हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से जो खबरें सामने आईं, वे भारत की आर्थिक कहानी के उस पक्ष को उजागर करती हैं जिसे प्राय: विकास दर, निवेश और बड़े आयोजनों की चमक में ढक दिया जाता है। एक ओर नीति-निर्माता भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बताने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर पढ़े-लिखे युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, अस्थिर रोजगार और घटती आय गहरी चिंता पैदा करती हैं।
हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की ओर से जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया कि शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी की दर फिर से बढ़ रही है और युवाओं के लिए स्थिति और भी गंभीर बनी हुई है। यह विरोधाभास केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उस विकास के तरीके पर बुनियादी सवाल है जिसे देश बीते एक दशक से अपनाए हुए हैं।
आधिकारिक अनुमानों के अनुसार देश की लगभग पैंसठ फीसद आबादी पैंतीस वर्ष से कम उम्र की है और हर वर्ष लगभग एक करोड़ से अधिक युवा काम की तलाश में श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। यह तभी सार्थक हो सकता है जब अर्थव्यवस्था पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करे। मगर वास्तविकता यह है कि संगठित क्षेत्र में नई नौकरियों की संख्या सीमित रही है।
संगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की दर दो फीसद से भी कम
श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में संगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की दर दो फीसद से भी कम रही है, जबकि श्रम बल की वृद्धि इससे कहीं अधिक तेज है। नतीजा यह कि बेरोजगारी और अल्प बेरोजगारी दोनों समस्या गहराती जा रही है। शहरी बेरोजगारी दर पर नजर डालें, तो तस्वीर और भी चिंताजनक दिखाई देती है।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 2024 के अंत तक शहरी बेरोजगारी दर लगभग सात फीसद के आसपास पहुंच गई थी, जबकि युवाओं यानी अठारह से उनतीस वर्ष के आयु वर्ग में यह दर बारह फीसद से अधिक दर्ज की गई। उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं में बेरोजगारी दर इससे भी अधिक है। इंजीनियरिंग, प्रबंधन और सामान्य स्रातक डिग्री रखने वाले लाखों युवा या तो काम की तलाश में भटक रहे हैं या अपनी योग्यता से बहुत कम वेतन और अस्थिर शर्तों पर काम करने पर मजबूर हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक असुरक्षा पैदा करती है, बल्कि सामाजिक असंतोष और मानसिक दबाव को भी जन्म देती है।
ग्रामीण भारत में स्थिति इससे अलग नहीं है। कृषि पर निर्भर आबादी का अनुपात अभी भी लगभग पैंतालीस फीसद है, जबकि कृषि का योगदान सकल घरेलू उत्पाद में पंद्रह फीसद से भी कम रह गया है। इसका अर्थ यह है कि बड़ी संख्या में लोग कम उत्पादकता वाले क्षेत्र में फंसे हुए हैं। खेती से आय बढ़ाने के तमाम सरकारी दावों के बावजूद वास्तविक आय वृद्धि सीमित रही है।
औसत किसान परिवार की मासिक आय आज भी इतनी नहीं
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार औसत किसान परिवार की मासिक आय आज भी इतनी नहीं है कि वह सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित कर सके। नतीजतन ग्रामीण युवाओं का शहरों की ओर पलायन जारी है, लेकिन शहरों में भी उन्हें स्थायी और सम्मानजनक रोजगार नहीं मिल पा रहा। पिछले एक दशक में सरकार ने रोजगार संकट से निपटने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं। कौशल विकास मिशन और आत्मनिर्भर भारत जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य नई नौकरियां पैदा करना और उद्यमिता को बढ़ावा देना बताया गया। इन पहलों से कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं।
‘स्टार्टअप इंडिया’ के तहत दो लाख से अधिक नए उद्यम पंजीकृत हुए हैं और इनके माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों रोजगार सृजित हुए हैं। मगर यह भी सच है कि इन रोजगारों का बड़ा हिस्सा अस्थायी, परियोजना आधारित या डिजिटल मंचों से जुड़ा हुआ है, जहां सामाजिक सुरक्षा और दीर्घकालिक स्थिरता का अभाव है। उद्योगों की स्थिति भी रोजगार सृजन के लिहाज से उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई है।
विनिर्माण क्षेत्र को रोजगार वृद्धि का प्रमुख इंजन माना जाता रहा है, लेकिन भारत में इसका योगदान सकल घरेलू उत्पाद में लगभग सोलह से सत्रह फीसद के आसपास अटका हुआ है। चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों की तुलना में भारत विनिर्माण में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने में पिछड़ता दिखता है। श्रम कानूनों की जटिलता, भूमि अधिग्रहण की समस्याएं, बुनियादी ढांचे की कमी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दबाव ने उद्योगों की रोजगार सृजन क्षमता को सीमित कर दिया है।
सेवा क्षेत्र में भी रोजगार का स्वरूप बदल गया
सेवा क्षेत्र ने पिछले कुछ वर्षों में अर्थव्यवस्था को संभाला है, लेकिन यहां भी रोजगार का स्वरूप बदल गया है। सूचना प्रौद्योगिकी और आधुनिक सेवाओं में उच्च कौशल वाले लोगों को अवसर मिल रहे हैं, लेकिन पारंपरिक सेवाओं में रोजगार या तो ठहरा हुआ है या घट रहा है। इसके अलावा एक ऐसी अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है, जहां लोग परिवहन, आपूर्ति और डिजिटल सेवाओं से जुड़े छोटे-छोटे काम करते हैं।
बेरोजगारी का असर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक भी है। बेरोजगार या असुरक्षित रोजगार में फंसे युवा अपने भविष्य को लेकर निराश हो रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में बढ़ती भीड़, बार-बार परीक्षाओं का रद्द होने और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी से इस निराशा को और गहरा करती है। कई राज्यों में बेरोजगारी को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन इस बात का संकेत हैं कि यह समस्या अब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सड़कों पर दिखने लगी है।
शिक्षा व्यवस्था और रोजगार बाजार के बीच बढ़ती खाई भी इस संकट का एक बड़ा कारण है। हर साल लाखों विद्यार्थी महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से डिग्रियां लेकर निकलते हैं। मगर इनमें ज्यादातर विद्यार्थी उद्योग की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित नहीं होते। राष्ट्रीय कौशल विकास निगम की रपटों के अनुसार भारत की बड़ी कार्यशील आबादी औपचारिक कौशल प्रशिक्षण से वंचित है।
नतीजतन, कंपनियां कुशल श्रमिकों की कमी की शिकायत करती हैं और युवा रोजगार न मिलने की। यह विरोधाभास नीति और क्रियान्वयन दोनों स्तरों पर व्यापक सुधार की मांग करता है। महिलाओं की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत में महिला श्रम भागीदारी दर लंबे समय से कम बनी हुई है। हाल के वर्षों में इसमें कुछ सुधार जरूर हुआ है, लेकिन अभी भी यह दर तीस फीसद के आसपास है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है।
शिक्षित महिलाएं अभी भी कार्यबल से बाहर
शिक्षित होने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाएं सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक कारणों से कार्यबल से बाहर रहती हैं। यदि इनकी भागीदारी बढ़े, तो न केवल रोजगार का दायरा विस्तृत होगा, बल्कि आर्थिक वृद्धि भी अधिक समावेशी बन सकेगी। सरकार की नीतियों में रोजगार को प्राथमिकता देने की बात बार-बार कही जाती है, लेकिन बजटीय आबंटन और वास्तविक क्रियान्वयन में यह प्राथमिकता साफ नहीं दिखती। शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास पर सार्वजनिक खर्च अभी भी सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में सीमित है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना करें, तो भारत इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम निवेश करता है। यदि मानव पूंजी में पर्याप्त निवेश नहीं होगा, तो रोजगार सृजन की किसी भी योजना की सफलता संदिग्ध रहेगी। इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत किस तरह के विकास की ओर बढ़ रहा है। यदि विकास का अर्थ केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि और कुछ चुनिंदा क्षेत्रों की प्रगति तक सीमित रहेगा, तो बेरोजगारी और असमानता की समस्या बनी रहेगी।
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