प्रधानमंत्री ने अपना मौनव्रत तोड़ा पिछले हफ्ते, लेकिन दादरी का नाम नहीं लिया। मोहम्मद अखलाक की हत्या का जिक्र किए बिना प्रधानमंत्री ने बिहार की एक चुनावी आमसभा को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों को तय करना होगा कि उनकी लड़ाई एक-दूसरे के साथ है या गरीबी के साथ। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
तब तक उनकी अपनी पार्टी के कट्टरपंथियों ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि अखलाक की हत्या उनकी नजरों में गोहत्या से कम अहमियत रखती है। तब तक रोज शाम को टीवी चैनलों पर प्रधानमंत्री की चुप्पी की निंदा हो चुकी थी। तब तक कुछ बुजुर्ग लेखकों ने अपने बरसों पहले दिए गए पुरस्कार साहित्य अकादेमी को लौटा दिए थे। तब तक परिवर्तन और विकास का संदेश थोड़ा कमजोर पड़ गया था बिहार के मतदाताओं की नजरों में।
बिहार वह राज्य है इस देश में जिसको परिवर्तन और विकास की सबसे ज्यादा जरूरत है। यह मैं कह रही हूं बिहार के देहाती क्षेत्रों में घूमने के बाद। ऐसे दृश्य देखने को मिले, ऐसी कहानियां सुनने को मिलीं, जिन्होंने साबित कर दिया कि बिहार भारत के विकसित राज्यों से कम से कम तीस वर्ष पीछे है हर तरह से। ऐसा नहीं है कि मैंने अन्य राज्यों में गरीबी नहीं देखी है, बेहाल स्कूल और सड़कें नहीं देखी हैं, लेकिन बिहार में जिस पैमाने पर ये चीजें देखने को मिलती हैं, शायद ही किसी दूसरे राज्य में देखने को मिलती हों। ओडिशा के कई देहाती क्षेत्र गरीब और पिछड़े हुए हैं, लेकिन वहां इतना तो है कम से कम कि गांवों की सुंदरता बरकरार है। बिहार में यह भी नहीं है।
पटना से निकली धर्मासती-गंडामन गांव तक पहुंचने के इरादे से, जहां दो साल पहले तेईस बच्चों की मौत हो गई थी स्कूल में दोपहर का भोजन करने के बाद। रास्ते में मैंने राजीव प्रताप रूडी के छपरा संसदीय क्षेत्र में कई गांवों में रुक कर लोगों से बातें की। जहां गई, शिकायतें सुनने को मिलीं। जहां गई, बेहाल बस्तियां देखने को मिलीं। सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं और अजीब किस्म का विकास दिखा। मिसाल के तौर पर महादलितों के एक गांव में मुझे बच्चों का स्कूल ऐसा दिखा, जिसमें सिर्फ खाली कमरे थे। वहां की अध्यापक से जब मैंने पूछा कि बच्चों के बैठने के लिए मेज-कुर्सियां क्यों नहीं हैं, तो उन्होंने कहा, ‘‘सरकार ने इन चीजों के लिए अभी फंड उपलब्ध नहीं कराया है। हम क्या करें?’’
इन चीजों में निवेश करने के बदले इस स्कूल की एक नई इमारत बनाई जा रही थी, जिसमें दिखे वही खाली कमरे। कैसा विकास है यह? कैसी प्राथमिकताएं हैं नीतीश कुमार की सरकार की? इस गांव में कई लोग चौक में इकट्ठा थे उस दिन, क्योंकि मतदान के बारे में समझाने आए थे जीविका नाम के एनजीओ के कुछ अधिकारी। एकत्रित लोगों से जब बात करने की कोशिश की मैंने तो एक बुजुर्ग आदमी ने मुझे कहा, ‘वोट तब मिलेगा जब आप हमको कार्ड दोगे।’ थोड़ी तहकीकात करने पर मालूम हुआ कि बीपीएल कार्ड उन परिवारों को नहीं मिले हैं, जो गरीबी रेखा के नीचे हैं। उनको मिले हैं जो इस गांव के हिसाब से संपन्न परिवार हैं।
धर्मासती-गंडामन पहुंची तो नीतीश सरकार के खिलाफ और भी गुस्सा दिखा। पता लगा कि बच्चों के मरने के बाद सरकारी मदद के तौर पर एक स्मारक बना है गंडामन प्राथमिक विद्यालय के सामने और स्कूल की इमारत की मरम्मत की गई है। जिनके बच्चे मरे थे 16 जुलाई, 2013 के उस शर्मनाक हादसे में, उन्होंने मुझे कहा कि नीतीश कुमार ने इतनी भी राहत नहीं दी है जिससे वे अपने उन बच्चों का इलाज करा सकें, जो मरे नहीं थे उस दिन, लेकिन जिन पर जहर खाने का असर अब भी है।
स्मारक बनाने के बदले अगर गांव में अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र बना होता तो यहां के गरीब लोगों को ज्यादा लाभ होता। हादसे के बाद उनको पटना तक जाना पड़ा अपने बीमार बच्चों को लेकर। पहले उनको लेकर गए थे मसरख नाम के कस्बे में, जो गांव से दस किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन वहां के अस्पताल में बच्चों का इलाज नहीं हो सका।
सो, बिहार में परिवर्तन और विकास शब्दों का खास असर पड़ता है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में कांटे की टक्कर दे रही है ऐसे महागठबंधन को, जिसमें वही लोग हैं जिन्होंने बिहार को बेहाल कर रखा है। लेकिन परिवर्तन और विकास का नारा तब मतलब रखता है जब प्रधानमंत्री याद रखते हैं कि उन्होंने ‘सब का साथ, सब का विकास’ करने का भी वादा किया था। सबका विकास ऐसे माहौल में कैसे हो सकता है, जिसमें एक बेगुनाह आदमी की हत्या सिर्फ इसलिए की जाती है, क्योंकि हिंदुत्ववादियों को शक था कि उसके घर की फ्रिज में जो गोश्त पाया गया वह गाय का था। अब साबित हो गया है कि गोश्त गाय का नहीं बकरे का था, लेकिन मोहम्मद अखलाक को वापस कौन लाएगा?
प्रधानमंत्री जब तक समझेंगे नहीं कि ऐसी घटनाओं से सबसे ज्यादा नुकसान उनकी अपनी छवि को होता है तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। बाद में कहना कि कानून-व्यवस्था की जिम्मेवारी राज्य सरकार की होती है केंद्र की नहीं, काफी नहीं है। प्रधानमंत्री रोज ट्वीट करते हैं किसी न किसी विषय पर, सो अगर मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद बस इतना कह दिया होता उन्होंने ट्विटर पर कि इस घटना से उनको निजी तौर पर दुख पहुंचा है तो मुमकिन है कि हिंदू कट्टरपंथियों तक संदेश पहुंचता। चुप रहने की वजह से उनके नेतृत्व पर सवाल उठे हैं, जो न उनके लिए अच्छा है न देश के लिए।