एक औरत की डायरी से
प्रसिद्ध रंगकर्मी उमा झुनझुनवाला ने डायरी के पृष्ठ ‘एक औरत की डायरी से’ पुस्तक में नए अंदाज में समेटे हैं। यह डायरी और डायरियों से इस मायने में अलग है कि इसमें तारीखें नहीं हैं, ब्योरों की मोटी तफ्सीलें नहीं हैं। दिनांक बदल जाते हैं, घटनाओं के ब्योरों की शक्ल भी बदल जाती है लेकिन उन अनुभवों से गुजरते हुए मनुष्यों की पीड़ाओं की अंतर्धारा नहीं बदलती। जैसे नाटक हमेशा वर्तमान में घटित होता है, यह डायरी भी अतीत को वर्तमान में स्थापित कर देती है। यह महज लेखिका की डायरी नहीं, बल्कि यह किसी भी स्त्री के विश्वास और उसके टूटने तथा उससे उपजी मनस्थितियों के आरोह-अवरोह, द्वंद्व, विषाद, दृश्य-अदृश्य की पीड़ा आदि का लेखाजोखा है, जहां एक औरत के भीतर जीती दो औरतें या फिर एक औरत के भीतर जीती कई-कई औरतें बड़बड़ाती-सी प्रतीत होती हैं। इसके पन्नों में दर्द की अपनी कहानी है, जो एक पात्र से निकल कर दूसरे से होते हुए कई जानी-अनजानी स्त्रियों को छूते हुए, उन्हें कुरेदते हुए पृष्ठ-दर-पृष्ठ आगे बढ़ती है। इन पन्नों में औरतों के मनोभावों को समझने का प्रयास है और इसीलिए इस डायरी के पन्नों को न तो किसी तारीख में बांधा गया है और न ही दिन में। उन्होंने इसके कुछ पृष्ठों का मंचन भी किया है।
एक औरत की डायरी से : उमा झुनझुनवाला; एपीएन पब्लिकेशंस, डब्ल्यू जेड-87 ए, गली नं. 3, हस्तसाल रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली; 200 रुपए।
101 सदाबहार कहानियां
यह सदाबहार कहानियों, रोचक किस्सों और चुटकुलों का संग्रह है, जो पाठकों को महापुरुषों, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों की रोमांचक दुनिया की सैर पर ले जाता है। कहानियां और चुटकुले गहरी-से-गहरी बात को आसानी से मन की गहराइयों तक पहुंचाने का हमेशा से सर्वश्रेष्ठ माध्यम रहे हैं। मनुष्य अपने जीवन की हजारों उलझनों में फंसा हुआ है। शारीरिक हो या मानसिक, सांसारिक हो या व्यावसायिक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जहां वह संघर्ष न कर रहा हो। जाहिरा तौर पर संघर्ष किसी को पसंद नहीं आते, मनुष्य इनसे छुटकारा चाहता है। मनुष्य का जीवन के संघर्षों से छुटकारा हो सके, इस संबंध में महान लोगों द्वारा अनेक मनोवैज्ञानिक तरीके बताए गए हैं। मगर उनकी गहराइयों में जाकर उनका फायदा उठाना हरेक के लिए आसान नहीं होता। जब वही बातें कहानियों और चुटकुलों का सहारा लेकर समझाई जाएं तो वे ज्यादा असरकारक और फायदेमंद साबित हो सकती हैं। दीप त्रिवेदी ने इस संकलन में न सिर्फ कई प्रचलित श्रेष्ठ कहानियों और चुटकुलों को अतिरिक्त रोचकता प्रदान करते हुए उनके मनोवैज्ञानिक पहलुओं को उभारने की कोशिश की है, बल्कि सरल-से-सरलतम भाषा का उपयोग करते हुए उन्होंने अपने ही अनोखे अंदाज में हास्य और व्यंग्य का अद्भुत मिश्रण भी प्रस्तुत किया है।
101 सदाबहार कहानियां : दीप त्रिवेदी; आत्मन इनोवेशंस प्रकाशन, 7वीं मंजिल, तनिश्क शोरूम के ऊपर, न्यू लिंक रोड, अंधेरी (प), मुंबई; 245 रुपए।
मैं हूं खलनायक
सिनेमा कला के क्षेत्र में खलनायकों का योगदान नायकों से कमतर कभी नहीं रहा है। ऐसे में पत्रकार फजले गुफरान द्वारा फिल्म उद्योग में खलनायकी और खलनायकों के सफर पर ‘मैं हूं खलनायक’ किताब एक स्वागतयोग्य कदम है। उनकी इस किताब से जानने को मिलता है कि खलनायकी का सिर्फ एक काला भयावह, सिहरन भरा रंग नहीं होता। खलनायकी के इतने महीन शेड्स इस पुस्तक में मिलेंगे, मानो इनका भी अपना इंद्रधनुष हो। नए पुराने खूसट, जालिम, मक्खीचूस किरदार खलनायकी को अपनी शैली में जिस बारीक अंतर के साथ अभिव्यक्त करते हैं, किताब में भी उन्हें उतनी ही सूक्ष्मता के साथ उकेरा गया है। पुस्तक में खल-अभिनय के तेवर पर फोकस किया गया है। उसे रजतपटल पर उकेरने वालों की अभिनय-शैली और उनकी प्रतिभा पर लेखनी चलाई गई है। इसके बहाने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष टिप्पणी करने या राय जताने के ‘दुस्साहस’ से सायास बचने की कोशिश की गई है। किताब की एक खास बात यह है, जो बार-बार अलग-अलग खलनायकों द्वारा तरह-तरह से उद्धृत होता है कि बुराई को सामने रखना, उसे पूरी गंभीरता से उभारना इसके पीछे का मंतव्य बुराई को रेखांकित करना और समाज के इससे दूर रहने के लिए प्रेरित करना है।
मैं हूं खलनायक : फजले गुफरान; यश पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, 1/10753, सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 399 रुपए।
