महेंद्र पांडेय।

दिल्ली में देखने लायक क्या है? इस प्रश्न का उत्तर अक्सर मिलता है- लालकिला, कुतुबमीनार, पुरानी किला जैसी पुरानी इमारतें, इंडिया गेट, बड़े बाजार या लोदी गार्डन जैसे बड़े बाग। कुछ लोगों के लिए दिल्ली मैट्रो, चौड़ी सड़कें, लंबे फ्लाईओवर आदि दर्शनीय हैं। अधिकतर लोग दिल्ली का जिक्र आते ही यहां के जानलेवा वायु प्रदूषण, हमेशा रहने वाला यातायात जाम, नाले में बदल चुकी यमुना और कचरे के ढेरों की बात करते हैं। शायद ही कोई यहां के पक्षियों का जिक्र करता हो। यहां के रहने वाले भी पक्षियों से अनजान ही रहते हैं। हां, कबूतर सभी जगह दिखते हैं ओर सभी उन्हें पहचानते भी हैं। कबूतर हर उस जगह दिख जाते हैं, जहां कहीं थोड़ी-बहुत भी आबादी है। हर फ्लाईओवर के नीचे और पुलों पर भी कबूतर मिल जाएंगे। कबूतरों के अलावा कम ही परिंदे ऐसे हैं, जिन पर लोगों का ध्यान जाता हो या जिन्हें वे ठीकठाक पहचानते हों। पर हम ध्यान से देखेंगे तो हमारे आसपास कबूतरों के अलावा भी कई तरह के पक्षी दिल्ली में बसेरा करते हैं।

साल 2017 के एशियन जलपक्षी गणना के मुताबिक दिल्ली में यमुना के क्षेत्र में पक्षियों की संख्या पहले से बढ़ी पाई गई है। इस सा चौबीस प्रजातियों के कुल 2641 पक्षी यमुना के क्षेत्र में पाए गए। जबकि 2016 में 23 प्रजातियों के 590 पक्षी और 2015 में 19 प्रजातियों के कुल 641 पक्षी गिने गए थे। पक्षियों की संख्या में इस वृद्धि पर पक्षी विशेषज्ञों को आश्चर्य है, क्योंकि यमुना नदी का दिल्ली में के बीच बहने वाला हिस्सा दुनिया के सबसे प्रदूषित नदी-खंडो में एक है। यमुना के डूब क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में खेती की जाती है और नदी में पानी का बहाव भी नहीं रहता। दिल्ली की यमुना में मछलियों और दूसरे जलीय जंतुओं और प्लवकों की संख्या भी प्रदूषण के कारण कम है और सामान्यतया जलीय पक्षियों का भोजन यही होता है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में जलीय और दलदली क्षेत्र तेजी से कम होते जा रहे हैं, इसलिए यमुना नदी के आसपास के क्षेत्रों में स्थानीय और प्रवासी जल पक्षी अधिक संख्या में डेरा जमाने लगे हैं।

इस साल की गणना के कुल 2641 पक्षियों में से सर्वाधिक संख्या यानी 2010 कालशीर्ष घोमरा और भूरी गंगाचिल्ली (ब्राउन-हेडेड और ब्लैक-हेडेड गल्स) की है। कुल चौबीस प्रजातियों में से नौ स्थानीय प्रजातियां हैं और पंद्रह प्रजातियां मध्य और उत्तरी एशियाई क्षेत्रों से प्रवासी बनकर आई हैं। ब्लैक-हेडेड गल्स का यमुना के क्षेत्र में बड़ी संख्या में जमावड़े से यह नहीं मानना चाहिए कि यमुना में प्रदूषण कम हो गया है। असल में यह बढ़ी तादाद ही नदी की असली हालत को बयान करती है, क्योंकि यह प्रजाति अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में ही रहती है। ओखला पक्षी विहार में भी पिछले साल की तुलना में इस साल पक्षियों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। 2016 की गणना के दौरान यहां छियालीस प्रजातियों के 3,113 पक्षी थे, जबकि 2017 में तिरपन प्रजातियों के 6183 पक्षी मिले है। साल 2012 की गणना के समय ओखला पक्षी विहार में तिरसठ प्रजातियों के कुल 8715 पक्षी गिने गए थे।
जलीय पक्षियों से अलग, दिल्ली में सामान्य पक्षियों की भी बड़ी संख्या है। इन पर हमारा ध्यान शायद ही कभी जाता हो। पक्षियों पर ध्यान तभी जाता है, जब वे एकदम गायब होने की कगार पर आ जाते हैं या उनकी तादाद किसी इलाके में बहुत ज्यादा हो जाती है। दो हजार के दशक में गौरैयों की संख्या तेजी से कम होने लगी और 2010 के आसपास जब दिल्ली से ये गायब होने लगीं, तब साल 2012 में इसे दिल्ली में राज्य- पक्षी का दर्जा दिया गया। अब छोटे झुंडों में गौरैया कई जगह मिल जाती हैं। यमुना के पुलों पर जाली लगने के बाद उन जालियों पर भी ये दिन भर दिखती हैं।

कोतवाल (ब्लैक ड्रौंगो), कबूतर, मैना, कौए, चील, छोटा फाख्ता (लाफिंग डोव) इत्आदि पक्षी पेड़-पौधे वाली जगहों या बाग-बगीचे में मिल जाते हैं। कबूतरों को जहां दाना खिलाया जाता है, वहां बड़ी संख्या में दूसरे पक्षी भी रहते हैं। चीलों की सर्वाधिक संख्या गाजीपुर के लैंडफिल साइट के पास है। मैना बहुत बड़े झुंड में जहांगीरपुरी, धीरपुर क्षेत्र और गीता कॉलोनी के पास हैं। मोर नई दिल्ली के अनेक क्षेत्रों- दिल्ली विश्वविद्यालय के पास के रिज क्षेत्र और आइआइटी और जेएनयू जैसे कैंपस में बहुत हैं।
कोयल, हरियाल (ग्रीन पिजंस) और सिकंदर या तोता (पैराकीट) दिल्ली के घने पेड़ों वाले क्षेत्र में हैं। शिकारा (शिक्रा) और किलकिला (किंगफिशर) भी दिल्ली के अनेक क्षेत्रों में हैं। पक्षियों की और भी बहुत सारी प्रजातियां दिल्ली में मिलती हैं। गीता कॉलोनी के पास का क्षेत्र पक्षियों के मामले में बहुत संपन्न है क्योंकि यह यमुना के पास है। यमुना के डूब क्षेत्र के कुछ हिस्से में खेती होती है और शेष में सरकंडे जैसी घास है। बड़े पेड़ भी हैं। यहां कश्मीरी कस्तुरी (ब्लू रॉक ट्रुश) के बहुत बड़े झुंड अचंभित करते हैं। ये पेड़ों पर, बिजली के खंभों, साईन बोर्डों आदि पर पूरा कब्जा जमा लेती हैं। वहां एक सूखा पेड़ है, जिस पर कोई पत्ती नहीं है, इसकी एक-एक डाल को भर देती हैं चिड़िया। यहां मैना का भी बड़ा झुंड है, पर इनका ठिकाना फ्लाइओवर है, जहां पानी-निकासी की पाइपों पर ये घर बनाती हैं।

दिल्ली का धीरपुर क्षेत्र भी अनेक पक्षियों का ठिकाना है। कुछ साल पहले तक यह पूरा इलाका दलदली क्षेत्र था। अब निर्माण कार्यों और दिल्ली मैट्रो के कारण अधिकांश दलदली क्षेत्र खत्म हो गए। पहले यहां मैना और गौरैया के बड़े झुंड होते थे जो शाम होते ही वायुमंडल में छा जाते थे। गौरैया के साथ-साथ बया भी उड़ा करती थी। इस क्षेत्र में कुछ तालाब भी थे। इन तालाबों में जब पानी रहता था तब कुछ प्रवासी पक्षी भी डेरा जमाते थे। अब तालाब भी मलबे से भर गए हैं। जो कुछ दलदली क्षेत्र बचे हैं वहां अभी भी अनेक पक्षी रहते हैं। मैना तो लगातार बनी रही, झुंड जरूर छोटे हो गए। बया अब नहीं दिखाई देती।

गौरैया भी लगभग दो साल तक पूरी तरह से गायब हो गई थी, पर अब इनकी वापसी हो गई है। इनके झुंड जरूर छोटे हैं। धीरपुर के क्षेत्र में वायु प्रदूषण भी कुछ वर्षों के दौरान तेजी से बढ़ा है और कुछ इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट का काम चल रहा है।जंतर-मंतर रोड सभी तरह के आंदोलनों की जगह है और हमेशा यहां चहल-पहल रहती है। लाउडस्पीकर का शोर हमेशा बना रहता है। लेकिन इस सड़क पर घने और पुराने पेड़ होने की वजह से शोर के बावजूद पक्षियों की बहुतायत है। पेड़ घने होने के कारण इन्हें तुरंत देख पाना कठिन है, पर अगर इनकी आवाजों पर ध्यान दिया जाए तो और कुछ समय लगाया जाए तो बीस से अधिक प्रजातियों के पक्षी देखे जा सकते हैं। इनमें बसंता (बार्बेट), फाख्ता (डोव) कोयल, शिकारा (शिक्रा), कोतवाल (ड्रौंगो), बुलबुल, तोता (पाराकीट), खंजन (वैगटेल), पतरिंगा (बी-ईटर) दहियर (मैगपाई रॉबिन), काली चिड़ी (इंडियन रॉबिन), धनेश (हार्नबिल) और कठफोड़ा (वुडपेकर) प्रमुख हैं। इनमें सबसे बड़ा धनेश होता है और इसका पता सबसे आसानी से पता चलता है। शायद यह दूसरे पक्षियों के अंडे खा जाता है इसलिए इसके आते ही दूसरे सभी पक्षी एकजुट हो जाते हैं और शोर मचाना शुरू कर देते हैं। दूसरे पक्षियों को बचाने में फाख्ता और कोतवाल के साथ कौए सबसे आगे रहते हैं।

यमुना नदी के ऊपर बने निजामुद्दीन पुल के आसपास खडे होकर अनेक पक्षियों के झुंडों को शाम के समय देखा जा सकता है। शाम को उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ यमुना नदी के ठीक ऊपर से पक्षियों के अनेक बड़े झुंड काफी ऊंचाई से गुजरते हैं। इसी तरह तोता, कौए और मैना के झुंड पूरब से पश्चिम की तरफ जाते हैं। इंद्रप्रस्थ थर्मल पावर स्टेशन के पास का क्षेत्र पहले इससे निकले राख को रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। अब वहां राख नहीं है और जमीन खाली पड़ी है। इसमें बड़ी घासें और झाड़ियां उग आई हैं। यहां शाम को सूर्यास्त के समय आसमान पूरी तरीके से पक्षियों से भरा रहता है। मैना के इतने बड़े झुंड दिल्ली में शायद ही कहीं और हों। झुंडों का एक साथ एक दिशा में उड़ना तो सामान्य है, पर ये हरेक दिशा में उड़ती हैं। यहां तोते भी छोटे झुंड में आते हैं। शाम को जब आसमान में लालिमा रहती है तब यह नजारा बहुत खूबसूरत होता है।जिन लोगों का बचपन गांवों या कस्बों में बीता होगा, वे अनेक पक्षियों को पहचानते होंगे। भले ही नाम न जानते हों। गौरैया पहले सभी जगह पर मिलती थी और घर-आंगन में आती-जाती रहती थी। पहले थैली के आटे का समय नहीं था, हर किसली के घर में गेंहू आता था और इसे बीनकर और धोकर खुली जगह में फर्श या चारपाई पर सुखाया जाता था। गेंहू को जब सूखने के लिए डाला जाता था तब इसे लगातार गौरैया से बचाना पड़ता था। तब चिड़िया का मतलब ही गौरैया होता था और वे हर जगह मौजूद रहती थीं।

झोपड़ीनुमा मकान और सरकंडे के बाड़े उनकी पंसदीदा जगह होती थी। धीरे-धीरे झोपड़ीनुमा मकान पक्के मकानों में परिवर्तित होने लगे और बाड़े की जगह र्इंट की दीवारें आ गर्इं। तमाम वैज्ञानिक मानते हैं कि मोबाइल टावर का विकिरण गौरैयों समेत कई पक्षियों के लिए जानलेवा है। लेकिन, गौरैयों का एकदम से गायब हो जाना पर्यावरणविदों के लिए एक बड़ा झटका था, जिसने पहली बार पक्षियों पर लोगों का ध्यान खींचा था। यह एक दुखद तथ्य भी है कि जल-पक्षी के अलावा अन्य पक्षियों की प्रजातियों और संख्या का कोई एक समन्वित रिकार्ड कहीं उपलब्ध नहीं है। 2012 में गौरैया के राज्य पक्षी बनाने की घोषणा के बाद दिल्ली के पर्यावरण विभाग ने एक आरटीआइ के जवाब में 2014 में बताया था कि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि दिल्ली में गौरैया के झुंड कहां हैं और गौरैयों को बचाने के लिए एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया था। पक्षियों में वातावरण के अनुकूल ढलने की क्षमता होती है – गौरैया पुलों की जाली पर खुश है, मैना पाइपों में घर बना चुकी है, चीले कूड़े के ढेरों पर मंडराती हैं और कश्मीरी कस्तुरी मरे पेड़ और बिजली के खंभों पर संतुष्ट हैं। जरूरत इस बात की है कि हम बच्चों को भी पक्षियों से जोड़ें, उनके बारे में बताएं। फिर, पक्षी भी