प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान कई कारणों से महत्त्वपूर्ण है। इसमें उन्होंने देश की बौद्धिकता और शिक्षा व्यवस्था को मैकालेवाद से मुक्ति का संकल्प लिया है। वे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने भारतीय मस्तिष्क के औपनिवेशिक विमुक्तिकरण को नैतिक जिम्मेदारी माना है। मैकालेवाद क्या है और ब्रिटिश राज के अंत के आठ दशकों के बाद भी यह क्यों प्रभावी है? इसका उत्तर ढूंढ़ना महत्त्वपूर्ण हो गया है।
वर्ष 1835 में मैकाले ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को थोपा था। तब उसका उद्देश्य भारतीय मन में पाश्चात्य सोच और संस्कृति के अनुरूप बनने की लालसा और ललक पैदा करना था। तभी महात्मा गांधी ने 1931 में लंदन में एक भाषण में इसे भारत की ज्ञान परंपरा पर हमला बताकर कहा था कि आपने सुंदर वृक्ष को काट दिया। आधुनिकता के नाम पर भारतीयों के मन में अपनी विरासत के महत्त्व को समाप्त करने, अपने ‘स्व’ के प्रति अपराधबोध भरने तथा यूरोपीय चिंतन के सम्मुख समर्पण का भाव विकसित कर दिया गया। मैकालेवाद का प्रभाव ग्रामीण और शहरी भारत में समान रूप से नहीं हुआ।
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ग्रामीण भारत में जहां आध्यात्मिकता, स्थानीयता और सामुदायिकता की जड़ें मजबूत थीं और लोगों की सीमित महत्त्वाकांक्षा थी, वहां मैकाले नहीं पहुंच पाया। पर शहरी भारत में उसका लक्ष्य फलित हुआ। जब लोग यूरोप-अमेरिका का प्रतिबिंब बनने की आकांक्षा पालने लगे, तो इसे कल्पना का औपनिवेशीकरण कहते हैं। तब मौलिकता को हम छोड़ने लगते हैं। वाणभट्ट के ‘कादंबरी’ या कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ की जगह वर्ड्सवर्थ और शेक्सपियर लुभाने लगता है। अंग्रेजी के वर्चस्व ने भारतीय भाषाओं की प्रतिभाओं को कई पीढ़ियों से कुचलने का काम किया है। अंग्रेजी की अहमियत से वैश्विक ज्ञान के क्षितिज पर हमारा कोई उल्लेखनीय योगदान भी नहीं हुआ।
इसीलिए संविधान सभा में आरवी धुलेकर ने 13 सितंबर, 1949 को कहा था कि ‘अंग्रेजी भाषा ने एक भी महान व्यक्ति (भारत में) पैदा नहीं किया है। और प्रतिकूलता में भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में महान लोग उभरते रहे हैं।’ मैकालेवाद का सबसे बड़ा प्रभाव देश के नामकरण में हुआ। 18 सितंबर, 1949 को संविधान सभा की बहस इसे दर्शाती है। संविधान के प्रारूप में ‘इंडिया, जो भारत है’ कहा गया, उसका विरोध हरि विष्णु कामथ, कुल्लर सुब्बाराव, राम सहाय, सेठ गोविंद दास, कमलापति त्रिपाठी आदि ने किया। कामथ ने संशोधन प्रस्ताव रखा था ‘भारत, जो अंग्रेजी भाषा में इंडिया है।’
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सेठ गोविंद दास ने इसका समर्थन किया, तो उन्हें जवाहरलाल नेहरू से यह सुनना पड़ा कि ‘वे पीछे देख रहे हैं, आगे नहीं देख पा रहे हैं।’ तब उन्होंने प्रश्न किया कि ‘देश का नाम भारत मानने से वे ऐसा क्या कर रहे हैं, जो देश को आगे बढ़ने से रोकेगा?’ मोदी का औपनिवेशिक विमुक्तिकरण समकालीन भारत के ऐसे ही अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर की खोज है। कामथ और कुल्लर ने भारत की प्राचीनता का प्रमाण विष्णु पुराण, ब्रह्म पुराण, वायु पुराण, ऋग्वेद आदि से दिया। कमलापति त्रिपाठी ने कहा, ‘जब कोई देश दासता में होता है, तब वह अपनी आत्मा खो देता है। हजार वर्ष की दासता में हमने अपनी संस्कृति को खो दिया। हमने अपने इतिहास को विस्मृत कर दिया। आज देश के अपने नाम (भारत) को फिर प्राप्त कर, हम अपनी अन्त:चेतना को पुन: प्राप्त कर लेंगे।
भारत के उच्चारण मात्र से हजारों साल का सांस्कृतिक परिवेश हमारे सामने आ जाता है।’ इंडिया भारत से पहले क्यों हो, किसी ने कोई तर्क नहीं दिया, न कोई भाषण हुआ। हरगोविंद पंत ने कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ में वर्णित दुष्यंत-शकुंतला और उनके पुत्र ‘भरत’ को उद्धृत कर भारत शब्द की महत्ता को भूगोल इतिहास की सीमाओं से ऊपर स्थापित किया। फिर भी मतदान में कामथ के संशोधन को 38 और उनके विपक्ष को 51 मत मिले। तब संविधान सभा में प्रत्यक्ष रूप से न मैकाले था, न मोदी थे, लेकिन दोनों की विचारधाराएं अवश्य थीं। आज दशकों से हम स्वतंत्र है, लेकिन साहित्य में अंतिम बार नोबेल पुरस्कार 1913 में रवींद्रनाथ ठाकुर को मिला और विज्ञान में अंतिम बार सीवी रमण को 1930 में मिला था। मोदी जिस औपनिवेशिक मानसिकता से लड़ने की बात कर रहे हैं, उसके विरुद्ध तर्क गढ़ा जाता है कि हम उसमें घुलमिल गए हैं।
प्रश्न किया जा रहा है कि क्या घड़ी की सुई को पीछे किया जा सकता है। इसका उत्तर भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक कृष्णचंद्र भट्टाचार्य के बंगाल में 1931 में दिए गए एक व्याख्यान में मिलता है। औपनिवेशिक साहित्य, संस्कृति, भाषा, सोच शासितों के मन में धीरे-धीरे प्रवेश करता है। यह राजनीतिक आधिपत्य से भिन्न होता है। जहां राजनीतिक आधिपत्य दिखाई पड़ता है, वहीं विचारों और संस्कृति का आधिपत्य दिखाई नहीं पड़ता है। यह हमें बौद्धिक कार्य करने में आलसी और नकलची, दोनों बना देता है। औपनिवेशिक विचारों का प्रभाव किसी भी देश की स्वतंत्र चेतना, स्वतंत्र साहित्य और स्वतंत्र सोच के विकास में बाधक बन जाता है। सबसे रोचक बात है कि बाधा का आभास नहीं हो पाता है।
छद्म स्वतंत्रता के भाव से हम जीने लगते हैं। इससे निकलना और मौलिकता को पुन: प्राप्त करना ही औपनिवेशिक विमुक्तिकरण का लक्ष्य है। इसका उद्देश्य यूरोप-अमेरिका के ज्ञान के सामने तुलनात्मक, प्रतिद्वंद्वात्मक और बराबरी के आधार पर खड़ा होना है। पर वह तभी सार्थक होगा, जब हम खिड़कियां खुली रखकर सभी विचारों के साथ संवाद करने में जय-पराजय महसूस नहीं करेंगे। भारत की ज्ञान परंपरा यूरोप के लिए विषय है। हमारे लिए यह विषय नहीं, भविष्य की रचना का मार्ग है। मोदी का संकल्प भारतीय ज्ञान परंपरा के पथिक बनने की पात्रता हासिल करने की चुनौती और अवसर दोनों है।
