असम विधानसभा चुनाव में विभिन्न मुद्दों और जातीय-जनजातीय समीकरण साधने के अलावा राजनीतिक दलों का जोर बूथ स्तरीय प्रबंधन पर दिख रहा है। 126 विधानसभा सीटों में 47 सीटों पर 27 मार्च को वोट डाले गए। राजनीतिक दलों के बीच चल रही बूथ स्तरीय जोर आजमाइश का संकेत पहले चरण के मतदान में दिख गया। असम में एक अप्रैल को 39 सीटों पर दूसरे और छह अप्रैल को तीसरे व अंतिम चरण में 40 सीटों पर मतदान होगा। कांग्रेस, भाजपा सहित सभी दलों के कुल 267 उम्मीदवार मैदान में हैं।

असम चुनाव में कांग्रेस अपना ‘छत्तीसगढ़िया फार्मूला’ आजमा रही है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम की सियासी रणनीति की कमान संभाल रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हुए 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बूथ स्तर तक रणनीति तैयार की थी। वहां 15 साल तक मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह की गद्दी छिन गई थी। असम में भूपेश बघेल ने कांग्रेस के अपने 100 से ज्यादा बड़े-छोटे-मझोले नेताओं को दो महीने से मैदान में उतार रखा है। साथ ही, कांग्रेस की कोशिश है कि वहां गठबंधन के सभी दल एक-दूसरे को अपना वोट हस्तांतरित कराएं।

दूसरे और तीसरे चरण में कांग्रेस पार्टी ने मुसलिम मतदाताओं पर फोकस रखा है। इनमें ज्यादातर पर हार-जीत का फैसला मुसलिम मतदाता करते हैं। निचले असम में मुसलिम मतदाताओं के बीच वोट का विभाजन रोकने के लिए कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआइयूडीएफ के साथ गठबंधन किया है। पिछले चुनाव में मतों में बिखराव की वजह से 12 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज कर ली थी।

नेताओं की यह टीम बूथ जीता, चुनाव जीता के आधार पर काम कर रही है। इस टीम ने कार्यकर्ताओं को घर-घर संपर्क साधने के तरीके बताए हैं। साथ ही, छत्तीसगढ़ की तरह भाजपा विरोधी तमाम दलों को साथ लेकर चलने का फार्मूला अपनाया है। असम में कांग्रेस के साथ गठबंधन में बदरूद्दीन अजमल के नेतृत्व वाले एआइयूडीएफ, बीपीएफ, माकपा, भाकपा और आंचलिक गण मोर्चा शामिल है। असम में टिकट के दावेदारों से ब्लाक स्तर पर आवेदन लिए गए थे। फिर ब्लाक अध्यक्ष, जिला अध्यक्ष, जिला कमेटी माध्यम से दावेदारों की सूची छानबीन समिति के रास्ते होते हुए एआइसीसी तक पहुंची।

कांग्रेस नेताओं की सक्रियता देख भाजपा ने भी अपने 15 नेताओं को वहां भेज रखा है। इन नेताओं में संगठन महामंत्री पवन साय, पूर्व सांसद चंदूलाल साहू, पूर्व मंत्री केदार कश्यप आदि शामिल हैं। इनके अलावा जेपी नड्डा, अमित शाह जैसे राष्ट्रीय नेताओं की सभाएं भी खूब हो रही हैं।

असम के चाय बागानों में बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ के रहने वाले लोग काम करते हैं। ये लोग सन 1890 और 1900 के बीच असम आए थे और यहीं बस गए। ये मजदूर असम की 40 या उससे ज्यादा विधानसभा सीटों पर नतीजे प्रभावित करने की ताकत रखते हैं। ऐसे में कांग्रेस ने भूपेश बघेल की देखरेख में पार्टी के 100 से ज्यादा सांसद, मंत्री, विधायक से लेकर नगर निगम स्तर तक के नेता और पार्षदों को विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में भेज रखा है।

असम में कांग्रेस ने पांच लाख रोजगार, हर घरेलू महिला को हर महीने 2000 रुपए देने, चाय बागान मजदूरों का मेहनताना बढ़ाने, जनता की सहूलियतों और नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) कानून की खिफालत जैसे तमाम वादे किए हैं। दूसरी ओर, भाजपा ने सीएए कानून को लेकर चुप्पी साधी है और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) को व्यवस्थित रूप से लागू करने जैसे वादे किए हैं। भाजपा को सीएए के मुद्दे पर असम में भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।