योगी आदित्यनाथ का कोई जवाब नहीं। देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री ने बुधवार को दावा कर दिया कि उनके ढाई साल के राज में सूबे में कोई दंगा नहीं हुआ। सब कुछ अमन-चैन से बीता। पर उसी दिन सूबे के हाई कोर्ट की राय अलग थी। दो जजों के एक खंडपीठ ने सूबे की कानून व्यवस्था पर सवाल उठाया। इससे पहले उन्नाव के चर्चित कांड में सत्तारूढ़ पार्टी के एक विधायक की संलिप्तता पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा था- लगता है कि यूपी में जंगलराज है। बहरहाल हाई कोर्ट ने तो सूबे के डीजीपी और प्रमुख सचिव गृह को ही तलब कर लिया। बिजनौर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पुलिस की मौजूदगी में दिनदहाड़े हत्या हो तो किसे हैरानी नहीं होगी। हाई कोर्ट ने नाराजगी में कहा कि यूपी में अदालतें भी सुरक्षित नहीं हैं। एक के बाद एक कई जिलों में अदालतों के भीतर गोलीबारी होना सूबे की कानून व्यवस्था पर सवाल तो उठाता ही है।
हद तो मंगलवार को हो गई जब सत्तारूढ़ पार्टी के ही एक विधायक नंद किशोर गुर्जर ने विधानसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी। अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित और संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना की सलाह की भी अनदेखी करते हुए गुर्जर अपनी बात कहने पर अड़े रहे। उनके समर्थन में भाजपा के करीब सौ विधायक तो नारे लगा ही रहे थे, सपा, बसपा और कांग्रेस के विधायकों ने भी कहा कि सरकार अपने ही विधायक का गला घोट रही है। विधायकों ने सदन में विधायक एकता जिंदाबाद के नारे भी लगाए। हंगामे के कारण सदन में कोई कामकाज किए बिना बैठक दिन भर के लिए स्थगित करनी पड़ी। दरअसल गुर्जर की पीड़ा यह है कि योगी आदित्यनाथ के राज में नौकरशाही पूरी तरह निरंकुश हो गई है। भ्रष्टाचार बढ़ा है। कमीशन की दरें पहले से और बढ़ गई हैं। वे मुख्यमंत्री की जात के एक अफसर से प्रताड़ित बताए जाते हैं। पर सत्तारूढ़ दल का होने पर भी कोई उनकी मदद को तैयार नहीं।
विधानसभा अध्यक्ष ने भरोसा दिया कि वे मुख्यमंत्री तक उनकी शिकायत रखेंगे। दूसरी तरफ उन्होंने जिले के कलक्टर और एसपी को भी तलब करने की बात कही। बुधवार को गुर्जर को सभी विधायकों के दबाव में बोलने का मौका भी दिया गया। उनके भाषण से साफ लग रहा था कि सत्तारूढ़ दल के बजाए मानो कोई विपक्षी विधायक बोल रहा है। नंद किशोर गुर्जर ने गलत नहीं कहा। सूबे में न भाजपा के सांसदों, विधायकों को कोई पूछ रहा है और न मंत्रियों की ही बात उनके मातहत अफसर सुनते हैं। खुद भाजपा के कार्यकर्ता भी दबी जुबान से कहने लगे हैं कि भ्रष्टाचार कम होने के बजाए बढ़ा है। योगी आदित्यनाथ के अलावा अगर किसी की धमक है तो वे हैं सुनील बंसल। जो हैं तो पार्टी के संगठन मंत्री पर नौकरशाही में भी हर कोई जानता है कि सरकार उन्हीं के इशारे पर चल रही है। खींचतान का आलम यह है कि चार महीने से सूबे में सरकारी मशीनरी के मुखिया यानी मुख्य सचिव की नियुक्ति भी नहीं हो पाई है।
