वर्ष 2025 की आपकी सबसे यादगार स्मृति क्या है? वह कौन सा शब्द है, जो उस स्मृति को संजो कर रखेगा? भारत में सबसे अधिक लोगों को प्रभावित करने वाला शब्द कौन-सा रहा?

अल्पकालिक शब्द

सिंदूर शब्द एक स्पष्ट दावेदार है। राष्ट्रीय जांच एजंसी के अनुसार, पहलगाम में हुए आतंकी हमले को तीन पाकिस्तानी घुसपैठियों और उन्हें शरण देने वाले दो स्थानीय सहयोगियों ने अंजाम दिया था। इसके जवाब में आपरेशन सिंदूर चलाया गया, जो एक स्वैच्छिक संघर्ष था। भारतीय वायु सेना, मिसाइलों और ड्रोन ने पाकिस्तान के सैन्य ढांचे को व्यापक क्षति पहुंचाई और इसके परिणामस्वरूप भारत को भी कुछ नुकसान उठाना पड़ा (जो युद्ध में अपरिहार्य है)।

पहलगाम हमले को अंजाम देने वाले तीनों पाकिस्तानी एक मुठभेड़ में मारे गए। जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए दो भारतीयों के संबंध में अभी तक कोई जानकारी नहीं है। संघर्ष के परिणामों को लेकर पारदर्शिता की कमी अभी भी बनी हुई है। आपरेशन सिंदूर केवल चार दिन तक चला, जो कोई स्थायी प्रभाव छोड़ने के लिए बहुत छोटा था।

एक और दावेदार है शुल्क

2 अप्रैल, 2025 से यह शब्द हर बातचीत में सुनाई देने लगा। इसका एकमात्र प्रतिद्वंद्वी शब्द था- ट्रंप! ट्रंप और शुल्क ने कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं को तहस-नहस कर दिया है, और इसका सिलसिला अभी खत्म नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए, भारतीय निर्यात पर पारस्परिक शुल्क और (रूस से तेल खरीदने पर) जुर्माना अभी भी लागू है, जिससे इस्पात, एल्युमीनियम, तांबा, वस्त्र, रत्न एवं आभूषण, समुद्री उत्पाद और रसायनों का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। पीयूष गोयल की ओर से किया गया ‘निकट भविष्य’ में अमेरिका से द्विपक्षीय व्यापार समझौते का वादा वर्ष 2025 के अंत तक उतना ही दूर है, जितना अप्रैल 2025 में था।

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जीएसटी भी एक मजबूत दावेदार है। जीएसटी की विनाशकारी शुरुआत के आठ साल बाद केंद्र सरकार ने अच्छे सुझावों पर ध्यान दिया और कर संरचना को तर्कसंगत बनाया तथा कई वस्तुओं एवं सेवाओं पर कर की दरें कम कीं- फिर भी प्रशासनिक तौर पर उत्पीड़न जारी है। व्यापारियों के हर संगठन ने जीएसटी कानूनों के अनुपालन को एक दु:स्वप्न बताया है। खुदरा उपभोग के आकार की तुलना में कर में दी गई छूट बहुत कम होने के कारण खपत में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई। उच्च खपत आबादी के केवल शीर्ष दस फीसद हिस्से तक ही सीमित रही।

शब्द, जो खो गए

एक अपरिचित मुहावरा- अर्थव्यवस्था के लिए सुनहरा वर्ष- चर्चा में आया, लेकिन जल्द ही गायब हो गया। यह साहित्यिक संदर्भ पढ़े-लिखे लोगों के लिए भी अपरिचित था। इसके अलावा, आइएमएफ ने भारत के राष्ट्रीय खातों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार से लेकर प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं तक, कई लोगों ने अर्थव्यवस्था की कमजोरियों पर बात की। अंतत: रोजगार की मांग ने आधिकारिक रूप से प्रायोजित उत्सव के शोर को दबा दिया। यहां एक सबक है: वर्तमान विकास दर पर, अमेरिका, चीन और भारत का 2025 में अपने सकल घरेलू उत्पाद (स्थिर अमेरिकी डालर में) में ‘उत्पादन’ का योगदान इस प्रकार रहा : (देखें तालिका)

Trump tariffs, GST crisis, Indian economy 2025
GDP

एक ओर चीन जहां अमेरिका (सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था) के साथ अंतर कम कर रहा है, वहीं भारत और चीन तथा भारत और अमेरिका के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था में कई कमजोरियां हैं, जिन्हें सरकार स्वीकार करने से इनकार करती है या शायद समझ भी नहीं पाती। द हिंदू ने अपने संपादकीय में लिखा: ‘अमेरिका की ओर से लगाया गया पचास फीसद शुल्क अभी भी लागू है, निजी निवेश सुस्त बना हुआ है, विदेशी पूंजी देश से बाहर जा रही है, कमजोर रुपया आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए आयात को और महंगा बना रहा है, वास्तविक वेतन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही है और उपभोक्ता मांग सुस्त बनी हुई है।’ ऐसे में सुनहरे अवसर का दावा खोखला साबित हो रहा है।

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कभी आम बोलचाल में इस्तेमाल होने वाला शब्द धर्मनिरपेक्ष अब लगभग गायब हो चुका है। यह इस साल का सबसे कम इस्तेमाल होने वाला शब्द बन गया है। बहुत कम लोग खुद को गर्व से धर्मनिरपेक्ष बताते हैं। संपादकीय लेखक इस शब्द से परहेज करते हैं। मूल रूप से धर्मनिरपेक्ष का अर्थ राज्य और धर्म का पृथक्करण था, लेकिन बाद में इसका अर्थ यह हो गया कि एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के मूल्य तर्क और मानवतावाद पर आधारित होते हैं, न कि धार्मिक सिद्धांतों पर।

शर्मनाक ‘विजेता’

धर्मनिरपेक्षता के पतन ने नफरत को जन्म दिया है, एक ऐसा शब्द जिसकी हर धर्म निंदा करता है। दुख की बात है कि नफरती भाषण और लेखन के अधिकांश उदाहरण धर्म पर आधारित हैं। नफरत के अन्य कारण नस्ल, भाषा और जाति हैं। सबसे स्पष्ट नफरत मुसलमानों, उनके पहनावे और खान-पान की प्रथाओं तथा मुसलमानों के धार्मिक स्थलों के खिलाफ दिखाई देती है। मुसलिमों की इबादत में बाधा डाली जाती है या उन पर प्रतिबंध लगाया जाता है। खोखला तर्क दिया जाता है कि मुसलमानों ने भारत पर आक्रमण किया और यहां के कई हिस्सों पर छह शताब्दियों तक शासन किया, और अब हिंदुओं के लिए मुसलमानों को उनकी जगह दिखाने का समय आ गया है।

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नफरत का दूसरा निशाना ईसाई समुदाय है। गिरजाघरों में तोड़फोड़ की जाती है, ईसाई पादरियों और प्रचारकों की हत्या की जाती है, और कैरोल गाते ईसाई बच्चों पर हमला किया जाता है। ये सब हिंदू ‘अधिकारों’ को स्थापित करने के नाम पर किया जाता है। भारत के संविधान के लिए हिंदू वर्चस्व का विचार जितना घृणित हो सकता है, उतना और कुछ नहीं।

भारत का विचार नागरिकता की नींव पर बना है, न कि धर्म, नस्ल, जाति या भाषा पर। भारत की अधिकांश जनता डॉ. अब्दुल कलाम और मदर टेरेसा का सम्मान करती है, लेकिन एक छोटा सा वर्ग मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ नफरत फैलाता है। सबसे चिंताजनक पहलू इन अवैध कार्यों को साफ-सुथरा दिखाने या सही ठहराने का प्रयास है। इसके मुख्य दोषी राज्य, महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन नेता और राज्य के संरक्षण से सशक्त हुए कुछ संगठन हैं। उनके शब्द, कार्य या मौन नफरत फैलाने वालों को अत्याचार करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह प्रवृत्ति भारत को टुकड़ों में बांट देगी और जो होना तय है, वही होगा: एक ऐसा भारत, जो संकीर्ण घरेलू दीवारों से टुकड़ों में बंटा होगा। इन सभी कारणों से अत्यंत शर्म और खेद के साथ मैं उस शब्द का चयन करता हूं, जिसने 2025 में भारत को परिभाषित किया: नफरत