समाज आधुनिकता की ओर जितना बढ़ रहा है, उतना ही रिश्तों में संवेदनशीलता कम होती जा रही है। आज के डिजिटल युग में किसी को नीचा दिखाने के लिए सोशल मीडिया पर बस एक टिप्पणी या वीडियो ही काफी हो चला है। पहले जहां लोग सामने बैठकर बात करते थे, अब हर विवाद सोशल मीडिया की दीवार पर चिपका दिया जाता है। खासकर तब, जब बात किसी व्यक्ति की निजी कमियों को उजागर करने की आती है। किसी की गलती या कमजोरी को सार्वजनिक कर देने की यह प्रवृत्ति न केवल समाज की नैतिकता को चोट पहुंचाती है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को भी कमजोर करती है।

किसी व्यक्ति के जीवन में कुछ कमियां या गलतियां होना स्वाभाविक है। कोई भी इंसान पूर्ण नहीं होता। जीवन का सौंदर्य ही इस अपूर्णता में छिपा है, क्योंकि यही अपूर्णता हमें विनम्र बनाती है, हमें सीखने की प्रेरणा देती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति दूसरों की निजी भूलों या कमियों को मंच बनाकर उजागर करता है, तो वह न केवल दूसरों का अपमान करता है, बल्कि अपने ही चरित्र की ऊंचाई भी घटा देता है। ऐसे समय में यह समझना जरूरी है कि दूसरों की कमियां सार्वजनिक करना बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि नैतिक दुर्बलता का परिचायक है।

आज के समय में सोशल मीडिया पर किसी की छोटी-सी चूक भी बड़ी कहानी बन जाती है। कुछ लोग दूसरों की गलतियों को पकड़कर अपने अनुयायियों या दोस्तों के सामने साबित करना चाहते हैं कि वे सच्चाई के सबसे बड़े प्रहरी हैं, लेकिन असल में यह न्याय नहीं, प्रदर्शन है। किसी को नीचा दिखाकर खुद को ऊंचा दिखाने की कोशिश करना इंसानियत का नहीं, अहंकार का संकेत है। महान लोग दूसरों की कमियों पर नहीं, उनके गुणों पर ध्यान देते हैं। वे किसी की गलती को सजा देने नहीं, सुधारने का अवसर समझते हैं।

हम सोच कर देखें कि हमारे अपने जीवन की सभी गलतियां दुनिया के सामने खोल दी जाएं, तो क्या हम सहज रह पाएंगे? हर व्यक्ति के पास एक निजी संसार होता है, जहां उसकी असफलताएं, टूटन और गलती के क्षण समाहित होते हैं। इन्हें उजागर करना किसी को भीतर तक तोड़ देने वाला हो सकता है। सच्चाई बोलने और अपमान करने में हमेशा एक महीन सीमा होती है, जो समझदारी और संवेदनशीलता से ही पहचानी जा सकती है।

कई बार समूहों में, कार्यस्थलों पर या मित्र मंडली में भी यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि किसी व्यक्ति की निजी कमी को सबके सामने लाकर हंसी का विषय बना दिया जाता है। जैसे किसी की आर्थिक स्थिति, शैक्षणिक कमजोरी, शारीरिक बनावट या पारिवारिक समस्या को मज़ाक या ताने के रूप में उछाल दिया जाता है। उस क्षण व्यक्ति खुद को विजेता समझता है, जबकि वास्तव में वह अपनी मानवीय परिपक्वता खो देता है। किसी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने वाला व्यक्ति कभी लंबे समय तक सम्मानित नहीं रह पाता, क्योंकि लोग उसके भीतर का झूठा आत्मगौरव पहचान लेते हैं।

कई मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि जो लोग दूसरों की कमियों को उजागर करने में आनंद महसूस करते हैं, वे अक्सर अंदर से खुद असुरक्षित या अपूर्ण महसूस करते हैं। वे अपने जीवन की कमियों को छिपाने के लिए दूसरों की कमियों को ढाल बना लेते हैं। यह व्यवहार स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की कृत्रिम चाह से उपजता है, लेकिन याद रखना चाहिए कि असली श्रेष्ठता दूसरों को नीचा दिखाने से नहीं, बल्कि उन्हें ऊपर उठाने से मिलती है।

युवा पीढ़ी के लिए यह बात और भी महत्त्वपूर्ण है। आज के युवाओं के पास अभिव्यक्ति के सोशल मीडिया के मंचों के रूप में असंख्य माध्यम हैं। मगर इन मंचों का उपयोग करते समय थोड़ी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी जरूरी है। किसी की निजी बात को बेलगाम तरीके से फैलाने से पहले एक बार सोचना चाहिए कि क्या यह कदम हमें एक बेहतर इंसान बना रहा है या सिर्फ किसी को शर्मिंदा करने का माध्यम है?

समाज तभी सुंदर बनता है जब लोग दूसरों की इज्जत को अपनी जिम्मेदारी समझें। किसी भी समूह या संगठन में सबसे बड़ी ताकत परस्पर सम्मान होती है। जब यह सम्मान टूटता है, तो संबंध कमजोर पड़ जाते हैं। किसी व्यक्ति को गलत साबित करने या आलोचना के लिए भी मर्यादा रखना जरूरी है। अगर किसी की गलती को ठीक करना है, तो निजी संवाद ही रास्ता है।

जीवन अवसर देता है कि हम दूसरों की कमजोरी देखकर हंसें या फिर उनकी मदद करके खुद के चरित्र को ऊंचा करें। कौन-सा रास्ता चुनना है, यह हमारे संस्कारों पर निर्भर करता है। इतिहास बताता है कि जिन्हें लोगों ने सबसे अधिक सम्मान दिया, वे वैसे लोग नहीं थे जिन्होंने दूसरों पर ताने कसे, बल्कि वे थे जिन्होंने दूसरों की गलतियों को क्षमा किया और उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया। ऐसे लोग समाज के प्रकाशस्तंभ बनते हैं।

किसी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने से क्षणिक संतुष्टि भले मिल जाए, लेकिन इसका असर दीर्घकालिक रूप से दोनों पक्षों पर पड़ता है। जिस व्यक्ति को अपमानित किया गया, वह भीतर से टूट जाता है, और जिसने अपमान किया, वह दूसरों की दृष्टि में धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खो देता है। समय के साथ लोग पहचान जाते हैं कि कौन ईमानदारी से बोलता है और कौन दूसरों के दर्द को हथियार बनाता है।

युवा मन में प्रतिस्पर्धा, तर्क और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता स्वाभाविक है, लेकिन इन सबके बीच करुणा और विवेक का साथ जरूरी है। जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि किसी की कमजोरी हमारे मनोरंजन का विषय नहीं, बल्कि उसकी सहायता का अवसर है, उस दिन समाज अधिक सुंदर हो जाएगा।