‘जरा सोचो कैसी होगी वह दुनिया/ जहां दिन में भी काली रात का साया हो/ उजाले का नामो-निशान न हो/ जरा सोचो कैसी होगी वो दुनिया जहां बाप तो हों/ पर मां नहीं/ बेटा तो हो/ बेटी नहीं/ भैया तो हो भाभी नहीं/ नानी नहीं, दादी नहीं, चाची नहीं, खाला नहीं, बुआ नहीं/ जरा सोचो कैसी होगी वो दुनिया/ जहां पत्तों का रंग सिर्फ जर्द हो/ जहां बंसत में न दिखते हों फूल/ जहां न उड़ते हों पीले दुपट्टे/ जरा सोचो कैसी होगी वह दुनिया/ जहां लड़के ही लड़के हों/ दिखें न लड़कियां?’
यह कविता नासिरुद्दीन की एक किताब से है। इस किताब के चार खंड हैं। इनमें हमारी दुनिया नजर आती है। हमें अपना ही जीवन, उसके आशय, रोजमर्रा जिंदगी में जूझने वाले प्रसंग मिलते हैं, जिनमें प्रेम, हिंसा, भय, आशा, गैरबराबरी, स्त्री के संघर्षों का इतिहास शामिल है। यह किताब मनुष्य की असंख्य सच्चाइयों और उसकी नियति में सबकी साझेदारी का सत्यापन करती है। इसको पढ़ते हुए दुनिया को उसकी बुनियादी रंगतों में जानना-पहचानना बेहद अपना लगता है। इसकी एक वजह है कि यह किताब रोजमर्रा की छवियों और बातचीत के लहजे में रची गई है। इसमें सीधा संबोधन है और तुरंत अपने घेरे में ले लेने वाली आत्मीयता।
किताब के ये चार खंड हैं- कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा है?, लड़कियों के बारे में कितना जानते हैं?, ‘क्या हमें पता है लड़कियां क्या चाहती हैं?, ‘प्यार पाना है तो लड़कियों का दिल न दुखाना। इनके शीर्षक जितने दिलचस्प हैं, संवाद करने का तरीका भी बेहद सटीक है। वह बच्ची जो जन्म के बाद मार दी गई। हजारों अजन्मी लड़कियां, वे लड़कियां जो बचा ली गर्इं, पर गहरे लैंगिक भेदभाव की शिकार हुर्इं, रस्सी से झूल गर्इं, कब्र में दफना दी गर्इं, जो मोटरसाइकिल, फ्रिज, कार के लिए मार दी गर्इं। यह किताब उन तमाम वजहों की पड़ताल करती है। हमें बताती है कि समाज में भेदभाव कितना गहरे पैठा हुआ है।
नासिर कहते हैं: यह छोटी-सी किताब कथा है, न उपन्यास, लेख है न शोधपत्र, नया विचार है न कोई खोज। यह एक ऐसा पिटारा है, जिसमें थोड़ा-थोड़ा सब कुछ है। यह जो थोड़ा-थोड़ा है, यह उन सबके लिए जरूरी है, जो रोज अपने जीवन में ऐसी हिंसा झेलती हैं। यह किताब पड़ताल करती है कि आखिर इस गैर-बराबरी की जड़ें कहां हैं? क्या यह हमारे सोचने-समझने के तंत्र पर भी असर करती है। क्या अब भी हमारा समाज बंद है? क्या हम अपने बंद समाज की संड़ाध को महसूस कर पा रहे हैं। जाहिर है, ऐसे सारे सवालों का हल इसी दुनिया में है।
पर यह जानना होगा कि स्त्री के विरुद्ध इतिहास में क्या कुछ किया गया। इतिहास में जब कभी एक जाति ने दूसरी जाति को अधिकृत या नियंत्रित करने की कोशिश की तो विद्रोह हुए। आखिर किस आधार पर एक जाति दूसरी जाति को इतने लंबे समय तक शोषित करती रही। आखिर पुरुष को स्त्री की तुलना में श्रेष्ठ किसने कहा? इस किताब ने स्त्री की परंपरा और उसके संघर्ष को भी रेखांकित किया है।
क्या हम अंदाजा लगा सकते हैं कि ईसा से पांच सौ साल पहले स्त्रियों ने अपनी यथास्थिति के खिलाफ जबर्दस्त विद्रोह किया तो उनके साथ क्या कुछ हुआ होगा। स्त्री परंपरा की किन धाराओं के विरुद्ध तैरते-तैरते आज यहां तक पहुंची है? जिन लोकगीतों में स्त्री के स्वर हैं, जिनमें सच और संस्कृति का वास है, वे शब्द क्या मर सकते हैं? क्या उन्हें यों ही मरने दिया जाए? ऐसे हजारों गीत और गाथाएं हमारी नानी, दादी और मां की स्मृतियों में जिदां हैं। नासिर ने उन्हें न सिर्फ सहेजा है, बल्कि यह किताब तल्ख हकीकत का सामना करने में मदद करती है। अच्छी बात है कि नासिर न ज्ञान बघारते हैं, न संवेदना को भावुकता की चाशनी में लपेटते हैं। इतिहास और लोकगाथाओं को मानवीय सच के प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत किया है।
यह किताब हर पीढ़ी के लिए है और चेतावनी यह कि यह खासकर लड़कों और मर्दों के लिए है। अगर हमारे समाज में मर्दों को शुरू से तालीम दी जाए और लैंगिक भेदभाव के बारे में बताया जाए तो जरूर दुनिया की तस्वीर मुख्तलिफ होगी। शायद यह पहली किताब होगी, जो स्त्रियों के मुद्दे पर पुरुषों को संबोधित करती है। नासिर बेहद जरूरी सवाल उठाते हैं। ‘आंख खोलते ही कुछ चीजें हम बिना सिखाए सीख जाते हैं। उनमें से एक है, काम और काम का बंटवारा। यानी ये काम लड़के कर सकते हैं, ये काम नहीं कर सकते। ये काम लड़कियों के हैं, ये उनके नहीं। क्या वाकई ऐसा है? काम भी लड़का और लड़की होता है?’
‘जवाब मुश्किल नहीं है। लड़कियां, महिलाएं हर वह काम कर लेती हैं, जो आमतौर पर लड़कों या मर्दों के माने जाते हैं। नासिर पूछते हैं- क्या घर का हर काम हम लड़कों के बस का है? क्या हम वे सारे काम करने को तैयार हैं, जो हमारे घर की स्त्रियां कर रही हैं? ऐसे कई सवाल और जवाब इस किताब में हैं, जो स्त्री-पुरुष संबंधों को बराबरी के आधार पर आंकते हैं। किताब कहती है कि जो समाज या परिवार स्त्री को समानता का अधिकार नहीं दे सकता, उसकी नींव कमजोर होगी। वह समाज हिंसा और गैर-बराबरी पर टिका है।
इस किताब की खूबी है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक और लैंगिक भेदभाव को बहुत सरल ढंग से उठाती है, जो किसी भी संवेदनशील आदमी को रुक कर सोचने को बाध्य करता है। नासिर खुद को भी नहीं बख्शते। इसकी एक अंतर्ध्वनि यह भी है कि अपनी अच्छी-बुरी दुनिया हमने मिल कर बनाई है, बिगाड़ी और बरबाद की है और हम मिल कर ही इसे बचा सकते हैं।
निवेदिता
कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा है?, लड़कियों के बारे में कितना जानते हैं?, क्या हमें पता है लड़कियां क्या चाहती हैं?, प्यार पाना है तो लड़कियों का दिल ना दुखाना: नासिरुद्दीन; सेंटर फॉर हेल्थ ऐंड सोशल जस्टिस, बेसमेंट, यंग वीमेंस हॉस्टल नं.-2, बैंक ऑफ इंडिया के नजदीक, एवेन्यू-21, जी ब्लॉक, साकेत, नई दिल्ली; नि:शुल्क।
…………………….
एकांत का मानचित्र
कहानियों और कविताओं की इस पुस्तक में अत्यंत चिंतनपरक कहानियां और प्रांजल और ऐंद्रीय कविताएं संग्रहीत हैं। संगीता की कहानियों में अनेक चरित्र हैं: मित्तल साहब, लूणावतजी, समीरा, चंद्रबलि, नरेश आदि। ये कहानियां इन चरित्रों के स्वभाव को खोलती और उनके जीवन की विडंबनाओं को उद्घाटित करती हुई अपना आकार ग्रहण करती हैं। ये चरित्र जीवन में अपने स्वभाव के कारण ही नितांत मौलिक किस्म के प्रश्नों से टकराते हैं और उनकी इस टकराहट की अनुगूंज लगभग हर कहानी में फैली हुई अनुभव होती है। यह सबसे अधिक और सांगीतिक ढंग से ‘अतिप्रश्न’ कहानी में घटित होता है, जिसमें समीरा प्रश्नों का सीधे-सीधे सामना करने के स्थान पर एक आख्यान को दोहराना शुरू करती है और अंतत: उस देहरी पर आ जाती है, जिसे अतिप्रश्न कहा जाता है।
इस संग्रह की एक कहानी ऐसी भी है, जो पूरी तरह ध्वनि पर आधारित है। वह कथा और संगीत के बीच के निर्जन अंतराल में अवस्थित है। वह कहानी जिसका नाम ‘ध्वनि-कथा’ है, ध्वनि और रस के संबंध को प्रश्नांकित करती है। यह सब संगीता इतने रोचक ढंग से करती हैं कि कई बार शुरू करने पर उनकी कहानियों को बीच में छोड़ना मुश्किल होता है।
एकांत का मानचित्र: संगीता गुंदेचा; सूर्य प्रकाशन मंदिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर; 250 रुपए।
……………………..
अम्मा रहतीं गांव में
यह प्रदीप शुक्ल के नवगीतों का हालांकि प्रवेश संकलन है, पर इसमें संग्रहीत रचनाओं के माध्यम से हिंदी नवगीत के समकालीन सरोकारों और उसके वर्तमान स्वरूप का भी बखूबी आकलन किया जा सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं। इन रचनाओं में फिलवक्त के तमाम यक्षप्रश्नों से कवि रूबरू हुआ है, यह इस संग्रह की विशेष उपलब्धि है। और हां, इसके माध्यम से उन्होंने अपने मूल ग्राम्य मन की कुछ सम्मोहक, कुछ यथार्थ सार्थक छवियों को भी प्रस्तुत किया है।
प्रदीप शुक्ल के नवगीतों की विशेषता उनके लोकमानस से जुड़े होने और उनकी सहज लोक-कहन में सन्निहित है। नवगीत की साठ वर्ष से ऊपर की विकास यात्रा में फिलवक्त के चौथे पड़ाव की उनकी इस नवगीत प्रस्तुति का सुधी पाठक, निश्चित ही, स्वागत करेंगे। प्रदीप शुक्ल श्रेष्ठ नवगीतकवि हैं और उनकी रचनाओं में नवगीत की वे पगध्वनियां हैं, जो नवगीत परंपरा के विकास की परिचायक हैं।
अम्मा रहतीं गांव में: प्रदीप शुक्ल; उत्तरायण प्रकाशन, के-397, आशियाना कॉलोनी, लखनऊ; 250 रुपए।
…………………
इक्ष्वाकु के वंशज
अलगावों से अयोध्या कमजोर हो चुकी थी। एक भयंकर युद्ध अपना कर वसूल रहा था। नुकसान बहुत गहरा था। लंका का राक्षस राजा रावण, पराजित राज्यों पर अपना शासन लागू नहीं करता था। वहां के व्यापार को नियंत्रित करता था। साम्राज्य से सारा धन चूस लेना उसकी नीति थी, जिससे सप्तसिंधु की प्रजा निर्धनता, अवसाद और दुराचरण से घिर गई थी। उन्हें किसी ऐसे अधिनायक की जरूरत थी, जो उन्हें इस दलदल से बाहर निकाल सके।
अधिनायक कोई उनमें से ही होना चाहिए था। कोई ऐसा, जिसे वे जानते हों। एक संतप्त और निष्कासित राजकुमार। एक राजकुमार जो इस अंतराल को भर सके। एक राजकुमार जो राम कहलाए।
क्या राम उस लांछन से ऊपर उठ पाएंगे, जो दूसरों ने उन पर लगाए हैं? क्या सीता के प्रति उनका प्यार, संघर्षों में उन्हें थाम लेगा? क्या वे उस राक्षस का खात्मा कर पाएंगे, जिसने उनका बचपन तबाह किया? क्या वे विष्णु की नियति पर खरा उतरेंगे? इस पुस्तक के साथ अमीश ने एक और ऐतिहासिक सफर की शुरुआत की है।
इक्ष्वाकु के वंशज: अमीश; वेस्टलैंड लिमिटेड, 61, द्वितीय तल, सिल्वरलाइन बिल्डिंग, अलपक्कम मेन रोड, मदुरावोयल, चेन्नई; 295 रुपए।
