बिहार की राजनीति में जनता सत्ता की कमान तो अलग-अलग हाथों में देती रहती है, लेकिन वही जनता सिस्टम को कभी बदल नहीं पाती। यह सिस्टम शायद अब एक आदत का शिकार हो चुका है- मामलों को रफा-दफा करने की, या साफ शब्दों में कहें तो सच दबाने की।

बिहार की राजधानी पटना में शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रहकर NEET की तैयारी कर रही एक छात्रा के साथ रेप होता है। इलाज के दौरान अस्पताल में उसकी मौत हो जाती है। लेकिन पुलिस की शुरुआती जांच परिजनों के आरोप और पोस्टमार्टम रिपोर्ट तीनों मिलकर ऐसी कहानी बयान करते हैं कि मामला सुलझने के बजाय और उलझता चला जाता है।

जो बिहार को जानता है, उसके लिए यह कोई नई बात नहीं है। इसी जमीन पर पहले भी कई ऐसे कांड हो चुके हैं, जो कुछ समय तक अखबारों की फ्रंट पेज हेडलाइन बने, प्राइम टाइम डिबेट में जगह पाई, लेकिन अंत में न्याय वहीं का वहीं रह गया।

सबसे पहले मौजूदा मामले को समझना जरूरी है। 5 जनवरी को पटना के एक गर्ल्स हॉस्टल में NEET की तैयारी कर रही छात्रा को अचेत अवस्था में पाया गया। उसे तत्काल प्रभात मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया। 6 से 8 जनवरी तक इलाज चला। हालत बिगड़ने पर 9 जनवरी को उसे मेदांता शिफ्ट किया गया और 11 जनवरी को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस मामले को सिर्फ एक “सामान्य घटना” की तरह नहीं देखा जा सकता। इसके कई कारण हैं। पहला- पुलिस की थ्योरी बार-बार बदलती रही। दूसरा- हॉस्टल प्रशासन की भूमिका सवालों के घेरे में है, तीसरा- घटना से जुड़े कुछ किरदारों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं। मामला पूरी तरह उलझा हुआ है, और यही उलझन न्याय तक पहुंचने की राह को और कठिन बना रही है।

बिहार पुलिस पर सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि शुरुआती जांच में उसने यौन हिंसा से साफ इनकार कर दिया। उस वक्त भरोसा CCTV फुटेज, हॉस्टल वार्डन और डॉक्टरों के बयानों पर किया गया जबकि तब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई भी नहीं थी।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी गंभीर घटना को पुलिस ने इतनी जल्दबाजी में आत्महत्या या सामान्य मामला कैसे मान लिया? हैरानी की बात यह भी रही कि पुलिस ने बाद में सबूत मिटाने के आरोप में गिरफ्तारियां भी कीं। अगर हॉस्टल में सब कुछ “ठीक” था, तो सबूत मिटाने की जरूरत क्यों पड़ी? पीड़िता के शरीर पर चोट के निशान थे, लेकिन शुरुआती दौर में इन्हें भी “अफवाह” बताया गया। ऐसे में सवाल उठना लाज़िमी है- क्या पुलिस सच छिपाने की कोशिश कर रही थी, या फिर जांच में घोर लापरवाही बरती गई?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुलिस की शुरुआती थ्योरी को लगभग खारिज कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, छात्रा के साथ जबरदस्ती की गई, गर्दन और कंधे के आसपास नाखूनों के गहरे निशान मिले, छाती और कंधे के नीचे खरोंच पाई गई, प्राइवेट पार्ट में ताज़ा चोट दिखी और फोर्सफुल पेनिट्रेशन की पुष्टि हुई।
इससे भी अहम बात यह थी कि पीड़िता बेहोश नहीं थी और उसने खुद को बचाने की कोशिश की थी। इन खुलासों के बाद सवाल और गहरे हो जाते हैं- इतनी जल्दबाजी में पुलिस ने निष्कर्ष कैसे निकाल लिया? क्या इन सवालों के जवाब कभी मिलेंगे, यह कोई नहीं जानता।

इस पूरे मामले ने 1983 के बॉबी कांड की याद ताजा कर दी। 11 मई 1983 को अखबारों की फ्रंट पेज हेडलाइन बनी- बॉबी की मौत। शुरुआती जांच में इसे हार्ट अटैक बताया गया। लेकिन पोस्टमार्टम हुआ तो पेट में ज़हर पाए जाने की बात सामने आई। सवाल उठे- ज़हर किसने दिया, कैसे दिया, और क्यों दिया? बॉबी का असली नाम श्वेता निशा त्रिवेदी था। वह बिहार सचिवालय में काम करती थी। उनके कई नेताओं, अधिकारियों के साथ करीबी रिश्ते बताए गए। उस समय बिहार में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा थे। विपक्ष ने आरोप लगाए कि मामला एक बड़े सेक्स स्कैंडल से जुड़ा है और कई रसूखदार लोग इसके घेरे में हैं।

तत्कालीन पुलिस अधिकारी किशोर कुणाल ने मामले की जांच संभाली और सीएम को साफ कह दिया, यह हत्या का केस है। लेकिन वे इससे पहले कि किसी बड़े नेता या अधिकारी पर एक्शन ले पाते, मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने इस मामले को आत्महत्या बताकर क्लोज कर दिया, लेकिन सवाल आज भी बरकरार है- जहर कहां से आया, जहर क्यों खाया गया?

अब इन सवालों के जवाब मिलते, तब तक 1999 में शिल्पी-गौतम कांड सामने आ गया। 3 जुलाई 1999 को पटना के फ्रेजर रोड इलाके में एक कार के अंदर शिल्पी गौतम और गौतम सिंह के शव मिले। दोनों नग्न अवस्था में थे। जिस क्वार्टर से मामला जुड़ा, वह उस समय RJD नेता साधु यादव से संबंधित बताया गया। साधु यादव, लालू प्रसाद यादव के साले थे।

इस केस में भी पुलिस जांच शुरू से सवालों के घेरे में रही। जिस कार में शव मिले, उसे जब्त करने के बजाय एक पुलिसकर्मी खुद चलाकर थाने ले गया जिससे संभावित फिंगरप्रिंट नष्ट हो गए। इसके ऊपर बिना विसरा रिपोर्ट के ही इस मामले को आत्महत्या करार दे दिया गया। बाद में CBI जांच में शिल्पी के वैजाइनल फ्लूइड की DNA जांच से रेप की पुष्टि हुई। एक एमएलसी को भी सैंपल देने के लिए बुलाया गया, लेकिन सत्ता का रसूक ऐसा कि आने से ही मना कर दिया। बाद में सीबीआी ने इस मामले को भी सुसाइड बता दिया और परिवार न्याय की आस के साथ बैठा रह गया।

यहां बथानी टोला नरसंहार को भी याद किया जाना चाहिए। 11 जुलाई 1996 को भोजपुर जिले के बथानी टोला में रणवीर सेना ने दलित बस्ती पर हमला किया। 21 लोगों की हत्या हुई। पुलिस जांच में गवाहों को सुरक्षा नहीं मिली, सबूत कमजोर रहे और FIR में खामियां रहीं। निचली अदालत ने सजा सुनाई, लेकिन 2012 में पटना हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने कहा- जांच कमजोर थी, गवाह भरोसेमंद नहीं थे और सबूतों में विरोधाभास था। इन तमाम मामलों में एक पैटर्न साफ दिखता है- सत्ता बदलती रही, सरकारें आईं-गईं, लेकिन सच दबाने और जांच को कमजोर करने का सिस्टम जस का तस बरकरार है। अगर NEET छात्रा को भी न्याय नहीं मिल पाता, तो यह कोई हैरानी की बात नहीं होगी। क्योंकि ये बिहार है जहां अपराध और अपराधी से पहले पुलिस की लापरवाही, सरकारों की भागीदारी की वजह से सच की सामूहिक हत्या हो जाती है।