ममता बनर्जी गैर कांग्रेस-गैर भाजपा दलों की एका की मुहिम तो जरूर चला रही हैं। पर क्षेत्रीय दलों के अपने विरोधाभास भी तो कम नहीं। कोलकाता की अपनी रैली का प्रचार कब से कर रही हैं। देश के तमाम क्षेत्रीय दलों के नेताओं को न्योता भेज रखा है। पर झटकों की शुरुआत भी हो गई। वाम दलों ने इस रैली में शामिल होने से इनकार कर दिया है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के आने के आसार भी नहीं लग रहे। जबकि मां-बेटे को ममता खुद दिल्ली जाकर रैली में शामिल होने का न्योता देकर आई थीं।
राहुल ने अलबत्ता पूरी तरह निराश नहीं किया उनको। पार्टी की नुमाइंदगी अब मल्लिकार्जुन खरगे करेंगे। दरअसल कांग्रेस की अपनी दुविधा है। पश्चिम बंगाल के ज्यादातर पार्टी नेता तृणमूल कांग्रेस से तालमेल के विरोध में हैं। वे वाम मोर्चे के साथ गठबंधन के पक्ष में हैं या फिर मैदान में अकेले कूदने के। इसलिए आलाकमान को चौकसी बरतनी पड़ रही है। सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे की तर्ज पर। हालांकि, शनिवार को होने वाली महारैली की तैयारियां पूरी हो गई हैं। ममता की हसरत इस महारैली के जरिए सूबे में अतीत में हुई तमाम रैलियों में आई भीड़ के रिकार्ड को तोड़ने की है। लेकिन वाम दलों के दूर रहने और सोनिया-राहुल के नहीं आने से कुछ तो चमक फीकी पड़ेगी ही। मायावती की तरह ममता खुद प्रधानमंत्री बनने की हसरत का खुलासा बेशक न करें, पर सपना तो देख ही रही होंगी। तीसरे मोर्चे की सरकार बने तो स्वाभाविक है कि सबसे बड़े दल का नेता ही ठोकेगा गठबंधन की सूरत में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर दावा। पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें ठहरीं। ममता ने तीन चौथाई सीटें पा ली तो त्रिशंकु लोकसभा की सूरत में कद्दावर कहलाएंगी वे। फिलहाल तो शनिवार की रैली की सफलता पर टिकी हैं सबकी निगाहें।
नहीं थमी गुटबाजी
राजस्थान में भाजपा की कलह सतह पर दिखने लगी है। विधानसभा चुनाव की हार के बाद पार्टी का संकट बढ़ा है। विधायक दल के नेता के नाम पर कोई सहमति नहीं बन पाई तो आलाकमान को करना पड़ा हस्तक्षेप। मकसद वसुंधरा और उनके विरोधी दोनों ही खेमों को संतुष्ट करने का दिखा। एक तरफ वसुंधरा को पार्टी का उपाध्यक्ष बना जयपुर से दिल्ली का टिकट कटाने का संकेत दे दिया तो दूसरी तरफ विधायक दल का नेता गुलाब चंद कटारिया को बना दिया। संघी खेमा भी सहमत हो गया कटारिया के नाम पर। जबकि वसुंधरा समर्थक राजेंद्र राठौड़ होंगे अब उपनेता। कटारिया वरिष्ठ हैं और भैरोसिंह शेखावत की सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। लेकिन यह गुत्थी सुलझी तो अब लोकसभा के उम्मीदवारों का नया पेच फंस गया है। वसुंधरा और उनका विरोधी दोनों ही गुट अपनी अलग-अलग सूची बनाए है। सूबे की सभी 25 सीटों पर पिछली दफा पार्टी ने विजय पताका फहरा दी थी। इस बार वैसी लहर नहीं दिख रही।
ऊपर से उपचुनाव में दो सीटें गंवा भी चुकी है पार्टी। संघी खेमे ने पार्टी आलाकमान को चेताया है कि मौजूदा 23 में से आधे सांसद भी दोबारा जीत कर आने की स्थिति में नहीं हैं। संघी खेमे को तो झालावाड़ सीट भी खतरे में नजर आ रही है। जहां वसुंधरा के बेटे दुष्यंत तीन बार जीत चुके हैं। पार्टी इस बार यहां वसुंधरा को ही बनाना चाह रही है उम्मीदवार। यानी एक तीर से दो शिकार। पहला तो यही कि सीट बच जाएगी। दूसरा अहम है और वह यह कि वसुंधरा सूबे की सियासत से बाहर हो जाएंगी। उनकी जगह नया नेतृत्व उभार पाएगी पार्टी। आलाकमान के इरादों से वसुंधरा खेमा भी अनजान नहीं है। यह खेमा अपनी नेता को सूबे की सियासत में पार्टी के भीतर सिरमौर ही देखना चाहता है। लगता है कि गुटबाजी और कलह थामने के लिए आलाकमान को करना पड़ेगा हस्तक्षेप।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

