वैसे तो कई देशों में प्रदूषण संकट गहरा गया है, लेकिन भारत में इसकी चुनौतियां बेहद गंभीर रूप ले चुकी हैं। पिछले दिनों पर्यावरण और प्रदूषण पर ‘लैंसेट’ का एक सर्वेक्षण आया। इसके बाद मानसिक रोगियों की देखभाल करने वाली एक संस्था ‘इमोनीड्स’ का भी एक सर्वेक्षण जारी हुआ। इन दोनों ही सर्वेक्षणों ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया। विशेष रूप से भारत के लिए यह चिंता की बात है, जहां विकास के समांतर न तो पर्यावरण को बचाने की फिक्र है और न प्रदूषण को नियंत्रित करने के गंभीर प्रयास दिखते हैं। ये सर्वेक्षण बता रहे हैं कि वायु गुणवत्ता सूचकांक का लगातार 400 से ऊपर रहना, न केवल लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि इसने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी जोखिम में डाल दिया है। अब बच्चे भी खतरे में हैं। वहीं लोगों में स्मृति संबंधी विकार बढ़ा है। इसके अलावा जहरीली हवाओं के लगातार बने रहने से कई बीमारियां पैदा हो रही हैं।

सर्वेक्षण बता रहे हैं कि प्रदूषण से न केवल सांस लेने में दिक्कत हो रही है, बल्कि हृदय और एलर्जी संबंधी समस्याएं भी लोगों को हो रही हैं। अल्जाइमर और पार्किंसन की चपेट में भी लोग आ रहे हैं। सर्वेक्षण में भारतीयों की मुश्किलों का भी जिक्र है। कहा गया है कि इस प्रदूषण ने लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटा दी है और अब हालत ऐसी हो गई है कि एंटीबायोटिक दवाइयां भी कम असर कर रही हैं। देश में निरंतर बढ़ते प्रदूषण के कारण ऋतु चक्र में असाधारण बदलाव आया है। बढ़ते वैश्विक ताप की वजह से जटिलताएं बढ़ रही हैं। बर्फ गिरने की प्रकृति बदल रही है। हिमनद हमारे जलस्रोत हैं। ये नदियों को पानी और बादलों को घुमड़न देते हैं। खेतों में फसलों को जीवन भी मिलता है। मगर अब बर्फ कम पड़ रही है और जो हिमनद बनते हैं, वे जल्दी पिघलने लगते हैं। इसी कारण बाढ़ के खतरे बढ़ गए हैं और लोगों का जीवन अनिश्चित हो गया है। जलवायु संकट की यह भयावह तस्वीर है।

ऐसी में सभी का दायित्व है कि वह प्रदूषण को किसी भी तरह नियंत्रित करने के लिए हरसंभव योगदान दें। सरकारें कदम उठाएं। वैश्विक ताप पर नियंत्रण के लिए ठोस उपाय हों। नारों और भाषणों से कुछ भी हासिल नहीं होगा। प्रदूषण से दुनिया के ज्यादातर देश बेहाल हैं। गरीब देशों के सामने संकट है, लेकिन समर्थ देश इस लड़ाई में अपना योगदान देने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका विचित्र तर्क है कि कार्बन उत्सर्जन तो तीसरी दुनिया के वे देश कर रहे हैं जो अब विश्व में चौथी औद्योगिक क्रांति का अगुआ बनना चाहते हैं। वैश्विक ताप को लेकर ताकतवर देशों को कोई चिंता नहीं। आधुनिकीकरण के दौर में लगातार पहाड़ काटे जा रहे हैं। खनन के लिए किए जा रहे विस्फोटों से धरती कांप रही है। कई पहाड़ दरक रहे हैं। पहाड़ी इलाकों में स्थिति गंभीर है। मनुष्यों की जिंदगी अनिश्चित हो गई है। लिहाजा अब सचेत होने का समय है।

मौसम का चरित्र बदल रहा है। बरसात के मौसम में बारिश नहीं होती और जब मानसून की विदाई का समय आता है, तो बादल फटने लगते हैं। पिछले वर्ष हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से लेकर मंडी जिले तक बार-बार जल प्रलय हुआ। इन घटनाओं ने खतरे की घंटी बजा दी है। प्रकृति ने मनुष्यों को सचेत होने का संदेश दे दिया है। उत्तराखंड में धरती कांपती है, भूकम्प आते हैं और गांवों के गांव नक्शे से गायब हो जाते हैं। मगर लोगों को कोई यह नहीं समझाता कि जीवन जीने का सहज तरीका ही सर्वोत्तम है। ऐसा लगता है कि विकास की दौड़ में हम प्रकृति का ही विध्वंस करेंगे। ऐसे में जरूरी है कि अब वैज्ञानिकों की बताई सावधानियां बरती जाएं।

इसी संदर्भ में अरावली पहाड़ियों का मुद्दा एक महत्त्वपूर्ण संदर्भ के रूप में सामने है। खनन माफिया की यही कोशिश रही है कि अरावली पर्वतमाला से अपने खनन व्यापार का हित साधा जाए। अरावली की जो छोटी पहाड़ियां हैं, वहां खनन किसी से छिपा नहीं है। इस समय यह पर्वत शृंखला संकट के दौर से गुजर रही है। पहाड़ी क्षेत्र में किस तरह संकट पैदा होते हैं, इसका सामना उत्तराखंड और हिमाचल ने बार-बार किया है। अरावली शृंखला दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली है। यहां खनन पट्टों के आबंटन पर रोक लगे, ऐसी मांग लोग करते रहे हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी आवाज उठाई। गौरतलब है कि अरावली की पहाड़ियां थार रेगिस्तान और उत्तरी मैदानों के बीच एक दीवार का काम करती हैं।

कोई दो राय नहीं कि अरावली पर्वत शृंखला को किसी भी हाल में संरक्षित करना होगा। इस मुद्दे पर अब शीर्ष न्यायालय भी सख्त है, लेकिन हमें अब अन्य पर्वत शृंखलाओं पर भी ध्यान देना होगा। उन्हें बचाना होगा। अंधाधुंध विकास मानव जाति के लिए तबाही ही लाएगा, नहीं तो विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। समस्या केवल पहाड़ों की नहीं है या उन मैदानी क्षेत्रों की नहीं है, जहां भूकम्प की लगातार आशंका बनी रहती है। यों दिल्ली से लेकर पंजाब और हिमाचल तक कई इलाकों में भूकम्प की आशंका बनी रहती है। इसलिए यहां जो भी विकास होता है, वह इस तरह होना चाहिए कि भूकम्प से बचाव हो सके।

दूसरी ओर प्रदूषण का असली कारण क्या है, इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। पहले तो पंजाब पर आरोप लगता रहा कि वहां पराली जलाने से दिल्ली में प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन अब विशेषज्ञों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह तो अंधाधुंध विकास का नतीजा है। वाहनों की बढ़ती समस्या भी चिंता का विषय है। कचरे का उचित ढंग से निस्तारण न हो पाना भी एक चुनौती है। पराली न जलाने के लिए अभियान तो चलाया गया है, लेकिन प्रदूषण का समाधान कैसे होगा? स्वाभाविक है कि इसके लिए एक दीर्घकालिक ठोस नीति बनानी पड़ेगी। पराली पर राजनीति करने या नारेबाजी से समस्या नहीं सुलझेगी। सवाल यह भी है कि राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश तक जानलेवा घुटन क्यों है? स्पष्ट है कि हमें समस्या की तह में जाना होगा।