मेगैंबो खुश हुआ। एक दिन ‘मेगैंबो’ ने एक देश के राष्ट्रपति को सरेआम ‘उठा’ लिया…। ‘मेगैंबो’ खुश हुआ। ‘मेगैंबो’ ने फिर अपने ‘चमचे’ को गद्दी पर बिठा दिया…। देशभक्ति के नशे में ‘चमचे’ ने जब ‘मोगांबो’ को आंखें दिखाई, तो मेगैंबो ने उसे भी धमका दिया कि बचुआ! अगर ज्यादा टें-टें की, तो आपका हश्र भी वही होगा, जो उसका हुआ है…और फिर वे चुप हो गए। ‘मेगैंबो’ ने कहा- अब इस देश को हम चलाएंगे…लेकिन सब चुप। कविजन निर्वाक…।
‘हम उसका तेल बेचेंगे… लेकिन सब डरे से, सब मरे से … सब चुप कविजन निर्वाक…। हम उस पर नशे का धंधा करने और अपनी जनता को बर्बाद करने के लिए मुकदमा चलाएंगे… हम ‘इसे’ उठा लेंगे…उस पर ‘सटा’ लेंगे… उसे ‘पटा’ लेंगे। इसे ‘नेस्तनाबूद’ कर देंगे उसे बर्बाद कर देंगे।
उस ‘हरी घास पर क्षण भर’ छाप, मैदान को पार करते ‘मेगैंबो’ ने विजय पताका की तरह फहराया ‘लाल रूमाल’…। ‘मेगैंबो’ खुश हुआ…।
मेगैंबो की ‘धमकी’ को लगभग ‘धमकाते’ हुए एक और राष्ट्राध्यक्ष बोला : हम न रुकेंगे, हम न झुकेंगे…। हिम्मत हो, तो आ जा उठा ले जा…। ‘मेगैंबो’ को उसकी नासमझी पर तरस आया, लेकिन चुप लगा गया।
दुनिया एकदम खेली खाई, चालाक और खुर्राट…। कुछ देश इधर, तो कुछ उधर।
कुछ कहें ‘मेगैंबो शाबास!’ कुछ कहें ‘मेगैंबो’ हो बर्बाद।
‘मेगैंबो’ के देश में ही उसके विरोध में कुछ जगह मोर्चे… प्रदर्शन…पोस्टरबाजी कि ‘मेगैंबो’ पागल…‘मेगैंबो’ ‘साम्राज्यवादी’…। क्या-क्या नहीं कहा गया।
कुछ प्रशंसक कहिन कि ‘मेगैंबो’ जो करता है, खुलेआम करता है और डंके की चोट पर करता है। जो ठान लेता है, करके रहता है। रोने वाले रोते रहते हैं और वो अपना काम करता रहता है…।
कित्ता प्यारा मेगैंबो को बनाया…दिल करे देखता रहूं…।
सोमनाथ से 2047 तक, नेहरू बनाम मोदी की वैचारिक लड़ाई में भारत की असली पहचान क्या है?
‘मेगैंबो’ खुश हुआ…।
फिर एक दिन एक अन्य देश पर बम बरसा कर कहने लगा कि रे देश! अगर तूने जरा भी बदतमीजी की…मेरे भोले-भाले प्यारे ‘जेंजीज’ को जरा भी ‘टच’ किया, तो इत्ता मारूंगा, इत्ता मारूंगा कि कभी भूल नहीं पाओगे…।
कितनी शिष्ट दादागीरी है!
धींग मारे और रोने भी न दे…धींग इसी तरह सबको काबू में रखता है।
कितनी भी ‘आजादी आजादी’ भज लो, कितने भी ‘स्वतंत्र’, ‘स्वयंभू’ और ‘सार्वभौम’ हो लो, लेकिन चलनी तो ‘मेगैंबो’ की ही है…। रोक सको, तो रोक लो।
इस पूरे सप्ताह ‘मेगैंबो’ खुश दिखा। बहुत खुश दिखा।
दूसरी ओर पुलिस के ऐन सामने और दिनदहाड़े घर में घुस कर कुछ गोपनीय फाइलों, इलेक्ट्रानिक उपकरणों और डेटा आदि को ‘उठा’ लिया गया…मदाम ने छापा मारने वालों पर ही छापा मार दिया…कल्लो क्या कल्लोगे…!
सब चैनलों ने इस घटना को सीधे प्रसारित किया और माना कि इतिहास में ऐसा न कभी देखा न सुना कि जो फाइलें लेने के लिए आए, वे देखते रह गए और फाइलें चली भी गईं।
अब तुमसे कौन डरेगा…ईडी, पुलिस, सीबीआइ और सरकार…।
अब इसे कहते हैं ‘चोरी और सीनाजोरी’, लेकिन इस पर कौन न कुर्बान जाए कि एक महिला मुख्यमंत्री सबकी आंखों के सामने उन्हीं दस्तावेजों को लेकर यह कहते निकल गईं कि इनमें हमारी चुनावी रणनीति है, जिसे जान कर वो हमें हराना चाहते हैं…।
फिर अगली सुबह मदाम के दल के आठ सांसदों ने गृहमंत्री के दफ्तर के आगे धरना देकर ‘विक्टिम कार्ड’ खेला। साथ ही आक्रामक तेवर भी जारी रखा। एक सांसद ने कहा कि ‘ईडी चोर है… हम इनको जीतने नहीं देंगे।’
जवाब में सत्ता प्रवक्ता कहिन कि उन्होंने जांच के काम में बाधा डाली। समझ नहीं आता कि आखिर वे छिपा क्या रहे हैं और क्यों घबरा रहे हैं? कानून अपना काम करेगा…। उसे करने दीजिए।
इसके बाद खबरों में था ‘तुर्कमान गेट’ पर बने ‘अवैध निर्माण’ को नगर निगम द्वारा गिराया जाना…।
फिर यह देखते ही देखते अचानक एक बड़ी खबर बन गई। …इधर बुलडोजर थे, उधर बुलडोजर थे और पत्थरबाजी करती भीड़ थी।
