अपना लहू यतीम था कोई रंग न ला सका
मुंसिफ सभी खामोश थे उज्र-ए-जफा के सामने
–खलीफ तनवीर
नफासत भरी उर्दू के साथ शुरुआत के बाद याद आ रहा ट्रकों के पीछे लिखा गया वाक्य-जलो, नहीं रीस करो। हरियाणवी या राजस्थानी में रीस करो का अर्थ होता है, गुस्से या जोश के साथ प्रतिस्पर्धा करो। इन दिनों विपक्षी दलों के नेताओं में प्रतिस्पर्धा लगी है संघ के सांगठनिक ढांचे की तारीफ करने की। इसके बाद उन नेताओं को दक्षिणपंथी मानसिकता का करार देकर इसे पार्टी की सफाई का अवसर बता दिया जाता है। नए साल की राजनीतिक लड़ाई में विपक्ष के लिए हम सड़क का ही शब्द ‘रीस’ दे रहे हैं। सत्ता को शक्तिशाली होते देख जलने से अच्छा है, जोश में मुकाबला करना। मुकाबला आप अपनी राजनीतिक विचारधारा के तहत ही करें। मुकाबले के बिना आप सियासी यतीम हो जाएंगे। नए साल में विपक्ष की चुनौतियों पर चर्चा करता बेबाक बोल।
वर्ष 2025 दो विपरीत राजनीतिक विचारधाराओं के सांस्थानिक जन्म का शताब्दी वर्ष था। पहली संस्था है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरी संस्था है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी। जब संघ अपनी स्थापना के सौ साल मना रहा है, तब भारतीय जनता पार्टी 2014 के बाद से लगातार सत्ता में है। सत्ता, यानी शक्ति। इस ब्रह्मांड में सबसे ज्यादा आकर्षण शक्ति के प्रति होता है। मौजूदा शक्तिशाली से कोई कितनी भी नफरत कर ले, लेकिन उसका अंतिम उद्देश्य शक्तिशाली बनना ही होता है। मानव अस्तित्व का संघर्ष ही अशक्त से सशक्त बनने का रहा है।
एक ही समय में दो विचारधाराओं का शताब्दी वर्ष, लेकिन पूरी सियासी जमात का आकर्षण सिर्फ उस संस्था की तरफ हो रहा है, जिसे मौजूदा सत्ता की पितृ-संस्था कहा जाता है। उसकी चमक और धमक के आगे अन्य राजनीतिक शक्तियां धूमिल सी हो गई हैं। दक्षिण और वाम, इन दो विचारधाराओं के मध्य में तीसरी विचारधारा भी है, जो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। 2014 के बाद से ही कांग्रेस अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। राजनीति के मैदान में एक बार शक्तिहीन होने के बाद आपका आकर्षण खत्म हो जाता है। आकर्षण सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हुआ, क्योंकि आप सत्ता पक्ष में नहीं हैं। आकर्षण इसलिए भी खत्म हो रहा है कि विपक्ष के रूप में आपकी मौजूदगी शक्तिशाली नहीं है। यह सत्ता पक्ष की रणनीति रही कि वह विपक्ष के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़े। कांग्रेस ने इस स्थिति को झुक कर कबूल, कबूल, कबूल कर भी लिया कि उसे नकारात्मकता का प्रतीक बना दिया गया है।
‘कांग्रेस से बेहतर है RSS और BJP का संगठन’, दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी के लिए क्या-क्या कहा?
लोकतंत्र की अवधारणा जितनी भी सहिष्णु हो, व्यावहारिक राजनीति में विचारधारा का अस्तित्व असहिष्णु प्रवृत्ति की ही मांग करता है। एक समय था, जब भाजपा के दो नेता और दो सांसद पूरे देश में हम दो और हमारे दो का ताना सुनते थे। कांग्रेस, संघ और भाजपा के प्रति सहिष्णु होती गई और विचारधारा का मैदान खाली कर घोषणा भी कर बैठी कि ‘हम दो और हमारे दो’ वाले रिक्त स्थान की पूर्ति करें। भाजपा व संघ ने न सिर्फ रिक्त स्थान की पूर्ति की, बल्कि आगे भी विस्तार करना शुरू कर दिया। दो से आगे इतना बड़ा संयुक्त परिवार हो गया कि कांग्रेस से लेकर विपक्ष के कई दलों के नेता उसकी तरफ आकर्षित होने लगे। विपक्षी दलों के नेता अपने एकल होते परिवार से डर रहे हैं।
गिलास आधा भरा है, या आधा खाली है वाले जुमले ने बीसवीं सदी में प्रेरणा देने का जो भार उठाया था, अब उसकी मियाद भी खत्म हो चुकी है। आज जिस तरह से राजनीतिक शक्ति का हस्तांतरण एकपक्षीय हो चुका है, वैसे में कांग्रेस के लिए जुमला भी नया गढ़ना होगा। पिछले दिनों मुंबई से लेकर कर्नाटक तक के निकाय चुनावों के परिणाम देख लीजिए। कांग्रेस निकाय स्तर पर भी लोगों का भरोसा नहीं जुटा पा रही है।
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आज के दौर में कांग्रेस की राजनीतिक शक्ति का गिलास खाली है। गुरुत्वाकर्षण के वैज्ञानिक नियम के तहत उसे गिलास नीचे से ही भरना शुरू करना होगा। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस ने राजनीतिक शक्ति वापस पाने की कोशिश ही नहीं की है। अगर राजनीति को विज्ञान माना जाए तो कांग्रेस बिल्कुल अवैज्ञानिक तरीके से गिलास को भरने की कोशिश कर रही है, यानी ऊपर से। अभी तक कांग्रेस का सारा राजनीतिक श्रम ऊपर के शीर्ष नेतृत्व को निखारने में जुटा रहा। इसमें वह कामयाब भी हुई। राजनीति के मैदान में राहुल गांधी बहुत हद तक अपनी पहचान बना चुके हैं। लेकिन यह प्रक्रिया ही अवैज्ञानिक है तो राहुल गांधी को उसका नतीजा चुनावी जीत के रूप में नहीं मिल रहा है।
दिग्विजय सिंह को मिला शशि थरूर का साथ, कांग्रेस संगठन और अनुशासन के मुद्दों पर कह दी बड़ी बात
आज के दौर में कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है देश के बड़े तबके से लेकर खुद कांग्रेसियों का संघ की तरफ आकर्षण। संघ के प्रति हर आकर्षित कांग्रेसी के सामने आने के बाद कांग्रेस इसे पार्टी की सफाई मानती है। संघ की तरफ यह आकर्षण इसलिए नहीं है, क्योंकि वह फलां समय में स्थापित फलां विचारधारा की संस्था है। संघ की तरफ आकर्षण की एकमात्र वजह है उसका राजनीतिक शक्ति में तब्दील हो जाना। जो शक्ति आपके अस्तित्व पर सबसे बड़ा संकट है, उसका जिक्र आपकी महफिल में होना ही है। अभी कुछ दिनों पहले डीके शिवकुमार ने कर्नाटक विधानसभा में संघ की प्रार्थना गाई, और हंगामा बरपा। शशि थरूर मौजूदा सत्ता के प्रति अपने आकर्षण को कई बार जाहिर कर चुके हैं।
ताजा मामला है कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का, जो संघ की सांगठनिक क्षमता की तारीफ करने वालों की कतार में शामिल हुए। अब दिग्विजय सिंह को भी कांग्रेस के अंदर दक्षिणपंथी विचारधारा का व्यक्ति करार दिया जा रहा है। यही वक्त है, जब कांग्रेस नेतृत्व को समझ लेना चाहिए कि असली राजनीतिक लड़ाई संगठन बनाम संगठन की ही होती है, यानी गिलास में नीचे भरे पानी की। कांग्रेस नेतृत्व को इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाना चाहिए कि जब भी बाएं से उसकी कमियों के बारे में बात की जाएगी, तभी दाएं से संघ की तारीफ नमूदार हो जाएगी।
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किसी भी पार्टी के लिए संगठन उसके अभिभावक की तरह होता है। बिना संगठन के राजनीतिक दल सियासी यतीम की तरह होते हैं। जनता को राजनीतिक दल की विचारधारा से संगठन ही जोड़ते हैं। चुनिंदा लोकप्रिय चेहरों के भरोसे राजनीतिक शक्ति नहीं हासिल की जा सकती है। जिन वामपंथी दलों की पहचान ही संगठन होते थे, आज वे सबसे बड़े सियासी यतीम हैं। एक वह भी दौर था, जब आजादी के बाद हुए आम चुनाव में वामदल विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा था। आज वह दौर है कि केरल के अगले विधानसभा चुनाव में एलडीएफ हारा तो पूरे देश में कहीं भी वामपंथ का शासन नहीं रहेगा। एक समय पश्चिम बंगाल में लाल किले की पहचान रखने वाली माकपा को ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल कांग्रेस ने क्या हराया, पार्टी अभी तक वहां हार माने बैठी है।
पिछले वर्षों में एक प्रवृत्ति यह भी देखी गई है कि एक बार सत्ता की शक्ति खोने के बाद राजनीतिक दल संघर्ष की राह पर लौटना ही नहीं चाहते। चाहे कांग्रेस हो या वाम दल, सभी व्यवस्था विरोधी माहौल के आने और उससे किसी चमत्कार हो जाने की उम्मीद में रहते हैं। इसलिए उनकी राजनीतिक शैली में दिखता भी सिर्फ व्यवस्था का विरोध है। जनता उन्हें सत्ता वाली व्यवस्था के विरोध में तो पाती है, लेकिन अपने साथ महसूस नहीं कर पाती है। किसी भी राजनीतिक दल की विचारधारा तक जनता खुद नहीं पहुंचती है। जनता तक पहुंचते हैं, राजनीतिक दलों के संगठन। जो विचारधारा जनता तक पहुंची, जनता उसी की हो जाती है। राजनीति-विज्ञान के रसायन की बात करें तो संगठन ही शक्ति है।
राजनीति में शक्ति को ही शुभ मानने की परंपरा है। वामपंथ भी सर्वहारा की शक्ति और सत्ता की ही बात करता है जो जनसंगठनों से ही संभव है। आज इंटरनेट के जमाने में उत्पादन के साधनों के साथ श्रमिकों का संबंध भी बदल गया है। नई समस्याओं से घिरी जनता की लड़ाई पुराने राजनीतिक औजारों से नहीं की जा सकती है। मौजूदा सत्ता ने अपनी शक्ति का चौतरफा विकास कर लिया है। आज केंद्रीय सत्ता के पास देश के अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने की शक्ति है। दोहरे इंजन के दौर में विपक्ष के लिए विकल्प कम हो रहे हैं।
जनता जिस मुद्दे पर शक्तिहीन है, उस संघर्ष के क्षेत्र में उतरने के लिए शक्ति जुटाए बिना कांग्रेस हो या वाम, उनका बचा-खुचा आधार भी खत्म हो जाएगा। मौजूदा एक वर्ष में इस तरफ ईमानदारी से सक्रिय नहीं हुए तो 2027 की राजनीतिक तस्वीर आपको पूरी तरह सियासी यतीम के रूप में ही दिखाएगी। शक्ति खोना जितना मुश्किल है, उसे पाना उतना ही मुश्किल। कैलेंडर बदलते वक्त नहीं लगता। जुट जाइए बाधाओं से भरे संघर्ष के मैदान में।
