फिलहाल तो कानूनी दांवपेच में फंस ही गई है भाजपा की बहुचर्चित रथयात्रा। पश्चिम बंगाल की सभी 42 लोकसभा सीटों में संपर्क के मकसद से बनाई है चुनावी रणनीति के चाणक्य कहे जाने वाले रणनीतिकार ने इस रथयात्रा की योजना। अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए मतदाताओं की नब्ज टटोलना भी मकसद होगा ही। तीन अलग-अलग इलाकों से निकलने वाली इन रथयात्राओं के दौरान रणनीतिकार खुद मौजूद रहने वाले हैं। लेकिन ममता सरकार ने कानून व्यवस्था का वास्ता देकर इजाजत देने से इनकार कर दिया। सात दिसंबर से प्रस्तावित थी पहली रथयात्रा। कूच बिहार से शुरू होने वाली इस रथयात्रा के दौरान ही प्रधानमंत्री को भी करना था सिलीगुड़ी में 16 दिसंबर को एक रैली को संबोधित। लेकिन अदालती गतिरोध में यात्रा उलझी तो मोदी का दौरा भी रद्द हो गया। अब तो पांच राज्यों के चुनावी नतीजों ने झटका दिया है दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी को। इन नतीजों के मद्देनजर रणनीतिकार को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। वैसे भी इस सूबे में कम से कम 22 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया गया है।

सूबे के पार्टी नेताओं ने अतिउत्साह में इस लक्ष्य को खुद ही 25-26 कर रखा था। अब सब कुछ खटाई में है। अब तो तीसरी रथयात्रा का तय वक्त 14 दिसंबर भी बीत गया। अड़ंगा सबसे पहले कूच बिहार के पुलिस अधीक्षक ने लगाया। सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ने का अंदेशा जता रथयात्रा की इजाजत देने से साफ इनकार कर दिया। भाजपा इसके विरोध में हाई कोर्ट जा पहुंची। पर कोलकाता हाई कोर्ट से भी तत्काल मनचाहा आदेश नहीं ले पाई। अलबत्ता हाई कोर्ट ने रथयात्रा पर नौ जनवरी तक रोक लगा दी।

हाई कोर्ट के एकल पीठ के इस आदेश को खंडपीठ में चुनौती देने से भी बात नहीं बनी। हां, खंडपीठ ने सूबे की सरकार को हड़काते हुए भाजपा नेताओं के साथ बैठक कर गतिरोध दूर करने की सलाह दे दी। फिलहाल तो आसार दिख नहीं रहे गतिरोध दूर होने के। इजाजत मिल भी जाए तो भी हार की हताशा से बुझे भाजपाई पता नहीं तैयार होंगे भी अपनी रथयात्राओं के लिए।

हारे को हरिनाम: राजस्थान ने परंपरा कायम रखी। सियासी पंडितों को हैरानी से बचा दिया सूबे के मतदाताओं ने। अलबत्ता आलाकमान ने तो यही फरमाया था कि इस बार भाजपा तोड़ देगी बदलाव की स्थापित परंपरा को। नतीजों ने वसुंधरा राजे की अकड़ ढीली कर दी। अब तो लोकसभा चुनाव की चिंता ने घेर लिया है भाजपा को। विधानसभा चुनाव में तो वसुंधरा को मनमानी की छूट देना मजबूरी बन गई थी पर लोकसभा में शायद ही वैसी स्वायत्तता देंगे अब आलाकमान। कहा तो यहां तक जा रहा है कि उन्हें लोकसभा चुनाव से दूर ही रखने की रणनीति बन रही है। दरअसल तीन चौथाई से ज्यादा सीटें जीत कर वसुंधरा ने 2013 में नया इतिहास रचा था। उससे उनकी लोकप्रियता का ग्राफ इतना ऊंचा गया कि उनके विराट व्यक्तित्व के आगे भाजपा का आलाकमान बौना बन कर रह गया था।

चुनाव के वक्त चाहे जितनी दरियादिली दिखाई हो पर पांच साल के राजकाज में तो वसुंधरा ने किसी की कभी परवाह की ही नहीं। हार की आशंका तो पहले से हर किसी को हो ही गई थी। भाजपाई खुद भी तो यही दलील दे रहे हैं कि अमित शाह की रणनीति ने हार को शर्मनाक हार में तब्दील होने से बचा लिया। प्रकाश जावड़ेकर और मुरलीधर राव ने आलाकमान के दूत की भूमिका साफगोई से निभाई। अपनी रिपोर्ट में आलाकमान को खबरदार भी कर दिया कि गुस्सा नरेंद्र मोदी के प्रति नहीं, वसुंधरा के प्रति है। प्रधानमंत्री ने प्रचार के आखिरी दौर में अपनी किसी भी सभा में वसुंधरा का नाम भी नहीं लिया। मतदान से एक हफ्ते पहले यह हवा भी बनाई कि मुकाबला कांटे का है। इसका असर भी दिखा। कई सीटें भाजपा बचा ले गई। जंग में कोई भी सेनापति पहले से अपनी हार कबूल नहीं करता। चुनाव भी तो जंग ही ठहरे। अब जनाधार बरकरार रहने और सूपड़ा साफ नहीं होने की दुहाई दे अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल चाहे जितना बढ़ा लें पर कहावत तो यही है कि जो जीता वही सिकंदर। यानी हारे को हरिनाम।

बढ़ेगा असंतोष: हिंदी पट्टी के तीन अहम सूबों से भाजपा का राज खत्म हुआ तो उत्तराखंड में भी खलबली शुरू हो गई। कहने को यह छोटा सूबा ठहरा। लोकसभा की महज पांच ही सीटें हैं। पिछली दफा पांचों भाजपा के खाते में गई थी। विधानसभा चुनाव में भी जमकर चला था भाजपा का जादू। लेकिन तीन राज्यों की हार के बाद इस सूबे के भाजपा कार्यकर्ता भी सदमे में हैं। लोकसभा चुनाव को लेकर बेचैनी स्वाभाविक भी है। अब ज्यादा वक्त बचा ही कहां है। सुगबुगाहट तो शुरू हो ही गई है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री रहते नतीजे अपेक्षा के अनुरूप मिलने से रहे। यानी नेतृत्व परिवर्तन ही लाज बचा पाएगा।

सूबेदार अजय भट्ट से रावत की अनबन भी किसी से छिपी नहीं है। पर रावत को आरएसएस का वरदहस्त हासिल है। इसी दम पर वे किसी की परवाह नहीं कर रहे। भले अजय भट्ट, रमेश पोखरियाल निशंक, प्रकाश पंत और भुवनचंद्र खंड़ूड़ी उन पर जातिवाद को बढ़ावा देने और ब्राह्मणों की अनदेखी के चाहे जितने आरोप लगा लें। सूबे में भाजपा ही नहीं नौकरशाही भी राजपूत बनाम ब्राह्मण के खांचों में बंटी लग रही है। त्रिवेंद्र सिंह रावत को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी समर्थन मिल रहा है। योगी न केवल राजपूत हैं बल्कि मूल निवासी भी उत्तराखंड के ठहरे। राजपूत लाबी के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी माने जा रहे हैं। यह लाबी हरिद्वार से निशंक का टिकट कटवाने की जुगत में लगी है।

उधर टिहरी से आलाकमान विजय बहुगुणा को उतारना चाहता है तो खुद बहुगुणा अपने बेटे साकेत के लिए लाबिंग में जुटे हैं। नाराज हरक सिंह रावत भी कम नहीं हैं। कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं को अपनी अनदेखी का मलाल अलग साल रहा है। ऐसे में लोकप्रियता का ग्राफ घटते ही गुटबाजी बढ़ने की आशंका को कौन नकार सकता है।