कुछ समय पहले सोशल मीडिया वेबसाइट देखते हुए नफरत से भरे संदेशों को देखकर किसी का भी मन परेशान हो सकता है। ऐसे संदेश के भीतर का मनोविज्ञान समझने पर ऐसा लगता है कि आज के दौर में मनुष्य के मन में घृणा और कट्टरता हावी हो चली है। क्या इतनी घृणा या असहिष्णुता चिंता की बात नहीं? किसी व्यक्ति, समाज या समुदाय के प्रति इस स्तर की कट्टरता या द्वेष रखने पर क्या व्यक्ति मनुष्य कहलाने का अधिकारी रह जाता है? सर्वोच्च शिक्षित व्यक्ति के मन में भी अगर इतनी नफरत है, तो समझा जा सकता है कि अल्पशिक्षित व्यक्ति किस स्तर की कट्टरता और घृणा अपने मन में लेकर बैठा हो सकता है? हालांकि कई बार अनपढ़ माने जाने वाले लोग ही मानवता और संवेदना बचाते देखे गए हैं। ऐसा लगता है कि शैक्षणिक स्तर तो बढ़ रहा है, लेकिन मनुष्यता का स्तर गिरता प्रतीत होता है। ये कैसी शिक्षा है जो व्यक्ति को व्यवहारिकता के निम्नतम स्तर की तरफ लेकर जा रही है?
सोशल मीडिया, इंटरनेट, अनेक नेटवर्किंग वेबसाइट का उद्देश्य लोगों को जोड़ना, उनमें स्नेह का भाव बढ़ाना, अप्रत्यक्ष रूप से उनके बीच स्नेहमयी व्यवहार में वृद्धि करना होना चाहिए था, लेकिन आज के दौर में इसके उलट हो रहा है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालना तो युद्ध जैसा हो गया है। व्यक्ति दूसरे को नीचा दिखाने के उद्देश्य से मानो यह कहने को तत्पर है कि वह दूसरों से श्रेष्ठ, धनवान और कहीं अधिक सामर्थ्यवान है। यह मनोविकृति का द्योतक है, जिसमें व्यक्ति को दूसरों को नीचा या कमतर दिखाकर खुशी मिल रही है। ऐसा लगने लगा है कि मनुष्य शब्दों और चित्रों का उपयोग सिर्फ शाब्दिक या दृश्य हिंसा करने के लिए करने लगा है। यह स्थिति विस्फोटक है।
“हम समझते हैं” कह देना आसान है, लेकिन क्या कोई सच में किसी का दुख समझ पाता है?
अगर व्यक्ति अपने अहंकार या सोशल मीडिया पर जहर बुझे शब्दों के चलते सभी से रिश्ते तोड़ता चला जाएगा तो फिर जुड़ा किससे रह सकेगा? कहीं यह आने वाले समय में एकाकी समाज की दस्तक तो नहीं, जिसमें व्यक्ति अपने आप में एकदम तन्हा और अकेला रह जाए?
अगर मन में घृणा या असहिष्णुता आ भी जाए, तो व्यक्ति को क्षमा करने का भाव विकसित करना चाहिए। उसे असहिष्णु नहीं बनना चाहिए। असहिष्णु या घृणा भाव से भरा व्यक्ति अक्सर यह मानता है कि अगर वह किसी को माफ नहीं करेगा, तो सामने वाले को कष्ट होगा। सच इसके उलट है। जब व्यक्ति द्वेष और घृणा के कारण किसी को क्षमा नहीं करता और शाब्दिक विष वमन करता रहता है, तो असली कष्ट उसी को होता है। किसी को क्षमा न करके या दुर्वचन से व्यक्ति उस घटना के दुख या नकारात्मकता को अपने अंदर भर लेता है। ऐसा करना व्यक्ति को कमजोर और निराश बनाता है।
इसलिए क्षमा करना और बात को भुलाना सीखना उचित है। किसी को क्षमा करने का यह अर्थ नहीं कि व्यक्ति सामने वाले पर कृपा या दया कर रहा है। वास्तविक बात यह है कि किसी को क्षमा करके व्यक्ति खुद नकारात्मकता और पीड़ा के भार से मुक्त होता है। क्षमा खुद के भले के लिए की जाती है, न कि सामने वाले के भले के लिए। इसलिए भूलना सीखना चाहिए।
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अगर घृणा मिट नहीं रही हो, तो पत्र लेखन करना चाहिए। पत्र में बताना चाहिए कि मूल कष्ट क्या है। वह कष्ट क्यों हुआ और सोशल मीडिया पर शाब्दिक हिंसा का क्या कारण था। यह लिखकर सामने वाले को क्षमा कर देना उचित है। पत्र सामने वाले पक्ष को दिया जाना या नष्ट करना व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में है, लेकिन इसका लेखन मन के गुबार और द्वेष को निकाल देता है। मन का गुबार निकलने पर क्षमा करना आसान हो जाता है।
क्षमा करने का भाव विकसित करने के लिए व्यक्ति को उन लोगों की सूची बनानी चाहिए, जिनसे शिकायत है। यह लिखना चाहिए कि किस आदत के चलते क्षमा करना मुश्किल हो रहा है। अधिकांश मामलों में शिकायत से बड़ा होता है व्यक्ति का अहंकार और सूची देखते ही व्यक्ति समझ जाता है कि उसने अपने अहं के चलते अधिकतर बंधुओं से संबंध बिगाड़ लिए हैं। इसके बाद रिश्तों के निर्माण के लिए व्यक्ति फिर विचार करने लगता है।
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ईर्ष्यालु व्यक्ति को दूसरों की खुशी, श्राप या खुले घाव की तरह पीड़ादायक लगती है। उसे सहन ही नहीं होता कि कोई उससे आगे बढ़े। जब कोई आगे बढ़ता है तो ईर्ष्यालु व्यक्ति के मस्तिष्क का जहर गर्म हो जाता है और उसे षड्यंत्र सूझने लगते हैं। ऐसे में इनसे बचाव का एक ही तरीका है कि ईर्ष्या पैदा ही न होने दी जाए।
घृणा होने पर समझाया जाए कि जीवन बहुत छोटा और पानी का बुलबुला मात्र है। मनुष्य इस छोटी-सी बात को नहीं समझ पा रहा कि सहयोग, सत्कार, प्रेम और आपस में समन्वय स्थापित करने में ही जीवन का आनंद छिपा है। छोटे से इस जीवन की अवधि का अधिकांश हिस्सा अगर परस्पर घृणा करने, लड़ाई लड़ने, हानि पहुंचाने, दूसरों को परेशान करके खुद भी परेशान होने में बिता दिया तो फिर जीवन कब जी पाएंगे?
समस्या ये है कि व्यक्ति समाज से, प्रकृति से, साहित्य से कट-सा गया है और मोबाइल की आभासी दुनिया में बेवजह व्यस्त है। इस कारण व्यक्ति मानो अंदर से सूख गया है और यही घृणा और द्वेष का कारण है। क्षमादान से, उत्तम स्वाध्याय से तथा छोटी बातों पर अधिक ध्यान न देकर मन के जहर को निकाला जा सकता है। यही जीने का सलीका है।
