जम्मू-कश्मीर में भाजपा नेता आतंकवादियों के निशाने पर हैं। रविवार को मध्य कश्मीर के बडगाम जिले में आतंकी हमले में भाजपा के एक नेता गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद बीते रविवार को केंद्र शासित प्रदेश में पार्टी नेताओं में भय और बढ़ गया, कुछ नेताओं ने इस्तीफा तक दे दिया। ये हमला बडगाम जिले में भाजपा के ओबीसी अध्यक्ष अब्दुल हमीद नजर पर हुआ, जिनकी सोमवार सुबह मौत हो गई। नजर पिछले एक सप्ताह में घाटी के ऐसे तीसरे भाजपा नेता हैं, जिनपर हमला हुआ। इससे पहले के हमलों के बाद भी कुछ भाजपा नेताओं ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
रविवार को एक ऑडियो में एक शख्स ने खुद को आतंकी बताते हुए कहा कि उन्होंने प्रादेशिक सेना के सिपाही की हत्या की है जो पिछले सात दिनों से शोपियां स्थित अपने घर से लापता हैं। शोपियां के एसपी अमृत पाल सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि हम अभी भी ऑडियो की सत्यता की जांच कर रहे हैं। इधर पुलिस और सेना लापता सैनिक शाकिर मंजूर वाघे को तलाश कर रही है। मंजूर को तब गोली मार दी गई जब वो बडगाम में रेलवे स्टेशन के पास सुबह टहलने के लिए निकले थे। बाद में उन्हें इलाज के लिए श्रीनगर के श्री महाराजा हरि सिंह हॉस्पिटल ले जाया गया।
आतंकियों ने इससे पहले 6 अगस्त को दक्षिणी कश्मीर के कुलगाम जिले में भाजपा नेता और सरपंच सज्जाद अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इससे पहले एक अन्य भाजपा नेता और सरपंच आरिफ अहमद को काजीगुंड के अखरान गांव में गोली मारकर घायल कर दिया गया। आठ जुलाई को भी आतंकियों ने भाजपा के एक वरिष्ठ नेता शेख वसीम बारी, उनके पिता और भाई की बांदीपोरा में हत्या कर दी थी। दोनों भाई भाजपा कार्यकर्ता थे।
रविवार को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि नजर ने उस सुरक्षित निवास स्थान को छोड़ दिया जो सरकार ने उन्हें आवंटित किया था। पुलिस ने पहले बताया कि सज्जाद की हत्या तब कर दी गई जब वो सुरक्षित निवास स्थान को छोड़कर अपने घर गए। इन हमलों के बाद भाजपा के कम से कम चार नेताओं (बांदीपोरा यूनिट के भाजपा महासचिव अवतार सिंह, बडगाम जिला अध्यक्ष इमरान अहमद, विधानसभा अध्यक्ष वली मोहम्मद और बडगाम जिला कार्यालय सचिव समीर अहमद शाह) ने लिखित बयान जार कर कहा कि उन्होंने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है। भाजपा एकमात्र मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टी है जो इन दिनों कश्मीर में जमीनी स्तर पर मौजूद है।
शोपियां मामले में एक कथित आतंकवादी ने ऑडियो में कहा था कि प्रादेशिक सेना के सिपाही को कोरोना वायरस महामारी रोकने के चलते दफना दिया गया था। खुद को अबु तलहा बताने वाले आतंकी ने कहा था कि हमने उसे अंजाम तक पहुंचा दिया। ऑडियो में कहा गया, ‘हम उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों का दर्द समझते हैं, मगर कोविड-19 महामारी के चलते शव परिवार को नहीं सौंप सकते, ताकी अंतिम संस्कार में भीड़ इकट्ठा ना हो।’
दरअसल आतंकियों द्वारा सैनिक का शव वापस करने से इनकार सरकार के उस फैसले के खिलाफ प्रतिशोध मालूम होता है जिसमें मार्च के महीने में मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों के शव ना सौंपने का निर्णय लिया गया था। शव सौंपने के बजाय उन्हें घाटी में अंजान जगहों पर दफनाने का निर्णय लिया गया। तब पुलिस ने तर्क दिया कि आतंकियों के शव परिवार को देने से लोग बड़ी संख्या में अंतिम संस्कार में शामिल होंगे और इससे कोरोना महामारी का प्रसार हो सकता है।
इसी तरह ऑडियो में आतंकी कहता है, ‘ठीक उसी तरह जैसे सेना ने हमारे शहीद मुजाहिदीन को दफन किया है। वैसे ही हमने खुद वाघे दफनाया है। उनके पार्थिव शरीर को परिवार को नहीं सौंपा गया है।’
24 साल के वाघे 2 अगस्त को शोपियां के हरमाइन में अपने घर से निकलने के तुरंत बाद गायब हो गए थे। शाकिर मंजूर वाघे प्रादेशिक सेना के बालपोरा शिविर में तैनात थे।

