मेक्सिको और कैरिबियन समेत कई देशों तक फैला लैटिन अमेरिका भौगोलिक रूप से अमेरिका से जुड़ा हुआ है। इसकी स्थिरता और सुरक्षा भी अमेरिका के राष्ट्रीय हितों से जुड़ी है। यह क्षेत्र अमेरिकी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार है, जो विदेशी निवेश के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। लैटिन अमेरिका के कई देशों की वैचारिक प्रतिबद्धताएं पूंजीवाद के खिलाफ रही हैं, जिसका असर राजनीतिक परिस्थितियों पर पड़ा है। यही कारण है कि ऐसे कुछ देशों से अमेरिका अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित रहा है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लेने की अमेरिकी कार्रवाई के पीछे पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच गहरे मतभेद हैं। अब इस संकट के और गहराने की आशंका जताई जा रही है।

किसी देश के मौजूदा राष्ट्रपति के खिलाफ प्रत्यक्ष कार्रवाई से यह संदेश गया है कि दुनिया की महाशक्तियां अब परंपरागत कूटनीतिक सीमाओं से आगे जाकर दबाव बनाने को तैयार हैं। इससे लैटिन अमेरिका समेत दुनिया के कई छोटे और मध्यम देशों में यह डर पैदा हुआ कि उनकी राजनीतिक संप्रभुता भी बाहरी शक्तियों के निर्णयों से प्रभावित हो सकती है। रूस, चीन और कुछ विकासशील देश इसे सत्ता परिवर्तन की राजनीति के रूप में देख रहे हैं, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी इसे लोकतंत्र या मानवाधिकारों के नाम पर उचित ठहरा रहे हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पहले से मौजूद विभाजन और गहरा हो गया है तथा अंतरराष्ट्रीय कानून और राजनयिक सुरक्षा कमजोर पड़ गई है। यह वैश्विक अस्थिरता की सबसे बड़ी वजह बन सकती है।

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लैटिन अमेरिका, अमेरिका के लिए सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक शक्ति-संतुलन का एक अहम क्षेत्र है। अमेरिका इस समूचे क्षेत्र पर नियंत्रण रखना चाहता है। मगर वेनेजुएला, क्यूबा, निकारागुआ, कोलंबिया, ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चिली और पेरू जैसे देशों ने रूस तथा चीन पर ज्यादा भरोसा दिखाया है। इससे अमेरिका असहज रहता है। दूसरी ओर, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बाद भी लैटिन अमेरिकी देशों में गरीबी, बेरोजगारी और अपराध एक बड़ी समस्या है। ज्यादातर देशों में राजनीतिक अस्थिरता, शासन का कुप्रबंधन और सत्तावादी ताकतों की लामबंदी से लोग बेहाल हैं, जो पलायन करके अमेरिका में बसना बेहतर विकल्प मानते हैं। इस क्षेत्र की बड़ी समस्या आर्थिक असमानता भी है। समाज का एक छोटा वर्ग अत्यधिक संपन्न है, जबकि बड़ी आबादी गरीबी, बेरोजगारी और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। इस असमानता के कारण युवा सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

कोलंबिया, मैक्सिको और मध्य अमेरिका में नशीले पदार्थों का अवैध कारोबार कानून-व्यवस्था को चुनौती देता है। इससे आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में रहती है। राजनीतिक अस्थिरता, अवैध प्रवासन, नशीली दवाओं की तस्करी और हिंसा सीधे अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा को प्रभावित करती है। इसी कारण अमेरिका इस क्षेत्र को अपने लिए बड़ी चुनौती मानता है। हालांकि, लोकतांत्रिक लैटिन अमेरिकी देशों और अमेरिका के बीच संबंध आम तौर पर अच्छे रहे हैं, लेकिन अमेरिका कुछ लैटिन अमेरिकी देशों में लोकतंत्र की कमी या मादक पदार्थों के खिलाफ पर्याप्त उपाय न करने को लेकर आलोचना करता रहता है।

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लैटिन अमेरिका तेल, गैस, लिथियम, तांबा, सोया और कृषि उत्पादों से समृद्ध है। अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों ने अरबों डालर का निवेश इस क्षेत्र में किया है, जिन्हें सुरक्षित रखना उसकी प्राथमिकता है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने भारी निवेश, ऋण और आधारभूत संरचना परियोजनाओं के जरिए इस क्षेत्र में प्रभाव बढ़ाया है। जबकि रूस सैन्य और ऊर्जा सहयोग के माध्यम से इस क्षेत्र में अमेरिका के हितों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता रहा है।

लैटिन अमेरिका में चीन और रूस की बढ़ती मौजूदगी को रोकना राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति की एक बड़ी प्राथमिकता रही है। ट्रंप प्रशासन को आशंका है कि चीन की आर्थिक घुसपैठ और रूस की सैन्य तथा राजनीतिक सक्रियता अमेरिका के सुरक्षा, व्यापार और भू-राजनीतिक वर्चस्व को कमजोर कर सकती है। अमेरिका इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से अपने रणनीतिक प्रभाव क्षेत्र के रूप में देखता आया है, इसलिए किसी बाहरी महाशक्ति की सक्रियता उसे सीधे चुनौती देती है। चीन इस क्षेत्र में अब केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उपग्रह निगरानी स्टेशन, साइबर निगरानी केंद्र, बंदरगाहों और सैन्य उपयोगी बुनियादी ढांचे के जरिए अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है।

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अमेरिका को डर है कि ये सुविधाएं भविष्य में जासूसी, नौसैनिक संचालन और मिसाइल निगरानी के लिए इस्तेमाल की जा सकती हैं। यदि चीन को क्यूबा, वेनेजुएला या निकारागुआ जैसे देशों में स्थायी रणनीतिक पहुंच मिल जाती है, तो अमेरिका अपने ही पड़ोस में एक प्रतिद्वंद्वी शक्ति से घिरा महसूस करेगा। ताइवान या एशिया प्रशांत क्षेत्र में किसी टकराव की स्थिति में चीन, लैटिन अमेरिका में अपने ठिकानों का उपयोग अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए कर सकता है।

चीन का सहयोगी और अमेरिका का कड़ा सामरिक प्रतिद्वंदी रूस, वेनेजुएला तथा क्यूबा और निकारागुआ जैसे देशों के साथ सैन्य सहयोग, हथियार आपूर्ति और खुफिया साझेदारी बढ़ा रहा है, जो सीधे अमेरिकी सुरक्षा हितों को चुनौती देता है। अमेरिका ने इस बढ़ती चुनौती का जवाब आर्थिक दबाव, प्रतिबंधों और कूटनीतिक सक्रियता से देने की कोशिश की है। वेनेजुएला पर कठोर प्रतिबंध, क्यूबा पर सख्ती और क्षेत्रीय सहयोगियों पर दबाव इसी रणनीति का हिस्सा है।

लैटिन अमेरिका में अमेरिका, रूस और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता आने वाले वर्षों में इस पूरे क्षेत्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संरचना को गहराई से प्रभावित कर सकती है। यह प्रतिस्पर्धा निवेश, तकनीक, हथियार, कूटनीति और संसाधनों से आगे निकल कर युद्ध जैसी स्थिति तक जा सकती है। इसका असर आम जनता पर पड़ेगा। यदि देशों को किसी एक गुट को चुनने के लिए मजबूर किया गया, तो राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिबंध और आर्थिक संकट गहराएंगे।