नीकु जो चाहते थे वही हुआ। नीकु यानी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। अब तो नीकु का एक और परिचय भी हो गया है। अपनी पार्टी जद (एकी) के अध्यक्ष बन गए हैं। मकसद में सफल रहे। पटना में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद बुलाई थी। उसमें उनके अध्यक्ष चुने जाने पर पक्की मोहर लग गई। यों फैसला इसका पिछले पखवाड़े कार्यकारिणी की दिल्ली में हुई बैठक में ही हो गया था। राष्ट्रीय परिषद और दो कदम आगे बढ़ गई। न केवल उनके पार्टी मुखिया होने पर मोहर लगाई अलबत्ता इस बात के लिए भी अधिकार दे दिया कि वे खुल कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका अदा करें। गैरभाजपाई दलों का गठबंधन कराएं। उनकी पार्टी ने अब परोक्ष रूप से उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना दिया है। गदगद नीकु ने सफाई दी कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं। वे तो पार्टी के अनुशासित सिपाही हैं। पार्टी जो आदेश देगी उस पर अमल करेंगे। भला पार्टी में अब कौन मुंह खोलेगा उनके खिलाफ। अध्यक्षजी का कब से तमगा लगाए अपनी सियासी दुकान चला रहे शरद यादव तक तो उनकी स्तुति कर रहे हैं। पटना में पहले से खूंटा गाड़ रखा है। अब दिल्ली में खूंटा गाड़ने में जुटेंगे नीकु। मिशन 2019 का और क्या मतलब है? सपना देखना गलत नहीं है। पर उसे नकारने से क्या फायदा? कौन मुख्यमंत्री नहीं चाहता प्रधानमंत्री बनना। लेकिन नीकु दलील दे रहे हैं कि जो चाहता है वह नहीं बन पाता। मुलायम सिंह यादव के बारे में बेशक यह बात सच लगती हो पर नरेंद्र मोदी का अनुभव तो उलट रहा। उन्होंने तो गुजरात का मुख्यमंत्री रहते ही सपना देखा था सबसे बड़े पद का। सपना साकार हुआ भी। लालू यादव ने टंगड़ी मारी थी मुलायम को। नीकु के प्रति अभी तो प्रेम ही जता रहे हैं। पर मन में क्या है, कौन जाने? प्रधानमंत्री पद का सपना तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कब से देख रही हैं। लेकिन नीकु ठहरे दूरदर्शी। दूसरे दावेदार उनकी तर्ज पर भला तैयारी कैसे कर सकते हैं।
पुत्रमोह
मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर। नीकु के बड़े भाई हैं लालू यादव। अपनी पार्टी राजद के सुप्रीमो। पहले पत्नी राबड़ी को दो बार मुख्यमंत्री बनवाया। अब दोनों बेटों को सत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया। एक को तो शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन की तरह सीधे उपमुख्यमंत्री बनवाया है। फिलहाल तो दोनों को नीकु का भी आशीर्वाद मिल रहा है। वैसे लालू के विरोधियों की कमी नहीं है। पिछले दिनों अपने उपमुख्यमंत्री बेटे के साथ लालू केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के पास गए। बेटे का दौरा तो सरकारी था ही। खुद साथ हो लिए। अखबारों में उनकी भी तस्वीर छप गई। पर तस्वीर में साफ दिखा कि लालू का फोटो कट रहा है। विरोधियों को मुद्दा मिल गया। बिहार सरकार के सूचना विभाग पर निशाना साधा। लेकिन लालू ने चुप्पी बनाए रखी। सियासी सूरमा उनकी चुप्पी को बेवजह नहीं मान रहे। वे जानते हैं कि लालू अपने बेटों को गुर सिखा रहे हैं। बाप अगर बेटे को हुनर सिखाए तो इसमें अटपटा क्या है?
सियासत में विज्ञान
रघुवरदास को गुस्सा भी आता है। आदिवासी राज्य झारखंड के मुख्यमंत्री ठहरे। पर गुस्सा किस पर? पड़ोसी राज्य बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर। मुंह से निकल ही गया- नीतीश को सत्ता का घमंड हो गया है। फिर बिहार सरकार की तरफ से आए पत्र का हवाला दिया। जिसमें शराब बंदी के लिए मदद की गुहार है। झारखंड की सीमा के भीतर जाकर बिहारी शराब पी रहे हैं। बिहार में पूर्ण शराबबंदी जो लागू हो गई। रघुवरदास ने इस पत्र को अपने मद्यनिषेध विभाग के हवाले कर दिया। पत्र की भाषा शैली पर उन्हें एतराज हुआ। उसी से नीतीश कुमार पर सत्ता के घमंड का आरोप लगाया। नीकु कई बार कह चुके हैं कि झारखंड जाकर शराब बंदी के लिए मुहिम चलाएंगे। वहां के कई महिला संगठनों ने उन्हें न्योता भी दे रखा है। बिहार को तो सुधार ही रहे हैं अब झारखंड को भी सुधारेंगे। कोशिश तो दूसरे पड़ोसी उत्तर प्रदेश को सुधारने की भी होगी। यह बात अलग है कि जैसे ही उन्होंने इसका एलान किया- अखिलेश सरकार ने अपने राजस्व को बढ़ाने के लिए शराब की बिक्री बढ़ाने का एलान कर दिया। विज्ञान का सिद्धांत है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया जरूर होती है। पर रघुवरदास और अखिलेश यादव ने तो नीकु को सियासत में भी लागू कर दिखाया विज्ञान का फार्मूला।
फिसली जुबान
कमान से निकला तीर और जुबान से निकली बात कभी वापस नहीं होती। देश का हर आदमी समझता है इस कहावत का अर्थ। पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यह मतलब देर से समझ आया। उनके एक बयान ने पार्टी के कई नेताओं को नाराज कर दिया। नारद न्यूज स्टिंग के वीडियो में रिश्वत लेते दिखाया गया था इन नेताओं को। ममता ने कोलकाता की एक चुनावी सभा में इसी स्टिंग का जिक्र छेड़ दिया। छेड़ना मजबूरी लगा होगा। विपक्ष ने हमला तेज जो कर रखा है इस हथियार के बहाने। जाहिर है कि मंशा खुद को पाक-साफ साबित करने की रही होगी। तभी तो बोल दिया कि पहले पता होता तो स्टिंग में शामिल नेताओं को टिकट ही न देती। पर यह सफाई तो उलटी पड़ गई। अब तो विपक्ष के तेवर और तीखे होने ही थे। उधर, कोलकाता के मेयर शोभन चटर्जी, पंचायत राज्य मंत्री सुब्रत मुखर्जी, नगर विकास मंत्री फिरहाद हकीम और शुभेंदु अधिकारी ने तो मुंह ही फुला लिया। बेशक ममता ने फोन पर सफाई दे उनकी नाराजगी दूर करनी चाहिए। बचाव की मुद्रा में बोलीं कि उनकी जुबान फिसल गई थी। उधर विपक्षी कांग्रेस और माकपा ने यह तुर्रा छोड़ने में देर नहीं लगाई कि ममता को खुद ही अपने नेताओं पर भरोसा नहीं। बेचारे चारों तृणमूल नेताओं की हालत पतली हो गई है। मुख्यमंत्री की टिप्पणी पर क्या बोलें? नारद स्टिंग का ग्रामीण इलाकों में मतदान पर भले फर्क न पड़ा हो पर शहरी मतदाताओं को तो सोचने को मजबूर कर ही दिया इस वीडियो ने।
खफा क्यों न हों
राजस्थान सरकार के कामकाज से आम जनता की खुशी या नाराजगी का पता तो चुनाव में ही चलेगा पर भाजपा के कार्यकर्ताओं की नाराजगी उनके लटके चेहरों से साफ झलकती है। जयपुर में भाजपा ने शहरी निकायों के अपने चुने हुए नुमाइंदों का सम्मेलन बुलाया था। इसी से सामने आया नौकरशाही और सरकार के प्रति पार्टी के लोगों का असंतोष। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, सूबे के पार्टी प्रभारी वी सतीश और सूबेदार अशोक परनामी को हर किसी ने खूब खरी खोटी सुनाई। सम्मेलन में उपस्थिति कम देख बड़े नेताओं का माथा तो शुरू में ही ठनक गया था। आधे नुमाइंदे भी नहीं पहुंचे। गैरहाजिरी के पीछे असल वजह असंतोष और निराशा ही बताई जा रही है। प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान का शहरी इलाकों में कोई असर तभी तो नहीं दिख रहा। जो आए उन्होंने जम कर भड़ास निकाली। वसुंधरा, परनामी और सतीश की तिकड़ी उन्हें धीरज रखने की नसीहत ही देती रही। इससे पहले सूबेदार परनामी को सतीश के साथ किए गए अपने अजमेर दौरे में भी कार्यकर्ताओं का कोपभाजन बनना पड़ा। सतीश ने मौजूद कार्यकर्ताओं से केंद्र और राज्य सरकार की जनहित योजनाओं की बाबत सवाल-जवाब किए तो कार्यकर्ता चुप्पी साध गए। सरकार पर अफसरों की मोहताज हो जाने का मुलम्मा अलग चढ़ा दिया। लगे हाथ चेतावनी अलग दे डाली कि कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हुई तो नौकरशाहों से ही करा लेना चुनाव में काम। बेचारे संघी सतीश ने यह कह कर पीछा छुड़ाया कि परनामी कार्यकर्ताओं को उपलब्धियों की पुस्तक उपलब्ध कराएंगे। बदहाली का आलम यह है कि सरकार का सूचना तंत्र तक सरकार की दस योजनाओं का विवरण नहीं दे पा रहा। कार्यकर्ताओं की बात है भी वाजिब। जिन्हें सरकार मोटी पगार देती है, वे तो कुछ भी याद नहीं रखते। फिर बेचारे कार्यकर्ता से ही उम्मीद क्यों करती है पार्टी।
हुनरमंद राजा
हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का सियासी प्रबंधन अद्भुत है। भाजपा का शिखर नेतृत्व तो दूर सूबे का नेतृत्व भी उनका विरोध करता नहीं दिख रहा। ले-देकर प्रेम कुमार धूमल के छोटे पुत्र अरुण धूमल जरूर उन्हें असहज करते रहे हैं। विधानसभा के भीतर भी प्रेम कुमार धूमल तक ने विरोध के नाम पर महज रस्मअदायगी ही तो की। विश्व हिंदू परिषद ने तो वीरभद्र को सच्चा और खरा हिंदू बता उनका सम्मान तक कर दिया। वीरभद्र को तो मौका मिल गया अपने आलोचकों के बीच अपना पक्ष रखने का। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को बताया कि उनके विरोधी भी उनके पक्ष में हवन करते हैं। राजभवन में हुए हवन की तरफ होगा इशारा। संघी राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने राजभवन से मधुशाला को हटवा कर उसकी जगह यज्ञशाला बनवाई है। राज्यपाल ने यज्ञ कराया तो आहूति वीरभद्र और धूमल दोनों देने पहुंचे। वीरभद्र को यों केंद्रीय एजंसियों ने खूब घेरा रखा है। पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक भी शब्द नहीं बोला है अब तक उन्होंने। जो भी लानत-मलानत की है, सब वित्तमंत्री अरुण जेटली की। अपने असली विरोधी प्रेम कुमार धूमल को तो जब जैसा चाहते हैं मनमाफिक बना ही लेते हैं वीरभद्र। इसी खूबी के चलते तो विश्व हिंदू परिषद ने किया होगा उनका गुणगान।
शांता की लाचारी
सुधीर शर्मा ने पंख फैलाए तो धुरंधर शांता कुमार भी व्याकुल हुए। पालमपुर की याद आ ही गई। यों सुधीर शर्मा का विधानसभा क्षेत्र धर्मशाला ठहरा। फिलहाल वीरभद्र सरकार में शहरी विकास मंत्री हैं। धर्मशाला को नगर पालिका से बढ़ा कर नगर निगम का दर्जा दिलाने का श्रेय ले रहे हैं। फिर भला शांता कुमार क्यों न करें अपने पालमपुर की चिंता। बाशिंदे तो वहीं के ठहरे। लंबी सियासी पारी खेल चुके हैं। अपने मुख्यमंत्री रहते तो कभी ख्याल नहीं आया पालमपुर को नगर निगम बनाने का। दो बार खुद मुख्यमंत्री रहे और दो बार उन्हीं की पार्टी के प्रेम कुमार धूमल। अलग ढंग की सियासत करते रहे तभी तो मन में पूरे सूबे का ख्याल होता था। केवल अपने इलाके का नहीं। फिलहाल पालमपुर पांच हजार की आबादी वाला नगर परिषद है। निगम बनाना है तो पचास हजार की आबादी चाहिए। आसपास के इलाकों को मिला कर ही हो सकता है यह आंकड़ा पूरा। पर गांव वाले तो चाहते ही नहीं शहरी बनना।
काना-फूसी
नवजोत सिंह सिद्धू के साथ उनकी पार्टी के आला कमान ने कमाल की पैंतरेबाजी अपनाई। सूबे से बाहर भी कर दिया और कहने को सांसद की हैसियत बहाल कर दी। लोकसभा चुनाव में अमृतसर से उनका टिकट काट पार्टी ने अरुण जेटली को उम्मीदवार बनाया था। तभी से अपनी पार्टी से नाराज चल रहे थे सिद्धू। राज्यसभा की पार्टी को मिली इकलौती सीट पर भी दूसरे नेता को मौका मिलने से सिद्धू और खफा हुए तो अटकलें मिया-बीबी के केजरीवाल की पार्टी में जाने की भी लगने लगी। साफ है कि सिद्धू को और ज्यादा नाराज रखने की कुव्वत नहीं रही होगी उनकी पार्टी में। सो मनोनयन के जरिए ही बना दिया उन्हें सांसद। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उनकी नाराजगी भारी पड़ सकती थी पार्टी को। पत्नी नवजोत कौर सिद्धू बादल सरकार में मुख्य संसदीय सचिव हैं ही। हालांकि वे भी जब तक अकाली दल के बहाने अपनी पार्टी की आलोचना करती रही हैं। सिद्धू की दाद देनी होगी कि जीत की हैट्रिक बनाने के बावजूद उनका टिकट कटा पर जुबान कभी नहीं खोली उन्होंने। अलबत्ता भाजपा को अकाली दल का पिछलग्गू नहीं बनने का सुझाव देने से कभी नहीं चूके। राज्यसभा में आने से इतना तो साफ दिखता है कि पार्टी छोड़ने का उनका कोई इरादा नहीं है। अलबत्ता सियासत के साथ-साथ खेल और एंकरिंग के अपने पेशे के लिए भी वक्त निकाल पाएंगे। जानकार तो मनोनयन के पीछे उनकी पार्टी से ज्यादा खुद सिद्धू की पसंद मान रहे हैं।
करामाती मंत्री
सिंहस्थ के कारण चर्चा में है आजकल मध्यप्रदेश की नगरी उज्जैन। पर सूबे के गृहमंत्री बाबू लाल गौर ने एक और मुद्दा दे दिया चर्चा का। एक कार्यक्रम में गुरुवार को एक महिला को उन्होंने जिस अंदाज में छुआ, उसे लेकर बावेला मच गया है। खासकर इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो मुख्यमंत्री शिवराज चौहान तक के होश उड़ गए। चौहान ने अगले ही दिन गौर को अपने घर बुला सफाई मांगी। पार्टी की तरफ से भी प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को वीडियो और घटना का ब्योरा भेजा जाना मामले की गंभीरता दिखा गया। कांग्रेसियों ने तो गौर का पुतला तक फूंक दिया। वे तो गौर के इस्तीफे की मांग पर अड़ रहे हैं।
खबर तो इस मामले में प्रधानमंत्री दफ्तर की सक्रियता की भी सामने आई है। ऐसे में राष्ट्रीय महिला आयोग भी भला चुप कैसे रहता। लेकिन गौर फिर भी सारी तोहमत मीडिया पर ही लगा रहे हैं। वे तो सीना तान कर कह रहे हैं कि न मुख्यमंत्री और न उनकी पार्टी के किसी नेता ने अब तक इस बाबत उनसे कोई बात की। पर कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने करामाती तेवर में पत्रकारों के सवाल पर जवाब के बजाए सवाल ही दाग दिया- आपको नहीं पता गौर साहब के बारे में। फिर चुटकी ली कि वे तो भगवान कृष्ण के वंशज ठहरे। लगे हाथ गौर की बर्खास्तगी की मांग करना भी नहीं भूले डिग्गी। यह बात अलग है कि वीडियो में जो महिला दिख रही है वह भाजपा कार्यकर्ता तो है ही, उसके पति को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लग रहा है वीडियो में। पार्टी के प्रति समर्पित दंपत्ति के समर्थन का ही बल है कि गौर ने तर्क दे डाला कि जब किसी ने शिकायत ही नहीं की है तो फिर जांच किस बात की। गौर भूल रहे हैं कि उनके मुख्यमंत्री रहते एक महिला के पति ने बाकायदा थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि वे उनके पत्नी पर गलत नजर रखते हैं और फोन पर देर रात तक अभद्र बातचीत करते हैं। 86 साल के मध्यप्रदेश के सबसे बुजुर्ग भाजपा नेता का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा क्योंकि किस्मत के धनी हैं वे।
उलटा पड़ा दांव
हरीश रावत सरकार को गिराने के मामले में चूक कर बैठी भाजपा। दांव तो अरुणाचल की तरह अपनी सरकार बनाने का चला था। पर कांग्रेस में वैसी बगावत नहीं हुई जिसका सतपाल महाराज ने सब्जबाग दिखाया था। लिहाजा अदालत में तो भाजपा की किरकिरी हुई ही है, हरीश रावत के शहीद होने जैसी धारणा भी बनी है सूबे के जनमानस में। हाईकोर्ट के दो जजों की पीठ ने फैसला तो केंद्र सरकार के खिलाफ सुनाया ही, उसकी लानत-मलानत कुछ ज्यादा ही कर डाली। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा कर थोड़ी राहत दे दी। अलबत्ता संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में तो पीछा शायद ही छूटेगा सरकार का। ऊपर से अपदस्थ मुख्यमंत्री हरीश रावत ने खूब पैंतरेबाजी दिखाई। हाईकोर्ट का फैसला मिलते ही आनन-फानन में कैबिनेट की दो बैठकें कर लोकलुभावन फैसलों की झड़ी लगा दी। आखिर अब पटाक्षेप तो इस ड्रामे का विधानसभा चुनाव के रूप में ही होना है। चुनाव का नतीजा चाहे जो आए पर हरीश रावत तो फिलहाल जन नायक बन ही बैठे।
नीयत में खोट
सरकारों का काम तो मिलावट के अपराध को नियंत्रित करना माना जाता है। पर मध्यप्रेदश का खाद्य और औषधि प्रशासन अपने कर्तव्य से भटक गया है। तभी तो खाने-पीने की चीजों में मिलावट करने वालों को बचाने की तरकीब खोज ली। फरमान जारी किया है कि 66 फीसद नमूने सिर्फ सर्विलांस के तौर पर लिए जाएं। बाकी 34 फीसद को ही वैधानिक बनाया जाए। दोनों में फर्क यह है कि सर्विलांस का नमूना अगर फेल भी हो जाए तो मिलावट खोर को कैद के बजाए बतौर सजा चेतावनी का प्रावधान है। जबकि वैधानिक नमूना अगर फेल हो तो अदालत में मुकदमा चलता है। मिलावट करने वाले को जुर्माना या कैद या दोनों दंड भुगतने पड़ते हैं। सर्विलांस के नमूनों का हिस्सा बढ़ा कर अपनी मंशा का खुलासा किया है सरकारी महकमे ने।

