अभिनंदन और विदाई- ये सब जीवन यात्रा के अभिन्न अंग है। जनवरी से दिसंबर के महीने के बीच जो भी घटित होता है, चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो, घर-परिवार, देश-विदेश से लेकर सृजन साहित्य तक, वह सब समय के साथ अपनी अवधि के भीतर घटित होकर अपने पद चिह्न मन-मस्तिष्क पर छोड़ जाता है। अमूमन हर बीता वर्ष इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होता है। हर बार के आकलन में हम गौर करते हैं कि वैश्विक पटल पर कई घटनाक्रम हुए, जो सब कुछ समय के साथ अपना निर्धारित स्थान इस वर्ष में दर्ज करवा कर इस वर्ष में स्थायी हो गए। खेल, साहित्य, शिक्षा और तकनीक में कई उपलब्धियों ने हमें समृद्ध किया और हम सबका गौरव बढ़ाया। व्यक्तिगत संदर्भों में कई मित्र जुड़े, कई बिछड़ गए। यह जीवन का हिस्सा रहा। समय का अभाव कहें या परिस्थितियां, सबके साथ हम चलते रहे। हम सब अपने भीतर झांक सकते हैं कि इस सबके बीच कई बार द्वंद्व रहा, उलझनें रहीं तथा समस्याएं और समाधान साथ-साथ चलते रहे।

समय को रोकने वाले खुद रुक गए, समय चलता रहा

समय की धारा में हम सब बहते चले जाते हैं, क्योंकि समय बलवान होता है। समय को हम चाह कर भी पकड़ नहीं पाते। बल्कि यों कहें कि नहीं पकड़ सकते। समय अदृश्य है, पर चलता रहता है अनवरत। यों भी, यह किसी के रोके कभी रुका है क्या? रोकने की कोशिश करने वाले लोग रुक गए, लेकिन समय चलता रहा। हम समय के अभाव का रोना रोते रहते है और समय अपनी निर्धारित सीमा में अपनी चाल चलता रहता है। गांव, शहर, गलियां, व्यक्ति आदि जाने क्या-क्या अपने नवीन संदर्भों के साथ जुड़ते और छूटते चले जाते हैं। हम चुपचाप समय के साथ अपने दिन व्यतीत करते जाते हैं। समय की धारा में हर्ष, विषाद, सम्मान, पुरस्कार, अभिनंदन, सफलताएं, असफलताएं… और भी न जाने क्या हमारे जीवन का हिस्सा बन कर कभी हमें आनंद के सागर में डुबो देते हैं और कभी निराशा हमारा दामन पकड़ कर पीछे खींचती है। मगर हमारा आत्मविश्वास हमें समय के साथ कदमताल मिलाता आगे ले जाता है।

नया साल केवल तारीख नहीं, सोच बदलने और जिंदगी को नई शुरुआत देने का अवसर है; कुछ भूलें और कुछ नया करें

यही आत्मविश्वास मन के भीतर ऊर्जा, उत्साह, उमंग का संचार करता है। एक नई सुबह रोज बांह पसारे सुंदर मुस्कान के साथ हमारा स्वागत करती है। हम पिछला सब कुछ भूल कर फिर से नए दिन के सूरज के साथ अपने कार्यों में तल्लीनता से संलग्न हो जाते हैं। यही हमें जीवंत बनाए रखता है। बीते वर्ष के दिसंबर ने अब हमसे विदाई ले ली है। जैसे-जैसे हम चिंतन करते हैं इस तरह की विदाई के बारे में, अचानक हम सबके मुंह से निकलता है कि पिछले दिसंबर के बाद भी नया साल आया था और अब फिर यह पूरा हो गया। नया वर्ष अपनी नवीन रूपरेखा, नवीन गतिविधियों उपलब्धियों के साथ दस्तक दे चुका है। पता ही नहीं चला कि बीता वर्ष भी कैसे चुपके से बीत गया। बहुत कुछ नया जुड़ा, बहुत कुछ पुराना पीछे छूट गया। कई सुखद क्षणों में आनंददायी पलों को जिया और कभी मन अनेक बार विपरीत परिस्थितियों में व्याकुल हुआ… आंखें नम हुर्इं। क्या यही सब फिर से इस वर्ष हमारे जीवन में नहीं दुहराएगा?

र्द किसी को मजबूत बनाता है, किसी को तोड़ देता है; किस बात का है फर्क?

दरअसल, ये सब जीवन के अहम हिस्से हैं। इनके सहारे ही जीवन समय के साथ गतिमान रहता है। जीवन चलने का नाम है। महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कामायनी में लिखा है- ‘दुख की पिछली रजनी बीच विकसता सुख का नवल प्रभात, एक परदा नीला झीन छिपाए है जिसमें सुख गात।’ वक्त के साथ हम सब पिछले बीत चुके महीनों का हिसाब-किताब लगाते हैं। किसी की झोली में खुशियों के दीप जगमगाते हैं, तो किसी के हिस्से में आया दर्द उसे भीतर तक हिला देता है। कभी उम्मीद खिल जाती है, तो कभी भय का साया मंडराने लगता है कि क्या दर्द का सिलसिला कायम रहेगा। फिर भी समय तो समय है, जैसा भी हो बीत ही जाता है। समय सब कुछ भर देता है।

सुख-दुख जीवन के दो पहलू हैं, जिनके साथ हम सबको अपनी-अपनी भूमिकाएं निभानी पड़ती है। समय किसी के रोकने से नहीं रुकता, जैसे देखते-देखते पिछला वर्ष बीत गया और अब नए वर्ष का सफर शुरू हो चुका है। कितना कुछ पीछे छूट जाता है। हम सब स्मरण करते हैं कि कल की ही तो बात है कि हमने इस वर्ष के स्वागत के लिए पलक-पांवड़े बिछाए थे। अब वह भी चला गया। हम फिर नव ऊर्जा के साथ तैयार हो जाते हैं नववर्ष के स्वागत अभिनंदन के लिए और बीते वर्ष को विदाई देने। यही सृष्टि का नियम भी है।

जताएं आभार, युवा जीवन की दौड़ में सुकून, संतुलन और सफलता का सबसे शांत हथियार

नूतनता सदैव वंदनीय अभिनंदनीय होती है। जीवन के विविध क्षेत्रों में जहां हमारी उपस्थिति है, वह सब बीते वर्ष के बही खाते में दर्ज हो जाता है। इसके बाद तो कैलेंडर के पन्ने और तिथियां बदल जाती हैं। कभी-कभी ऐसा अहसास होता है कि कितनी तेजी से समय भाग रहा है। एक वर्ष जीवन का और बीत चला अपने पीछे कितने स्मृति-चिह्न छोड़ता हुआ। कितना कुछ रह-रहकर याद आता है लोगों के साथ बिताया गया समय। वे खिलखिलाते चेहरे, वे शहर, वे जगहें, जहां हम घूमने या किसी विशेष कारण से गए, वे यात्राएं, यात्राओं के सहयात्री, यात्राओं के अविस्मरणीय पल..! कुछ भी भूल नहीं पाते, भले ही पुराना साल बीत गया हो। समय की अपनी अवधि और सीमाएं- इन सबके बीच संघर्षशील व्यक्ति गतिमान रहता है।