हंसते और मुस्कुराते हुए लोगों को गौर से देखिए, तो दिल में उनकी तरह ही भावना उमड़ने लगती है। ऐसे लोगों के पास कुछ पल ठहर कर वहां से जब भी लौटिए, तो उदास जिंदगी भी आनंदित लगने लगती है। दार्शनिक शेख सादी ने भी ‘खुशदिल’ शब्द को गढ़ते हुए इसका ध्यान रखा था कि इसे सही समझा जाए। अल्बर्ट आइंस्टाइन को खुश और मदमस्त देख कर लोग हैरत में पड़ जाते थे। सच ही है, एक बार तो यह सवाल जेहन में पैदा होता ही है कि जो लोग ऐसे अंदाज में रहते हैं, वे अपने विचार कैसे संतुलित कर पाते होंगे।
सही कहा जाए, तो यह जीवन सुख और दुख का मिश्रण है। इस मिश्रण में अपने आसपास हंसी और खुशी के पल निर्मित करने वाले लोग ही सही मायने में सच्चे और अच्छे होते हैं। यही लोग बगैर किसी आडंबर या दिखावे के किसी का भी दिल जीत लेते हैं। खुश रहने वाले कई कारणों से चर्चा में भी रहते हैं। ये लोग जरा-सी बात पर कष्ट तकलीफ और तनाव का रोना लेकर नहीं बैठे रहते। मगर इनकी बातों में छोटी-छोटी खुशियों का जिक्र जरूर होता है।
ये लोग मौसम सुहावना होने पर, किसी मित्र का बहुत दिनों बाद फोन आने पर या गमले में उगे पौधे पर फूल खिल जाए, तो भी झूम-झूम कर नाचने लगते हैं। मानो कोई लाटरी लग गई हो। इनके दिल में सकारात्मकता का ऐसा साम्राज्य रहता है कि खुशी और हंसी खुद आकर इनको गले से लगा लेती है।
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इसीलिए खुशदिल और हंसते हुए लोग अपने समाज की जान बन जाते हैं। लोग भले ही किसी शानदार दावत में जाने से मना कर देंगे। मगर इन भले लोगों के साथ बैठने के लिए दस बहाने खोजते हैं। इनके पास से उठ कर जाना नहीं चाहते। क्योंकि इनको तो शब्द भी नहीं चाहिए। ये तो आंखों से बोलते हैं, और जब मौखिक रूप से बोलते हैं, तो ऐसा बोलते हैं कि समां बंध जाता है। ये लोग अच्छाई के ही पक्ष में रहते है। किस माटी के बने होते होंगे ये संतोषी और खुश लोग? मन पूछता तो है।
कौरवों से जुएं में अपना सब कुछ हार कर पांडव दर-दर की ठोकरें खा रहे थे। ऐसे में भी पांडव अपना धर्म-कर्म नहीं भूलते थे। एक दिन, जब युधिष्ठिर पूजा करके उठे, तो द्रौपदी उनके पास आईं और कहने लगीं- ‘महाराज, आप इतना भजन-पूजन करते हैं। भगवान के निकट समझे जाते हैं। आप उनसे यह क्यों नहीं कहते कि वे हमारे संकट दूर कर दें?’
युधिष्ठिर सहजता से बोले- ‘सुनो द्रौपदी, मैं परमात्मा का भजन किसी सौदे के लिए नहीं करता, बल्कि यह भजन-पूजन तो मैं मन की खुशी, सुकून और आत्मिक आनंद के लिए करता हूं। प्रकृति ने ये पर्वत और नदियां बनाई हैं। हम इन्हें देख कर आनंदित होते हैं। ये जो कुछ भी देती हैं, वे स्वयं प्रदान करती हैं। इसी प्रकार, भगवान के भजन कर मैं स्वयं आनंदित होता हूं और उस समय उत्पन्न हुई प्रसन्नता ही मुझे परिस्थितियों से निपटने की क्षमता प्रदान करती है। यदि मैं अपने पूजा-पाठ के बदले भगवान से कुछ मांगूंगा, तो यह मेरी श्रद्धा नहीं, बल्कि भगवान से सौदेबाजी होगी।’
इस प्रसंग में गहरी बात है। संदेश है। दरअसल, यह प्रसंग नहीं, जीवन को हल्का-फुल्का बनाए रखने का मूलमंत्र है। महान दार्शनिक प्लूटो कहते हैं कि हमारा यह जीवन हमारे विचारों की ही अभिव्यक्ति है। यानी विचार खुशदिल, तो जीवन भी खुशी से भरा हुआ। एक बार रवींद्रनाथ टैगोर के पैर में फोड़ा हो गया। शिष्य उनके पास आकर संवेदना जताने लगे। गुरुदेव गीत गा रहे थे। सभी को अचरज हुआ।
गुरुदेव बोले कि मुझे फोड़ा नही हुआ। मेरे पैर को हुआ। मैं तो आनंद में हूं। तुम मेरी फिक्र मत करो। दस दिन बाद संगीत उत्सव है। उसकी तैयारी पर ध्यान दो। छात्र उनकी बात सुन कर गदगद हो गए। कितनी प्यारी बात है कि ऐसे लोगों के भीतर दर्द में भी आह नहीं, बल्कि जीने की चाह है।
फ्रांस में नोके नामक संत थे। वहां के राजा चार्ल्स उनकी विद्वता के बहुत कायल थे और उन्हें सम्मानित कर अपने दरबार में लाना चाहते थे, लेकिन जब नोके इसके लिए तैयार नहीं हुए, तो राजा स्वयं उनके मठ में पहुंच गए। वहां धर्म के साथ-साथ कई अन्य विषयों पर वार्तालाप हुई। राजा ने उनसे कुछ राजनीतिक विषयों पर भी सलाह ली।
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दरबारियों को यह सब अच्छा नहीं लगा। मुख्य सलाहकार तो नोके का अपमान करने को तैयार हो गया। अगले दिन, जब नोके राजा और अन्य संभ्रांत नागरिकों के साथ गिरजाघर में प्रार्थना कर रहे थे, तो वह सलाहकार क्रोधित होकर आया और नोके को अपशब्द कहे, ‘तुम बड़े विद्वान और ईश्वर के निकट माने जाते हो। क्या तुम मुझे बता सकते हो कि ईश्वर इस समय क्या कर रहे हैं?’
संत ने तुरंत मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘पुत्र, इस समय पृथ्वी पर जो लोग हंस कर जी रहे हैं, वह उन्हें उन्नत कर रहे हैं और जो शिकायती तथा कलेशी हैं, उन्हें वह तुरंत ही नीच बना रहे हैं।’ संत की मधुर वाणी में संयमित जवाब सुन कर उस अहंकारी सलाहकार का सारा घमंड चूर-चूर हो गया। इसीलिए हंस कर जीने का अपना एक अलग ही दर्शन होता है। यह सेहतमंद मन की निशानी है। इसलिए तो खुशदिल मरीज से चिकित्सक भी कहते है कि चिंता की बात नहीं है आप जल्द स्वस्थ हो जाएंगे। इसलिए खुशदिल होने का अपना एक अलग ही आनंद है।
जिंदगी का आईना हंस कर देखने में साफ नजर आता है। सतरंगी दुनिया के हर रंग उदासी में बदरंग नजर आते हैं। सौभाग्य आंखें चुराने लगता है। जरा ठीक से देखो, तो यह जीवन इतना भी जटिल नहीं है। बस उदास मन से की गई यात्राएं जरूर कठिन होती हैं। जरूरत है मन के ठहराव की। अगर एक बार हम ठहर गए, तो भटकाव का प्रश्न नहीं उभरेगा। फिर हंसते हुए जीवन यात्रा मंजिल तक पहुंचेगी और यही जीवन की सच्ची यात्रा भी होगी।
