आप रंगहीन समाज की कल्पना नहीं कर सकते। संस्कृति का तो तकाजा ही बहुरंगता के आशय के साथ शुरू होता है। ऐसे में एक ऐसे त्योहार की चर्चा करना जो रंग और रंगों से जुड़े हर मिजाज को अपनी परंपरा और शिनाख्त के साथ जोड़ता है, अपने देश-समाज और परंपरा को एक समृद्ध सांस्कृतिक अभिप्राय के साथ समझना भी है। वैसे भी होली पर्व प्रह्लाद और होलिका के पौराणिक प्रसंग से भले जुड़ता हो पर इसका असली रंग तो घर-परिवार, गांव-कस्बों, मोहल्लों-कॉलोनियों में बसने वाली सामाजिकता में ही देखने को मिलता है। वह सामाजिकता जो एक दिन में नहीं बल्कि सालों-पीढ़ियों में बनी है, गाढ़ी हुई है।
होली का रंग अब थोड़ा बदरंग जरूर हो गया है और खास तौर पर महिलाएं इसे मनाने से बचने लगी हैं। पर फिर भी देश के ज्यादातर हिस्सों और परिवारों में यह पर्व उत्साह, मस्ती और आनंद की सौगात लेकर तो हर साल आता ही है। दिलचस्प है कि एक लोकपर्व के रूप में इस अनूठे त्योहार की लोकप्रियता पूरी दुनिया में इस कदर फैली है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की बेटी तक फगुनाहट की मस्ती में सराबोर होने के लिए राजस्थान पहुंच जाती हैं। यही नहीं, वाइट हाउस से आगे कनाडा और इंग्लैंड के राज दरबारों में भी अब गुलाल उड़ने लगे हैं। यह होली के साथ भारतीय डायस्पोरा का विस्तार तो है ही, उसकी स्वीकृति का भी रंगारंग एलान है।
देखो कुंअर जी दूंगी गारी
वैसे तो होली पूरे देश में मनाई जाती है पर अलग-अलग सांस्कृतिक अंचलों की होली की अपनी खासियत है। हां, एक बात जो सभी जगहों की होली में सामान्य है, वह है महिलाओं और पुरुषों के बीच रंग खेलने के बहाने अनूठे विनोदपूर्ण और शरारत से भरे प्रसंग। ये प्रसंग शुरू से होली की पहचान से जुड़े रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इस मस्ती में नहाने वाले कोई एक धर्म या संप्रदाय के लोग हों। आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर की लिखी होली आज भी लोग गाते हैं- ‘क्यों मोपे रंग की मारे पिचकारी, देखो कुंअर जी दूंगी गारी।’
फिल्मों के गीत याद करें तो चुहल और ठिठोली के कई बोल जेहन में एक के बाद एक आने लगते हैं। ‘मदर इंडिया’ के गीत ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे, सुना दे जरा बांसुरी’ से लेकर नए दौर में फिर से बनी फिल्म ‘वक्त’ के ‘गिव मी ए फेवर लेट्स प्ले होली…’ तक फिल्मी होली गीतों की ऐसी पूरी शृंखला है, जहां होली के रंगों के बीच अभिनेता-अभिनेत्री के बीच दिलचस्प छेड़छाड़ चलती है। कुछ अरसे पहले हिंदी की एक बड़ी लेखिका ने दीपिका और रणबीर कपूर की ‘बलम पिचकारी तूने मुझे मारी’ के बहाने फिल्मी होली की मस्ती को लेकर यह लिख दिया कि इस गीत ने नए दौर को होली के पुराने सुरूर से जोड़ दिया है, सो अब इस गीत की गिनती भी श्रेष्ठ फिल्मी होली गीतों में होनी चाहिए।
लेखिका की राय से साहित्य के पारंपरिक सौंदर्यबोध के मतवाले भले थोड़ा भिन्नाएं हों और इसे लोकपर्व, लोक परंपरा और लोक सौंदर्य की चलताऊ या बाजारू व्याख्या करार दें, पर इतना तो कहना ही होगा कि ‘होली आई रे कन्हाई’ से आगे रेट्रो फेज की फिल्मों ने होली का एक पूरा दौर जीया है, जिसमें राजेश खन्ना से लेकर अक्षय कुमार तक सब शामिल हैं। नए दौर में तो लोग ‘देवदास’ के रूमानी पाठ को भी ‘देव डी’ के रूप में देख-पढ़ कर खुश होते हैं, सो उनकी होली भी घघरा-चोली से आगे हॉट पैंट में खेली जा रही है। सवाल है कि इस बदलाव पर सिर धुनने के बजाय इसे दुनिया के सबसे युवा देश की सबसे युवा सच्चाई के तौर पर क्यों न देखा जाए।
‘बंगला पे उड़ेला गुलाल’
बात पुरबिया होली की करें तो यहां होली का रंग सबसे ठेठ और अल्हड़ मस्ती से सराबोर है। यहां की होली का मस्ताना रंग यहां के लोकगीतों में भी बखूबी छिटका है। ‘बंगला पे उड़ेला गुलाल…’ से लेकर ‘अंखिया लाले लाल…’ तक कई ऐसे पारंपरिक गीत हैं, जो आज भी गाए जाते हैं। दुखद है कि पारंपरिकता के इस अनमोल रंग में कुछ संगीत कंपनियां और लोक गायक फूहड़ता की मिलावट कर रहे हैं। बातचीत के क्रम में लोकगायिका मालिनी अवस्थी बताती हैं, ‘पारंपरिक होली गीतों की विरासत काफी समृद्ध और विविधता से भरी है। बाजार के दौर में लोकगायकी को थोड़ा मिलावटी रंग जरूर दिया है पर आज भी पारंपरिक होली गीतों के कद्रदान ही ज्यादा हैं।’
लैंगिक समरसता का लोक
बिहार में इतिहास के प्राध्यापक डॉ. शालिग्राम सिंह कहते हैं कि राधा-कृष्ण से लेकर जोधा-अकबर तक के विनोदपूर्ण होली प्रसंग देश में होली की परंपरा को रेखांकित करते हैं। पर ये प्रसंग अब न सिर्फ इकहरे और अशोभनीय तब्दीली तक जा पहुंचे हैं बल्कि इसने जाने-अनजाने महिलाओं को लैंगिक समरसता वाले लोक-संस्कारों से अलगाना शुरू कर दिया है। यह आलम घर-दफ्तर से लेकर स्कूल-कॉलेज तक सब जगह एक जैसा है। यह एक चिंता बढ़ाने वाली स्थिति है और इसका उपाय कानूनी पहल या प्रशासनिक सख्ती नहीं है। इसके लिए भरोसा एक बार फिर लोक विवेक पर ही करना होगा। सावधानी बरतनी होगी कि विकास, बदलाव या आधुनिकता से भरे होने की ललक में हम लोकाचार की बड़ी पूंजी को न गंवा बैठें।

