फिरोज बख़्त अहमद
आ मिटा दें दिलों पे जो स्याही आ गई है,
तेरी होली मैं मनाऊं, मेरी ईद तू मना ले!
दिल्ली की शाहजहां के दौर की मुगलिया होली के जो चटकीले और तीखे रंग उस समय हुआ करते थे आज भी उनकी शोखी कम नहीं हुई है। दिल्ली की शानदार होली का वर्णन मिलता है ‘आईन-ए-अकबरी’ में, जिसमें अकबर के समय की सुंदर होली-ठिठोली का सटीक वर्णन है। पुस्तक में लिखा है कि जन जीवन में रंग घोलने वाला होली का उत्सव मुगल सम्राट अकबर के जमाने में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था। शहंशाह अकबर ऐसी होली खेला करते जो प्रति वर्ष एक यादगार बन कर उनके जीवन से जुड़ जाया करती थी।होली के आगमन के महीना भर पहले ही महल में होली खेलने की तैयारियां शुरू हो जातीं। जगह-जगह सोने-चांदी के ड्रम रखे जाते जिन में रंग घोला जाता। यह रंग महल के आस-पास उगे टेसू के पेड़ों को छांट कर उन के फूलों को निचोड़ कर बनाए जाते थे। अकबर की भांति ही जहांगीर, शाहजहां, हुमायूं, बहादुरशाह जफर आदि भी जोर-शोर से होली मनाते थे। लाल किले के किला-ए-मुअल्ला में होली का जश्न बड़े ही जोर-शोर से मनाया जाता था। पुराने उर्दू दैनिक ‘असद-उल-अखबार’ में बहादुरशाह जफर की होली का बड़ा ही रोचक वर्णन है। होली के रोज बादशाह राजकाज की सभी समस्याआ और रंजिशों को बाला-ए-ताक रख बड़े जोश के साथ होली मनाते थे। सुबह-सवेरे से ही बादशाह अपने हिंदू-मुस्लिम उमरा के साथ लाल किले के झरोखे में आ कर बैठ जाते और होली मनाने वाले विभिन्न समूहों, स्वांग बनाने वालों और हुड़दंग मचाने वालों की टोलियां निकलतीं।
बादशाह सभी से खुश-ओ-खुर्रम हो कर इनाम दिया करते थे। बादशाह का हल्का सा टीका भी लगवा लिया करते थे। सभी वजीर और उमरा गुलाल में नहा जाते। अंत में बादशाह स्वयं होली की गतिविधियों में भाग लेते। बहादुरशाह जफर ने खुद होली पर फाग लिखा है। एक बंद उनकी होली के फाग का-‘क्यों मो पे मारी रंग की पिचकारी/देखो कुंवर जी दूंगी मैं गारी।’ उस दौर के एक अखबार ‘सिराज-उल-अखबार’ के मुताबिक होली क्या आती है, दिल की कली खिल जाती है। होली का त्योहार मिलन का त्योहार है। इस कदीमी मुकद्दस त्योहार पर जात-पांत का भेदभाव कम से कम एक रोज के लिए तो मिट ही जाता है। मुल्ला नसीर फिराक ने अपनी पुस्तक ‘लाल किले की एक झलक’ में लिखते हैं कि मौसम बदला, हवा की खुनकी (सर्दी) टूटी और जाड़ा भागा। बसंत पंचमी के आते ही लोगों के हाथ में गुलाल आ जाता। बदलते हुए मौसम की बहार नई उमंगों से भर पूर मस्ती, सुहावनी हवा और मदमस्त वातावरण आदि सब कुछ बड़ा लुभावना लगता है।
महेश्वर दयाल ने अपनी किताब ‘आलम इंतेखाब’ में लिखा है कि होली से पूर्व बसंत के आगमन पर देवी-देवताओं पर सरसों के फूल चढ़ाया जाना दिल्ली की प्राचीन परंपरा रही है। होली के रसिया पर्व से दो सप्ताह पहले ही टेसू के फूलों को पानी से भरे मटके में डाल कर चूल्हे पर चढ़ा देते ताकि पानी उबलने पर फूलों का रंग खिंच कर गेरुआ रंग बन जाए। होली के मतवाले, मस्त कलंदर गली-गली, कूचे-कूचे घूमते फिरते थे। सारंगी डफली, चंग, नफीरी, मृदंग, ढमढमी, तंबूरा, मुंहचंग, ढोलक, रबाब, तबला, घुंघरू वाद्य लेकर गाते-बजाते। अहमद शाह बिन मुहम्मद शाह (1748 से 1754 तक) ने अपने दरबार में होली के जश्न का ऐसा आयोजन किया कि उसकी मिसाल आज तक नहीं मिलती। मुंशी मित्तर सेन ने लिखा है कि बादशाह होली के दिन खुशी से झूम उठते। शाह आलम सानी (1759-1806) के द्वारा लाल किले व शाहजहांबाद में मनाई गई होली का जिक्र आता है। नाच-गाना में डोमनियां, कंचनियां और भांडों को भी बुलाया जाता था। शाहजहांबाद यानी वर्तमान पुरानी दिल्ली में होली के अनेकों रंग देखने को मिलते थे। कोई ऊंची, सुरीली तान में गा रहा है: मैं कैसे होली खेलूं सांवरिया के संग! कुछ मंडलियां ऐसी भी होती थीं, जिनके पास चंग, दफ, मंजीरे, नफीरी आदि नहीं होते थे तो वे टूटे कनस्तर, हांडियां, मटकियां आदि बजा कर होली का राग अलापते थे। होली के मतवाले अपनी धुन में अनोखे सज-धज से निकलते थे। लड़के पीतल, टीन, कांच व बांस की पिचकारियां लिए शिकार की तलाश में होते।
पु रानी दिल्ली के घने और मिली-जुली आबादी वाले क्षेत्रे में होली के पावन पर्व पर मुसलमान औरतें हिंदू महिलाओं रंग से भरे मटके और लाल रंग से रंग कर चावलों को भेंट करतीं। दिल्ली की हवेलियों में विशेष होली महफिलों और मुशायरों का आयोजन होता था जिसकी परंपरा आज भी है। शायर वाजिद सहरी बताते हैं कि उनके बचपन में हवेलियों में पानदान, इत्रदान, मेवे, हुक्के और चांदी लगे पान सजाए जाते थे। आज भी हमदर्द के हकीम अब्दुल हमीद की माल्चा मार्ग स्थित हवेली पर होली के अवसर पर ऐसी ही आयोजन किया जाता है जिसमें शहर के खास लोग शरीक होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अजीज बर्नी लिखते हैं कि होली का जैसा मजा वास्तव में किसी अन्य त्योहार में नहीं है।
‘तुजके जहांगीरी’ में होली का बड़ा सटीक वर्णन मिलता है। जहांगीर के समय के चित्रकारों ने सम्राट को महरौली के निकट कुतबमीनार के पास होली खेलते दिखाया है। चित्रकारों में रासिक व गोवद्धन ने अपनी-अपनी शैली में जहांगीर को रत्न जड़ित प्यालों से रंग खेलते हुए दिखाया है। न्यूयॉर्क स्थित ‘मैट्रोपॉलिटन’ संग्रहालय में भी एक नायाब चित्र में जहांगीर के हाथ में चांदी की पिचकारी दिखाई गई है। एक चित्र में जहांगीर को नूरजहां के साथ होली खेलते दिखाया गया है। मुहम्मद शाह रंगीला के समय एक चित्र में ‘किला-ए-मुअल्ला’ की बेगमात को बादशाह पर पिचकारी से रंग छोड़ते दिखाया गया है। शाह आलम सानी भी शंहशाह होने के साथ-साथ उच्च कोटि के कवि थे। होली का सांगोपांग चित्रण उन्होंने ने अपनी कविताओं में किया है, जैसे: नैनन निहारियां, क्यारियां लगें अति प्यारियां/सौ लेकर पिचकारियां और गांवें गीत गोरियां!अगर हम बहादुरशाह जफर की ‘होरिया’ का जिक्र न करें तो होली के रंग की पूरी चटख न आ पाएगी। इसमें अमीरों, रईसों, राजाओं, नवाबों फब्तियां कसी जाती थीं। यहां तक कि कटाक्ष के शिकार शहजादों और शहजादियों को भी बनना पड़ता था। फिर बीच-बीच में आवाज लगाई जाती, ‘बुरा न मानो आज हमारी होली है!’। पर इस रोज सब कुछ माफ था, अगर कोई चीज माफ नहीं थी तो वह थी रंग से छिप कर कोने में बैठना। होली के विशेष मेले-ठेले भी लगा करते थे मगर आज उनका चलन कम हो गया है। १

