विनम्र सेन सिंह
वैश्विक इतिहास में इकलौता युद्ध महाभारत का हुआ जिसमें किसी भी बड़े योद्धा से अधिक चर्चा एक सारथी की होती है। एक सारथी जिन्होंने युद्ध की दशा-दिशा तय की। एक सारथी जिनके उपासक के रूप में उत्तर प्रदेश के एक बड़े नेता खुद हमेशा प्रस्तुत करते हैं। लेकिन…। यूपी के वो बड़े अपने सारथी की अहमियत नहीं समझते।
वो सारथी भगवान कृष्ण थे और यूपी के वो बड़े नेता हैं अखिलेश यादव। भारतीय राजनीति के फलक पर कुछ कहानियां खून के रिश्तों और वफादारी की स्याही से लिखी जाती हैं, लेकिन उनका अंत अक्सर एक ही मुकाम पर होता—’सिंहासन का उत्तराधिकारी वही होगा जो मुख्य शाखा से आएगा।’ समाजवादी पार्टी के भीतर धर्मेंद्र यादव एक ऐसा ही चरित्र हैं, जो अपनी पूरी काबिलियत, प्रखर वक्ता शैली और जमीनी पकड़ के बावजूद हमेशा एक ‘सक्षम सारथी’ तक ही सीमित रह जाएंगे, कभी ‘महाराज’ नहीं बन पाएंगे।
योग्यता और संघर्ष का पर्याय
धर्मेंद्र यादव, जो मुलायम सिंह यादव के भतीजे और अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं, सपा के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो सड़क से लेकर संसद तक पार्टी का पक्ष पूरी मजबूती से रखते आए हैं। उनकी राजनीतिक यात्रा केवल परिवार के नाम पर नहीं, बल्कि उनके पुरुषार्थ पर टिकी है। बदायूं की धरती से उनका जुड़ाव और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता इस बात का प्रमाण है कि उनमें एक जननेता के सारे गुण मौजूद हैं।
संसद में उनके भाषणों को याद कीजिए। चाहे वह किसानों का मुद्दा हो, पिछड़ों के आरक्षण की बात हो या फिर केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार-धर्मेंद्र यादव का लहजा हमेशा गंभीर और तार्किक रहा है। उनके चर्चित भाषणों में से एक, जहां उन्होंने “जातिगत जनगणना” और “सामाजिक न्याय” के मुद्दे पर सरकार को घेरा था, आज भी सपा के सोशल मीडिया कैडरों के बीच सबसे ज्यादा साझा किया जाता है। वह सदन में एक ऐसे योद्धा की तरह दिखते हैं जो अपनी पूरी ताकत अपने नेतृत्व (अखिलेश यादव) को सुरक्षित रखने में लगा देता है।
भावना और बलिदान की राजनीति
जब 2017 में परिवार के भीतर अंतर्कलह मची थी, तब धर्मेंद्र यादव उन पहले लोगों में थे जिन्होंने अखिलेश यादव के पीछे चट्टान की तरह खड़े होने का फैसला किया। उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों को ताक पर रखा। आजमगढ़ उपचुनाव से लेकर मैनपुरी और बदायूं तक, जहां भी अखिलेश को एक ‘संकटमोचक’ की जरूरत पड़ी, धर्मेंद्र यादव वहां ढाल बनकर खड़े मिले।
उत्तराधिकार की वह अभेद्य दीवार
लेकिन इन सबके बावजूद कड़वा सच यह है कि धर्मेंद्र यादव की पूरी काबिलियत एक ‘ग्लास सीलिंग’से टकराकर रुक जाती है। समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद ‘सुप्रीमो’ का पद सीधे अखिलेश यादव को मिला। अब राजनीति के गलियारों में चर्चा इस बात की नहीं होती कि धर्मेंद्र यादव को उनकी मेहनत का क्या इनाम मिलेगा? बल्कि चर्चा इस पर होती है कि अखिलेश के बाद पार्टी की कमान उनके बेटे (अर्जुन या अन्य) संभालेंगे। करीब 6 महीने पहले भोजपुरी एक्टर और नेता खेसारीलाल यादव अखिलेश से मिले तो अर्जुन को उन्होंने उत्तर प्रदेश का ‘आने वाला कल’ बताया था।
इतिहास खुद को दोहरा रहा है। जैसे मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल यादव की दशकों की मेहनत को दरकिनार कर सत्ता की चाबी अपने पुत्र को सौंपी थी, वही भविष्य धर्मेंद्र यादव के सामने भी खड़ा है। अखिलेश यादव का ‘परिवारवाद’ यहां आकर संकुचित हो जाता है; यहां परिवार का मतलब केवल ‘स्वयं का परिवार’ (पत्नी और बच्चे) रह जाता है, ‘कुनबा’ नहीं।
धर्मेंद्र…एक ‘अधूरे’ नायक?
धर्मेंद्र यादव का व्यक्तित्व आज भी एक ऐसे सेनापति का है जो युद्ध जीतता तो राजा के लिए है, लेकिन इतिहास के पन्नों में उसका नाम हमेशा राजा के पीछे ही रहता है। उनके भाषणों की गूंज बदायूं के गांवों से लेकर दिल्ली की संसद तक सुनाई देती है, लेकिन लखनऊ की सत्ता के शीर्ष पर बैठने का सपना शायद उनके लिए हमेशा एक सपना ही रहेगा।
अखिलेश यादव ने अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि संगठन का हर सिरा उनके इर्द-गिर्द घूमता है। ऐसे में धर्मेंद्र यादव जैसे सक्षम नेता केवल ‘क्राउड पुलर’ और ‘वोट मैनेजर’ बनकर रह जाते हैं। जब भी नेतृत्व की बात आएगी, चेहरा अखिलेश का होगा, और अखिलेश के बाद उनके पुत्र का।
धर्मेंद्र यादव की कहानी उन सभी कार्यकर्ताओं और नेताओं के लिए एक भावनात्मक सबक है जो यह मानते हैं कि राजनीति केवल मेहनत से चलती है। सपा में मेहनत का फल मिल सकता है, पद मिल सकता है, लेकिन ‘ताज’ केवल रक्त संबंध की उस मुख्य धारा को ही मिलता है जिसे मुलायम ने सींचा था। धर्मेंद्र यादव अपनी वफादारी निभाते रहेंगे, प्रखर भाषण देते रहेंगे, लेकिन वे हमेशा ‘सपा सुप्रीमो’ की कुर्सी से उतनी ही दूर रहेंगे, जितनी दूरी एक निष्ठावान सेवक और एक राजकुमार के बीच होती है। इतिहास गवाह है, सारथी कितना भी कुशल क्यों न हो, रथ पर विजय पताका हमेशा राजकुमार के नाम की ही फहराती है।
(लेखक विनम्र सेन सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं)
