बिखराव के साथ जेसुइटों के धर्मांतरण और ईसाई धर्म-प्रचार के विरुद्ध एक बंगाली युवक, राजा राममोहन रॉय, ने जिस बंगाल पुनर्जागरण की नींव रखी, वह 1900 आते-आते आधुनिक भारत का पुनर्जागरण कहलाने लगी। 1911 में जब ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित हुई, तब बंगाली भद्रलोक पर दिल्ली के एलिट वर्ग का वर्चस्व स्थापित हुआ। यह टीस बंगाल से कभी समाप्त नहीं हुई।
पिछले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने इसी दिल्ली बनाम बंगाल की वैमनस्यता को चुनावी हथियार बनाया था और वे सफल भी रहीं। लेकिन बंगाल अस्मिता और भारतीय राष्ट्रवाद का यह टकराव इस बार कितना चलेगा, यह कहना कठिन है।
बिहार विधानसभा चुनाव में जातीय जनगणना के असर के फीके पड़ जाने के बाद यह सवाल उठता है कि क्या दो सौ वर्ष बाद एक बार फिर बंगाल अखिल भारतीय सामूहिक सोच का कोई नया ‘ब्रह्म संदेश’ देगा?
पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले बीजेपी ने बदली रणनीति
वक्फ कानून, एक देश-एक चुनाव का किया विरोध
पिछले वर्षों में केंद्र की दो बड़ी नीतियों- वक्फ संशोधन कानून 2024 और एक देश-एक चुनाव का तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी ने तीखा विरोध किया। तब 12 दिसंबर 2024 को सोशल मीडिया पर ममता बनर्जी ने पोस्ट किया, यह कोई सोच-समझकर किया गया सुधार नहीं है। यह भारत के लोकतंत्र और संघीय ढांचे को कमजोर करने के लिए थोपा गया सत्तावादी कानून है। हमारे सांसद संसद में इसका पुरज़ोर विरोध करेंगे। बंगाल दिल्ली की तानाशाही के आगे कभी नहीं झुकेगा। दूसरा, टीएमसी सरकार ने राज्य में वक्फ संशोधन कानून लागू करने से भी इनकार कर दिया था।
केंद्र के बिल पेश करने के बाद बंगाल में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। 9 अप्रैल 2025 को जैन समुदाय के एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा था कि मैं बंगाल में वक्फ संशोधन कानून लागू नहीं होने दूंगी। मैं उन्हें बांटकर राज नहीं करने दूंगी। हमारे यहां 33 प्रतिशत मुस्लिम रहते हैं, वे सदियों से यहां हैं। उनकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है।
हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद टीएमसी सरकार ने पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन कानून लागू करने का नोटिफिकेशन सभी जिलाधिकारियों को भेज दिया। यही वह टर्निंग प्वाइंट है, जहां से बंगाल के बदलते राजनीतिक मिजाज को समझना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि लगातार पंद्रह वर्ष से सत्ता में रहीं ममता बनर्जी एक सख्त मिजाज नेता मानी जाती हैं, जिनकी नीतियों को बदल पाना आसान नहीं। तो फिर ऐसी कौन-सी एंटी-इनकम्बेंसी है, जो उनके सामने चुनौती बनती दिख रही है?
इसका उत्तर है- एसआईआर, यानी चुनाव आयोग का मतदाता सूची का विशेष गहन परीक्षण। बिहार में यह मुद्दा नहीं बना, लेकिन पश्चिम बंगाल के संदर्भ में इसे बांग्लादेशी घुसपैठियों से जोड़कर बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है। उत्तर 24 परगना के बनगाँव में मतुआ समुदाय के बीच एसआईआर-विरोधी रैली में ममता बनर्जी ने भाजपा की केन्द्र सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा कि चाहे कितनी भी एजेंसियां लगा लो, मेरे साथ खेल नहीं पाओगे। भाजपा मेरे खेल में मुझसे लड़ नहीं सकती। अगर भाजपा ने बंगाल में मुझ पर हमला करने की कोशिश की, तो मैं पूरे भारत में उसकी नींव हिला दूंगी।
लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस का सफाया
अब 2021 के चुनावी नतीजों पर नज़र डालते हैं: टीएमसी ने 294 में से 215 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा 77 सीटें लेकर मुख्य विपक्ष बनकर उभरी। लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस पूरी तरह हाशिये पर चली गईं। 2011 के चुनाव में टीएमसी ने 34 साल से सत्ता पर काबिज लेफ्ट फ्रंट को पराजित कर 184 सीटें जीती थीं। लेफ्ट को 40 और कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं। भाजपा तब मात्र एक सीट पर उपविजेता रही और उसे 4% वोट मिले। उससे पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन में टीएमसी ने 19 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीती थीं। 2014 में टीएमसी ने अकेले 34 सीटें जीतीं।
इन चुनावों के पहले भी स्थितियाँ आज जैसी थीं। जनता लेफ्ट से ऊब चुकी थी और नंदीग्राम व सिंगुर आंदोलनों की बदौलत ममता एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरीं। 1997 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी बनाने के बाद 2001 में उन्होंने कांग्रेस गठबंधन में 60 सीटें जीतीं। 2004 में केंद्र में कांग्रेस सरकार बनने के बाद 2005 में ममता ने बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा ज़ोरदार ढंग से उठाया। इसकी वजह से कांग्रेस ने उनसे दूरी बना ली और 2006 में कांग्रेस सिर्फ 30 सीटें ही जीत सकी।
2004 में भाजपा-टीएमसी गठबंधन को मात्र एक लोकसभा सीट मिली थी, जबकि 2009 में कांग्रेस गठबंधन के साथ टीएमसी को 19 सीटें मिलीं।
‘हम अभी 37 फीसदी हैं, जब तक बाबरी मस्जिद नहीं बनती, हम 40%…’
इस टैक्टिकल शिफ्टिंग से स्पष्ट है कि टीएमसी को कांग्रेस का वोट ट्रांसफर हुआ। लेकिन 2014 से भाजपा ने बंगाल में अपने कोर हिन्दुत्व के एजेंडे के साथ प्रवेश किया और 2016 के विधानसभा चुनाव में 10% वोट के साथ 6 सीटें जीतीं। 2021 में भाजपा 38% वोट के साथ 77 सीटें जीतने में सफल रही।
वोट बैंक कितना और कैसे शिफ्ट हुआ, इस पर विस्तृत विश्लेषण हो सकता है। लेकिन फौरी तौर पर इतना समझना आवश्यक है कि जिस बांग्लादेशी घुसपैठ, नंदीग्राम और सिंगुर जैसे मुद्दों के सहारे ममता ने लेफ्ट फ्रंट का किला ध्वस्त किया था, उसी तर्ज पर भाजपा भी बांग्लादेशी घुसपैठ और संदेशखाली जैसे मुद्दों को लेकर बंगाल के एक बड़े वर्ग के जेहन में प्रवेश कर चुकी है।
2001 से 2011 तक टीएमसी ने जिन ग्रामीण इलाकों में अपना आधार बनाया था उन क्षेत्रों में भाजपा ने 2021 में जीत दर्ज कर ली है। ठीक वैसे ही जैसे लेफ्ट फ्रंट के आखिरी गढ़ शहरों में भी टीएमसी ने 2011 में जीत दर्ज की थी। इस बार बंगाल के शहरी सीटों पर बांग्लादेशी घुसपैठ और संदेशखाली का असर दिख रहा है। ऐसा में यह देखना दिलचस्प होगा कि दो साल बाद बंगाली अस्मिता फिर कोई अखिल भारतीय सोच देगी?
SIR शुरू होने से पहले ही बांग्लादेश से सटे पश्चिम बंगाल के जिलों में अफरा-तफरी क्यों मची हुई है?
