आग लगाने के बाद सोशल मीडिया बंद! गजल गाने से पहले ही गुलाम अली की गायकी बंद! दादरी में नेताओं का जाना बंद, लेकिन आना जारी! बुधवार को एक के बाद एक दस इन्नोवाएं एक साथ फिल्म के एक्शन सीन की तरह रुकती हैं। बीस-तीस हट्टे-कट्टे युवा दादरी का वीर भाव से सिंहावलोकन करते हैं। वे हिंदूवाहिनी के कहे जा रहे हैं। अंगरेजी के नामी चैनल का नामी एंकर भाजपा के प्रवक्ता से बार-बार पूछता है कि ये हिंदूवाहिनी आपकी कौन है? लेकिन सवाल का सीधा जवाब नदारद है।

संगीत सोम, ओवैसी, बालियान, आजम खान, साक्षी महाराज, आदित्यनाथ… हरेक की बोली गोली की तरह निकलती है, गोली की तरह चलती है, निशाने पर लगती है। निशाना चुप नहीं रहता, प्रत्युत्तर में गोली चलाता है, जो पहले निशाने पर लगती है। अब निशाने हैं और निशाने! बीच में कोई नहीं है और चैनल बोली को गोली की तरह कवर करते हैं! वह उत्तेजक है। उत्तेजना ही बिकती है।
विपक्षी दलों के प्रवक्ता बार-बार आग्रह करते हैं कि इस नफरत और हिंसाकांड पर देश के प्रधानमंत्रीजी चुप क्यों हैं और हम देखते हैं कि ऐसा हर सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है!

दादरी ने घृणा का ‘फ्री मार्केट’ बना दिया है। हर रोज बदलेखोरी का साधारणीकरण हो रहा है। बहुत सारे मिनी हिटलरों के दर्शन होने लगे हैं। दादरी की फाइट जारी है कि चैनलों पर ‘तलवार’ (फिल्म) आ जाती है और ‘तलवार’ के बीच इंद्राणी की ‘आत्महत्या की कोशिश बरक्स हत्या की कोशिश’ की कहानी छा जाती है। एक के बाद तीन कहानियां बजती हैं: दादरी की घृणा, इंद्राणी और तलवार यानी हत्या और हत्या!
दादरीवादी घृणा की कहानी को कुछ देर विश्राम देंगे तब आप समझेंगे कि चैनलों के पास भी दिल होता है और एंकरों की हमदर्दियां बड़ी मानीखेज होती हैं।

‘तलवार’ की रिलीज के आसपास की उस शाम एनडीटीवी की एंकर का दिल आरुषि के प्रति हमदर्दी से लबालब था। वह आरुषि की मां के प्रसारित साक्षात्कार को रिपीट कर रही थी। तलवार परिवार के प्रति हमदर्दी ‘तलवार’ की अगवानी करती दिखती थी। ऐसा सौभाग्य ‘तलवार’ के अलावा कितनी फिल्मों को मिला? लगा कि मेघना गुलजार के आगे बाकी सब फिल्मकार पानी भरते हैं। पांच सात राष्ट्रीय इनाम तो पहले दिन ही तय हो गए! अपने तमाम नामी एंकर तलवार की टुकड़ी से ऐसे बात करते थे जैसे टुकड़ी देवलोक से पधारी हो!

लेकिन टाइम्स नाउ को इंद्राणी मुखर्जी के अचानक अचेत हो जाने की फिक्र थी: इंद्राणी ने जेल में आत्महत्या का प्रयास क्यों किया या कि उसे मारने की साजिश कैसे रची गई? उसको नशे की गोलियां किसने दी? एंकर डॉक्टर का भी बाप होता है। डॉक्टर कहता रहा कि आमाशय की जांच ‘नेगेटिव’ है। चैनल ‘नेगेटिव’ ही बताता रहा, जबकि दूसरा डॉक्टर कहता रहा कि ‘पेशाब’ की रिपोर्ट ‘पॉजिटिव’ है। आखिर में इंद्राणी बोलीं: मैं गीता पढ़ते-पढ़ते अचेत हो गई थी। गीता की इस गोताखोर की जय!

दादरी कांड का दूसरा राउंड औरतों का रहा। एबीपी के रविकांत को दो-चार धक्के लगाए और कहने लगी कि हमारे बच्चों को जेल में क्यों डाला है? गुस्साई भीड़ के बीच कैमरा लेकर जाना जोखिम का काम है।
एनडीटीवी पर ‘पीपल’ में अखलाक के बेटे सरताज ने बरखा से दो बातें कहीं: ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ और ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’। इसके बाद शोभा डे विह्वल होकर अंगरेजी में सरताज के लिए विशेषणों की झड़ी लगा कर बोलीं: ‘हाउ गे्रसफुल’! कितना महान! कितना उदात्त! उसके बाद हर बंदा ‘हाउ गे्रसफुल’ ‘हाउ ग्रेसफुल’ करता रहा। सरताज का गम और डर इनकी ‘ग्रेसफुल’ में छिप जाता था! या शायद यह इनके ‘सुरक्षित अपराधबोध’ का इजहार था?

इसके बाद मीडिया को ठुंकना था, ठुंका। पहले दादरी में भीड़ ने ठोंका, फिर भाजपा प्रवक्ताओं ने बहसों में ठोंका कि मीडिया तिल का ताड़ बना रहा है। एकतरफा बातें बता रहा है और भड़काने का काम कर रहा है।
एक बार टाइम्स नाउ के एंकर ने कहा कि हर प्रवक्ता अपनी पार्टी का पक्ष रखे, दूसरे की बात न करे। देर तक सब सुनते रहे जैसे हां कह रहे हों, लेकिन जब पूछा जाने लगा कि आपके संगीत सोम ने ठोंकने वाली बात क्यों कही या आजम खान ने बंदूक उठाने की बात क्यों कहीं और क्या आप उनको अपनी पार्टियों से निकालेंगे तो सबका जवाब एक था कि अव्वल तो आप तोड़-मरोड़ रहे हंै और पहले प्रमाणित करो कि द्वेष फैलाया, जांच करो और तब पूछो।

ऐसी बाइटें जितनी बार दिखाई जाती हैं, उतनी ही घृणा फैलती है और अपना चेहरा दिखाने के लिए ऐसी जिज्ञासा बरसाने वाले कंपटीशन करने लगते हैं!
घृणा की निंदा करने मात्रा से घृणा लज्जित नहीं होती, बल्कि अपनी चर्चा से अमर होती जाती है! जब हर तरफ से अपनी-अपनी घृणा की हिफाजत की जाने लगती है, तो घृणा अट्टाहास करने लगती है! चैनल उसे दिखा-दिखा कर समझते हैं कि वे दर्शकों को घृणा के प्रति घृणा करना सिखा रहे हैं। घृणा को एक्सपोज करने से जरूरी नहीं कि घृणा के प्रति घृणा ही पैदा हो। घृणा के प्रति एक किस्म की हमदर्दी भी तो पैदा हो सकती है? चैनलों में नफरत भी नफासत पंसद होकर आती है!

नफरत के सौदागरों से ‘माफी’ मांगने के लिए कहें तो प्रवक्ता इसे अपनी तौहीन मानते हैं। दलों के प्रवक्ता ऐसे अवसरों के लिए पूरी तरह तैयार होकर आते हैं। शिवसेना ने गुलाम अली के गजल प्रोग्राम को इसलिए बंद करा दिया कि पाकिस्तान सिपाहियों की हत्या करता रहता है। भाजपा की रजामंदी के बिना ऐसा कैसे हो सकता है?

राजदीप सरदेसाई एक शिवसैनिक से पूछते हैं कि गुलाम अली या गजल हत्याओं के लिए कैसे जिम्मेदार है? वे बोले कि पाकिस्तान जब तक हरकतें बंद नहीं करता, हम गजल नहीं गाने देंगे। सोशल मीडिया पर घृणोत्तेजक संदेशों को सेंसर करने का सरकारी आदेश तब आया, जब दादरी हो चुका और उत्तेजक ‘उत्तर-दादरीकांड’ जारी था।
हम तो कहेंगे: हुजूर आते-आते बहुत देर कर दी!