मोहभंग हो गया। इंदिरा गांधी परिवार से उनकी दूरियां भी बढ़ गईं। बाद में मुलायम सिंह यादव से बरास्ते अमर सिंह उनकी नजदीकी बढ़ी। सपा के लिए उन्होंने चुनाव प्रचार भी किया लेकिन खुद राजनीति में नहीं उतरे। हां, उनकी पत्नी जया भादुड़ी जरूर सपा के समर्थन में राज्यसभा पहुंची। हालांकि तब तक उनका भी अभिनय से नाता विशेष आग्रह पर या लिहाज में कुछेक फिल्में कर लेने तक ही सीमित रह गया था।

राजनीति में सबसे लंबी पारी सुनीलदत्त ने खेली। मुंबई से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक पदयात्रा कर उन्होंने राजनीति की शुरूआत की। मुंबई उत्तर पश्चिम के अपने निर्वाचन क्षेत्र से वे कभी नहीं हारे। 1984 से 2004 तक वे पांच बार सांसद रहे। वे राजनीति में किसी स्वार्थ या पद लालसा में नहीं कूदे थे। एक आदर्श जनप्रतिनिधि को अपने क्षेत्र के लोगों की आकांक्षाओं और तकलीफों के प्रति कितना संवेदनशील होना चाहिए, इसकी मिसाल थे सुनील दत्त। यह सच है कि पहली बार सांसद बनते समय अभिनय से उनका वास्ता टूट चुका था। और निर्माता-निर्देशक के रूप में भी वे पहले जितना सक्रिय नहीं रह पाए थे। इसके बावजूद उनकी एक हैसियत थी, सम्मान था। लेकिन उन्होंने कभी मंत्री पद नहीं चाहा। राज्य की राजनीति में टांग नहीं अड़ाई। आखिरी दिनों में उन्हें खेल एवं युवा मामलों का सामान्य-सा विभाग देकर केंद्र में मंत्री बनाया गया। उस दायित्व को भी उन्होंने पूरी निष्ठा से निभाया। बाद में उनकी जगह उनकी बेटी प्रियादत्त सांसद बनीं। सुपर स्टार की परिभाषा गढ़ी गई राजेश खन्ना के लिए। उनका जलवा जब फिल्मों में कम होने लगा तो उन्होंने राजनीति का दामन थाम लिया। नई दिल्ली से लोकसभा का चुनाव लड़ा। 1991 में वे भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी से सिर्फ 1589 वोट से हारे। 1992 के उपचुनाव में उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा को अट्ठाईस हजार वोटों से मात दी। 1996 में वे हार गए। लेकिन राजनीतिक पारी में फिल्मों जैसा करिश्मा वे नहीं दिखा पाए। न तो कोई स्क्रिप्ट लिखने वाला था और न निर्देशन देने वाला। फिल्मी लटकों-झटकों को तो लोग पहले ही नकार चुके थे। लिहाजा, राजनीति में उन्हें कौन पूछता? सलमान खान के साथ फिल्म ‘बागी’ से अपने फिल्मी करिअर की शुरुआत करने वाली नगमा 2009 के आम चुनाव में टिकट की दावेदार थीं, पर कांग्रेस ने उनके फिल्मी ग्लैमर का इस्तेमाल कर चुनाव प्रचार में ही उन्हें झोंके रखा। 2014 में नगमा को चुनावी मैदान में उतार दिया गया। फूलपुर (उत्तर प्रदेश) से वे टिकट चाहती थीं, लेकिन कांग्रेस ने वह सीट क्रिकेटर मोहम्मद कैफ की झोली में डाल कर नगमा को मेरठ थमा दिया। वहां वे मात खा गईं।

लंबी पारी के सितारे: आजम खान के विरोध के बावजूद समाजवादी पार्टी के टिकट पर रामपुर से 2004 और 2009 में लोकसभा का चुनाव जीती जयाप्रदा ने 2014 में कांग्रेस का दामन थाम कर मुरादाबाद से चुनाव लड़ना चाहा। इससे पहले उन्होंने चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी में भी अपने लिए संभावना तलाशी थी। चंद्रबाबू के ससुर एनटीआर ही जयाप्रदा को राजनीति में लाए थे। कहीं दाल नहीं गली। कांग्रेस समाजवादी पार्टी को नाराज नहीं करना चाहती थी। लिहाजा, उसने जयाप्रदा और उनके राजनीतिक संरक्षक अमर सिंह को अपने सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल में ठौर दिला दिया और बिजनौर से चुनाव लड़वा दिया। भाजपा के सहारे अब वे रामपुर में आजम खान के मुकाबले खम ठोक रही हैं। चुनावी सभाओं में भारतीय जनता पार्टी का प्रचार करते हुए सालों फिल्म ‘शोले’ के बसंती वाले संवाद सुना कर भीड़ का मनोरंजन करने वाली ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी को इस सेवा का प्रतिफल राज्यसभा की सदस्यता के रूप में तो मिल गया। पर अब उनकी महत्त्वाकांक्षा लोकसभा में पहुंचने की थी। दिल्ली में भाजपा को ठीकठाक उम्मीदवार खोजे नहीं मिल रहा था, तो पार्टी ने हेमा मालिनी पर निगाह टिकाई। हेमा ज्यादा उत्सुक नहीं दिखीं, तो उनकी मनपसंद मथुरा सीट उनके हवाले कर दी गई। करीब तीन लाख तीस हजार वोटों से वे जीतीं और बकौल उनके, आखिरी बार वे फिर चुनाव मैदान में हैं।

मुंबई में बारह रुपए में एक व्यक्ति को भोजन उपलब्ध होने की बात कह कर विवादों में घिर गए राज बब्बर आगरा से होते हुए फिर फतहेपुर सीकरी सीट पर पहुंच गए हैं। पिछले बीस साल के राजनीतिक सफर में उन्होंने अपनी राजनीतिक निष्ठा जरूर बदल ली है। दो बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर आगरा से सांसद रहे राज बब्बर के लिए कांग्रेस में जाकर 2009 का चुनाव फतेहपुर सीकरी से लड़ना भारी पड़ गया। यह खुशकिस्मती रही कि फिरोजाबाद सीट पर उपचुनाव हुआ और राज बब्बर अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल को हरा कर फिर लोकसभा पहुंच गए। 2014 में वे गाजियाबाद में पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह से हार गए। लंबी चुनावी पारी खेलने वालों में शत्रुघ्न सिन्हा भी हैं। दो बार वे राज्यसभा के सदस्य रहे और 1999 में जब भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी तो वे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री रहे। शत्रुघ्न सिन्हा के बड़बोलेपन को ‘खामोश’ न कर पाने की वजह से भाजपा की कई बार किरकिरी हुई। इसके बावजूद बिहार के पटना साहिब से उन्हें 2014 में फिर टिकट दे दिया गया। इस बार वे कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। खलनायक से नायक बन कर शत्रुघ्न सिन्हा की ही तरह मिसाल कायम करने वाले विनोद खन्ना ने भी राजनीतिक पारी की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी के आंगन से ही की। 1997 में वे भाजपा से जुड़े और चार बार गुरदासपुर (पंजाब) से सांसद रहे। वे एनडीए सरकार में संस्कृति एवं पर्यटन और विदेश मंत्रालय में राज्यमंत्री का पद संभाल चुके हैं। 2009 के आम चुनाव में उनकी हार ने उनके राजनीतिक भविष्य पर जो सवालिया निशान लगा दिया था उसे 2014 में फिर जीत पाकर उन्होंने खत्म कर दिया। विनोद खन्ना ने लो प्रोफाइल में रह कर किसी भी तरह के राजनीतिक वाद-विवाद में उलझने से खुद को बचाए रखा और राजनीति मे कुछ पाने की लालसा न रख फिल्मों में ही ठिकाना तलाशने पर जोर दिया। लंबी पारी खेलने वालों में कन्नड़ सिनेमा के स्टार अंबरीश भी रहे। दो बार वे कांग्रेस के टिकट पर और एक बार जनता दल उम्मीदवार के रूप में कर्नाटक की मांड्या सीट से वे तीन बार चुनाव जीते और कुछ समय के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में राज्यमंत्री भी रहे।

पहल सबको नहीं फली: धर्मेंद्र 2004 में बीकानेर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। लोगों ने उन्हें सिर माथे लिया। वे कोशिश करते तो सुनील दत्त की तरह एक अच्छे जनप्रतिनिधि की साख बना सकते थे। धर्मेंद्र के करीबियों का कहना है कि राजनीति के दांवपेज वे समझ नहीं पाए जबकि बीकानेर के लोगों को शिकायत रही कि उनसे सांसद के पास उनकी बात सुनने का कभी समय ही नहीं रहा। एक बार तो पूरे बीकानेर में धर्मेंद्र के गुमशुदा होने के पोस्टर तक लग गए। गोविंदा को भी राजनीति रास नहीं आई। 2004 मुंबई (उत्तर) से उन्होंने भाजपा के कद्दावर नेता राम नाइक को शिकस्त दी। गोविंदा को शायद राजनीति में बहुत कुछ पाने की आकांक्षा थी। वह पूरी नहीं हुई। उधर इलाके के लोगों की उनसे नाराजगी बढ़ती गई। लिहाजा 2008 में उन्होंने कांग्रेस और राजनीति को टाटा कर दिया। अब इसी सीट से उर्मिला मांतोडकर उम्मीदवार हैं। शेखर सुमन कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा के मुकाबले 2009 में उतरे। तीसरे स्थान पर रहने की वजह से उनका राजनीति से मोहभंग हो गया। 2009 में ही समाजवादी पार्टी के टिकट पर गोरखपुर से चुनाव लड़े भोजपुरी स्टार मनोज तिवारी तीसरा स्थान ही पा सके। 2014 में उत्तर पूर्वी दिल्ली से उन्हें जरूर सहारा मिल गया। सालों पहले एकमात्र हिंदी फिल्म ‘अबोध’ (यह माधुरी दीक्षित की भी पहली फिल्म थी) में नजर आए तपस पाल दो बार विधायक रहने के बाद 2009 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर कृष्णनगर से लोकसभा पहुंचे, लेकिन अपना कद नहीं बढ़ा पाने से हताश हो गए। अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी विजया शांति 2009 में तेलंगाना राष्ट्र समिति के टिकट पर मेंढक (आंध्र प्रदेश) से चुनाव जीती। कुछ बड़ा पाने की चाह में कांग्रेस से नाता जोड़ा तो फिर चुनाव ही नहीं लड़ पार्इं। यही स्थिति मांड्या (कर्नाटक) से 2013 के उपचुनाव में जीतने वाली रामय्या की भी रही।

पिछले आम चुनाव में तो राजनीति में पहल करने वाले सितारों की भरमार रही। तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार मुनमुन सेन ने पश्चिम बंगाल की बांकुड़ा सीट पर माकपा के दिग्गज नेता और नौ बार के सांसद बासुदेव आचार्य को एक लाख वोटों से हरा कर सनसनी मचा दी। मेदिनीपुर से तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर संध्या राय भी जीतीं। इस बार ममता बनर्जी ने उनकी जगह नुसरत जहां (बशीरहाट) और मिमी चक्रवर्ती (दक्षिण 24 परगना) के ग्लैमर पर दांव लगाया है। 2014 में तृणमूल कांग्रेस के विश्वजीत भी नई दिल्ली से उम्मीदवार थे लेकिन वे अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए थे। अमदाबाद (पूर्व) से भाजपा के परेश रावल 2014 में तीन लाख चौबीस हजार वोटों से जीत कर भी इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। हेमा मालिनी आखिरी बार चुनाव मैदान में हैं, तो बाबुल सुप्रियो (आसनसोल), किरण खेर (चंडीगढ़) और मनोज तिवारी (उत्तर-पूर्वी दिल्ली) दूसरे मौके की आस में हैं। भोजपुरी और हिंदी फिल्मों के अभिनेता रवि किशन 2014 में कांग्रेस के टिकट पर जौनपुर (उत्तर पूर्व) में मात खाने के बाद अब भाजपा के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की फिराक में हैं।