तारीफ रोज लेते हो अपने गुरूर की
मुझ को बरहमन-ए-बुत-ए-पिंदार कर दिया
–मुनीर शिकोहाबादी
एक समय वही साहित्य तारीखी बनता था, जो सत्ता के साथ तारीफ का रिश्ता नहीं रखता था। क्रांति सिर्फ कविता में लिखने की नहीं, आम जीवन में करने के लिए भी होती थी। पिछले लंबे समय से हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के साहित्यकार ऐसे बुत बन चुके हैं,जो साहित्य से जुड़ी जमात के उत्पीड़न पर भी चुप रहते है। दिल्ली में रविवार से विश्व पुस्तक मेला शुरू हो रहा है, जिसमें क्रांति की कविताएं पढ़ी जाएंगी, दस्तखतशुदा कथित क्रांतिकारी किताबें बेची जाएंगी। जहां किताब में लिखा होगा-‘इंकलाब जिंदाबाद’, साहित्यकारों के होठों पर होगा-‘यथास्थिति है स्वीकार’। दिल्ली में साहित्य के सबसे बड़े मंच, विश्व पुस्तक मेला के उद्घाटन से पहले हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में उत्पीड़न के खिलाफ मूकदर्शक बने साहित्यकारों पर बेबाक बोल।
फैज अहमद फैज ने नज्म लिखी ‘हम देखेंगे…।’ इकबाल बानो ने पाकिस्तान की हुकूमत की परवाह नहीं करते हुए इसे ऐसे गाया कि ‘हम देखेंगे’ प्रतिरोध और तख्तापलट का नारा बन गया। जिया उल हक ने 1977 के बाद पाकिस्तान में लोकतंत्र को कुचल कर मजहब को हुकूमत का आधार बनाया। फैज ने जिया की तानाशाही का विरोध मजहबी प्रतीकों का इस्तेमाल कर ही किया। नज्म में कयामत का दिन वह प्रतीक है, जहां तानाशाही सत्ता को उखाड़ फेंक कर इंसाफ का इकबाल बुलंद होने की बात कही गई है।
फैज की नज्म और इकबाल बानो के सुर का साथ आना भी एक प्रतीक है। जिया की सरकार ने फैज की नज्मों के साथ महिलाओं के साड़ी पहनने पर भी पाबंदी लगाई थी। जिया के जुल्म के विरोध में इकबाल बानो ने प्रतिरोध के तीन प्रतीक चुने—काला रंग, साड़ी, फैज की नज्म। लाहौर के अलहमरा आर्ट्स काउंसिल में इकबाल बानो ने काली साड़ी पहन कर फैज की नज्म को गाना तो शुरू किया, पर उसे खत्म करना उनके बस में नहीं था। सभागार में पचास हजार लोग बानो के साथ सुर मिला रहे थे। लग रहा था जैसे फर्श, दीवार, छत और सीढ़ियां भी गा रही हों। जिया सरकार ने इस समारोह की रिकॉर्डिंग के कैसेट जब्त करवा लिए। इकबाल बानो को सार्वजनिक समारोह में गाने से प्रतिबंधित कर दिया गया।
फैज तो अविभाजित भारत व आज के संदर्भ में तीन मुल्कों के पसंदीदा शायर रहे हैं। अन्य दो मुल्कों के बारे में तो हम नहीं कह सकते, पर पिछले वर्षों में हिंदुस्तान में हिंदी के साहित्यकारों को ‘रिमिक्स’ पसंद है। हिंदी फिल्मों के ‘रिमिक्स’ में तो सिर्फ धुन को बदला जाता है, लेकिन हिंदी के साहित्यकार मूल बोल भी बदल दे रहे हैं। अब फैज की नज्म में एक शब्द जोड़ दिया गया है, ‘सिर्फ’। हिंदी के साहित्यकार कह रहे हैं कि सत्ता और उससे जुड़े लोग जो भी करेंगे, उसे हम ‘सिर्फ’ देखेंगे, हम सत्ता वाले साहित्य के मंच पर बैठेंगे।
मुकेश भारद्वाज का कॉलम बेबाक बोल: सियासी यतीम!
पिछले दिनों जब साहित्य अकादेमी के सचिव के खिलाफ वहां की एक महिला कर्मचारी ने अदालती लड़ाई न सिर्फ बहादुरी से लड़ी बल्कि जीती भी, उस वक्त हिंदी के साहित्यकार उत्पीड़न के दोषी सचिव के कार्यकाल वाले मंच पर साहित्यिक गतिविधियां कर रहे थे। स्त्री अस्मिता की कई अग्रदूत सत्ता के केंद्र वाले मंच पर नतमस्तक थीं। साहित्य की चौहद्दी में उत्पीड़न के खिलाफ एक स्त्री लंबे समय तक लड़ती रही, और किसी कवि, कहानीकार को कानों-कान खबर भी नहीं हुई थी।
जब 2018 में साहित्य अकादेमी के सचिव पर उनकी महिला सहकर्मी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था तो अकादेमी ने काम में खराब प्रदर्शन का आरोप लगाते हुए पीड़िता को ही नौकरी से बर्खास्त कर दिया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने साहित्य अकादेमी को कठघरे में रखते हुए इस बर्खास्तगी को अवैध और बदले की कार्रवाई माना था। इतना गंभीर मामला सामने आने के बाद साहित्यकारों ने शान से उसी सचिव के साथ साहित्यिक कार्यक्रम में मंच भी साझा किया।
सादगी भरे कालजयी गीत सुनने वाले ही नहीं हैं तो गाने वाले कहां से आएंगे
साहित्यकारों के इस रवैये ने सत्ता पक्ष का हौसला इतना बढ़ा दिया कि साहित्य अकादेमी पुरस्कारों की घोषणा को प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के पहुंचने के बाद रोक दिया गया। सत्ता पक्ष का अंदाजा बिल्कुल सही था। अकादेमी की स्वायत्तता पर इतने सीधे हमले के बाद भी हिंदी के साहित्यकारों ने चूं तक नहीं की। साहित्यकारों ने चुप रहने में भलाई समझी ताकि आगे सरकार की मंजूरी से जब भी, जैसे भी पुरस्कार मिले, उनकी चुप्पी को पुरस्कृत किया जाए।
हिंदी साहित्य की प्रयोगशाला में सत्ता के सारे प्रयोग पूरे हो चुके हैं। प्रयोग के नतीजे कह रहे हैं कि हिंदी के साहित्यकार लिखने में चाहे जितनी भी क्रांति करें, सत्ता पक्ष के हर अपमान को चुपचाप सिर्फ देखेंगे। दूसरों के लिए तो छोड़िए, अपने लिए भी किसी क्रांति का विचार तक नहीं लाएंगे।
हिंदी साहित्य के बुतों पर प्रयोग का पहला नतीजा छत्तीसगढ़ में सामने आया। साहित्य अकादमी दिल्ली और गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर की साझा अगुआई में ‘समकालीन हिंदी कहानी: बदलते जीवन संदर्भ’ पर विमर्श आयोजित था। विश्वविद्यालय के कुलपति अशोक चक्रवाल ने साहित्यिक मंच पर कुछ चुटकुलेनुमा वक्तव्य देना शुरू किया। कुलपति को लग रहा था कि उनकी इस असाहित्यिक शैली पर हर श्रोता वाह-वाह करेगा। मगर वहां आमंत्रित एक साहित्यकार के चेहरे ने बुत होने से इनकार किया और अपनी असहजता दिखाई।
अब सत्ता की महफिल में ताली बजाने वाले इतने होते हैं कि खामोश हाथों की शिनाख्त आसानी से हो जाती है। कुलपति ने साहित्यकार मनोज रूपड़ा के चेहरे की शिनाख्त कर ली कि उनके चेहरे पर वाह-वाह की परत नहीं चढ़ पा रही है। कुलपति ने मनोज रूपड़ा की तरफ देखते हुए कहा—कहीं आप मेरी बातों से ‘बोर’ तो नहीं हो रहे हैं? मनोज रूपड़ा का जवाब था कि आप विषय पर नहीं बोल रहे हैं।
मनोज रूपड़ा के असहमति के स्वर ने कुलपति के अहंकार को इतना भड़का दिया कि उन्होंने आमंत्रित रूपड़ा को वहां से जाने के लिए कह दिया। कुलपति ने अपने अधिकार का जिक्र किया कि बुलाया है, तो जाने के लिए भी कहा जा सकता है। मनोज रूपड़ा वहां से चले गए। विरोध में एक-दो लोग भी रूपड़ा के साथ निकले।
हिंदी साहित्य के लिए हैरत की बात वे बुतें थीं जो बिना हिले-डुले कुर्सी पर विराजमान थीं। उन्हें मानो खौफ था कि कुलपति ने हिलते हुए देख भी लिया तो वहां से निकाल दिए जाएंगे। ‘अतिथि देवो भवः’ तो शायद किसी और देश की संस्कृति होगी। अब तो ‘आयोजक देवो भवः’ का समय है। साहित्यकारों को खौफ था कि आयोजक को देवता सरीखा दर्जा नहीं दिया तो साहित्य अकादमी के बही-खाते में उनका नाम वर्जितों में दर्ज कर लिया जाएगा। फिर कैसे मुहैया होगा भव्य मंच और मानदेय। सत्ता के खेमे से वर्जित हुए तो असली क्रांतिकारियों के बीच बिना वातानुकूलित कमरे के किसी पेड़ के नीचे चौपाल पर कविता सुनानी पड़ जाएगी। भले हम कविता लिखते हों, ऐसी जिसमें झुग्गी-बस्ती के लोग क्रांति के पथ पर चल पड़ते हैं, लेकिन ऐसी कविता सुनाने के लिए मंच तो भव्य चाहिए।
वैसे, इस मुद्दे पर इतना लंबा लिखते हुए देख कोई स्कूली बच्चा भी ‘बोर’ होकर पूछ बैठेगा—‘किं आश्चर्यं’। जब हिंदी के साहित्यकार अकादेमी के यौन उत्पीड़न के दोषी सचिव के साथ भी खड़े थे, तो यहां कुलपति ने एक साहित्यकार का अपमान ही तो किया है। साहित्यकार ने कुलपति से विषय के संदर्भ में बात करने के बारे में कहने की हिमाकत की ही क्यों?
एक बच्चा भी हिंदी साहित्य की दुनिया की हकीकत जानता है कि यहां तो अब ऐसे साहित्यकार भी हैं जो किसी कुलपति, किसी अकादमी अध्यक्ष से जाकर कहेंगे—‘आपकी बात एकदम कालजयी है। मैं इसके साथ हूं।’ कुलपति या अध्यक्ष चौंक कर कहेंगे—‘अरे… अभी तो मैंने कुछ बोला ही नहीं।’ साहित्यकार कहेंगे—‘आप समझे नहीं, आप जो एक महीने बाद कुछ बोलेंगे उसके सही व कालजयी होने की गारंटी अभी से दे रहे हैं, ताकि हमें उस कार्यक्रम में अतिथि बनने की गारंटी मिले। हम इस बात की गारंटी देते हैं कि हम बुत की तरह बैठेंगे। आप जो बोलेंगे, सिर्फ उस पर ताली बजाएंगे। और, आप मेरी क्रांति की कविताओं को पुरस्कृत करवा दीजिएगा।’
साहित्य ने वह समय भी देखा है, जब एक नज्म से सत्ता हिल गई थी। अब समय है, जब सत्ता की सीमेंट से साहित्यकारों ने खुद को ऐसा जकड़ लिया है कि किसी भी तरह का उत्पीड़न उन्हें हिलाने-डुलाने में नाकाम रहता है। हिंदी साहित्य के बुतों की सत्ता-छाप कलम ‘इंकलाब जिंदाबाद’ की जगह ‘यथास्थिति है स्वीकार’ वाली कविता लिखनी शुरू कर चुकी है।
