मनुष्य के भीतर तुलना की भावना जन्मजात होती है। जीवन में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने कभी न कभी किसी खास इंसान को देखकर यह न सोचा हो कि मुझे इससे आगे निकलकर दिखाना है। यह भावना ईर्ष्या भी हो सकती है, प्रेरणा भी, लेकिन फर्क केवल सोच की दिशा का होता है। अगर इस भावना को सही दिशा मिल जाए, तो यही तुलना व्यक्ति के विकास का साधन बन जाती है और दिशा गलत हो जाए तो यही भावना उसे भीतर से तोड़ देती है।

ज्ञान के क्षेत्र में तुलना सबसे स्वस्थ मानी जा सकती है। जब कोई व्यक्ति यह सोचता है कि मुझे फलां व्यक्ति से अधिक जानना है, अधिक समझना है तो वह अनजाने में ही सही, लेकिन अपने अध्ययन का दायरा बढ़ा लेता है। वह अधिक पढ़ता है, प्रश्न पूछता है, सोचता है और तर्क करता है। ज्ञान की विशेषता यह है कि जितना बढ़ता है, उतना ही व्यक्ति को अपनी अज्ञानता का एहसास होता है। यही एहसास व्यक्ति को विनम्र बनाता है। इसलिए ज्ञान में प्रतिस्पर्धा अहंकार नहीं, बल्कि विवेक और नम्रता को जन्म देती है। ज्ञान में आगे बढ़ने वाला व्यक्ति दूसरों को नीचा नहीं दिखाता, बल्कि स्वयं को और बेहतर बनाने में लगा रहता है।

शारीरिक क्षमता के संदर्भ में तुलना भी कई बार सकारात्मक परिणाम देती है। अगर कोई व्यक्ति किसी से अधिक मजबूत, स्वस्थ या चुस्त बनने की इच्छा रखता है, तो वह अपनी दिनचर्या सुधारता है। वह भोजन पर ध्यान देता है, अनुशासन सीखता है और आलस्य से बाहर निकलता है। यहां तुलना का लाभ यह है कि व्यक्ति अपने शरीर को बोझ नहीं, बल्कि साधन समझने लगता है। एक स्वस्थ शरीर न केवल कार्यक्षमता बढ़ाता है, बल्कि मानसिक स्थिरता भी देता है। इस तरह शारीरिक बल की तुलना व्यक्ति को स्वयं के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाती है।

पद, ओहदा या जिम्मेदारी के संदर्भ में आगे बढ़ने की चाह भी पूरी तरह गलत नहीं

पद, ओहदा या जिम्मेदारी के संदर्भ में आगे बढ़ने की चाह भी पूरी तरह गलत नहीं है। समाज में व्यवस्था तभी चलती है, जब कुछ लोग अधिक उत्तरदायित्व उठाने के लिए तैयार हों। अगर कोई व्यक्ति यह सोचकर आगे बढ़ना चाहता है कि वह अधिक बेहतर निर्णय ले सके, अधिक लोगों की सहायता कर सके या अधिक प्रभावी भूमिका निभा सके, तो यह सकारात्मक महत्त्वाकांक्षा है। समस्या तब आती है, जब पद को केवल प्रतिष्ठा और सत्ता का प्रतीक बना लिया जाता है। पद अगर सेवा और उत्तरदायित्व के भाव से जुड़ा हो, तो वह व्यक्ति को परिपक्व बनाता है, अन्यथा अहंकारी।

अब प्रश्न आता है बुराई कहां है? बुराई धन की तुलना में है। धन स्वयं में न तो अच्छा है, न बुरा। वह केवल एक साधन है। मगर जब धन साधन न रहकर लक्ष्य बन जाता है, तब समस्या शुरू होती है। जब व्यक्ति यह सोचने लगता है कि मुझे फलां से ज्यादा धन चाहिए, तब तुलना प्रेरणा नहीं, बल्कि बेचैनी बन जाती है। धन की तुलना में व्यक्ति धीरे-धीरे यह भूलने लगता है कि धन कैसे कमाया जा रहा है। उसे बस यह दिखता है कि कितना कमाया जा रहा है।

धन की दौड़ का सबसे बड़ा खतरा यह है कि इसमें विवेक सबसे पहले खत्म होता है। व्यक्ति सही और गलत, नैतिक और अनैतिक के बीच का फर्क करना या तो भूल जाता है या जानबूझकर अनदेखा कर देता है। मेहनत से धन कमाने में समय लगता है, जबकि लालच जल्दी परिणाम चाहता है। इसी जल्दी में व्यक्ति संक्षिप्त रास्ता अपनाता है और यही उसे गलत रास्तों की ओर ले जाता है। इसलिए कहा गया है कि धन का नशा सबसे खतरनाक नशा होता है।

संतोष एक और महत्वपूर्ण पहलू है

एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है संतोष। ज्ञान, शारीरिक बल और पद इन तीनों में वृद्धि होने पर व्यक्ति के भीतर एक प्रकार की संतुष्टि अपने आप आती है, क्योंकि ये चीजें व्यक्ति को भीतर से मजबूत करती हैं। इसके विपरीत, धन बढ़ने के साथ अगर विवेक और मूल्य न जुड़ें तो संतोष नहीं, बल्कि लालच बढ़ता है। जितना धन आता है, उतना ही और अधिक पाने की चाह पैदा होती है। यह चाह कभी खत्म नहीं होती, क्योंकि इसकी कोई सीमा नहीं होती। यहां एक बात और जोड़ना आवश्यक है कि तुलना किससे की जा रही है। तुलना दूसरों से है, तो अक्सर ईर्ष्या और असंतोष जन्म लेते हैं, लेकिन अगर तुलना अपने बीते हुए स्वयं से है कि मैं कल से आज बेहतर क्या कर पाया तो यही तुलना आत्म-विकास का सबसे मजबूत आधार बनती है।

बाहरी तुलना व्यक्ति को बेचैन करती है, जबकि आत्म-तुलना व्यक्ति को संतुलित रखती है। इसके साथ-साथ जीवन में ठहराव का महत्त्व भी समझना जरूरी है। केवल आगे बढ़ते रहना ही सफलता नहीं है। कभी-कभी रुककर यह देखना भी आवश्यक है कि जो है, वह क्यों है और कितना पर्याप्त है। निरंतर तुलना में जीने वाला व्यक्ति वर्तमान का आनंद खो देता है। वह हमेशा भविष्य में जीता है और वर्तमान को बोझ समझने लगता है। तुलना अपने आप में न अच्छी है, न बुरी। उसकी दिशा तय करती है कि वह व्यक्ति को ऊपर उठाएगी या गिराएगी।

ज्ञान, बल और पद में आगे बढ़ने की चाह व्यक्ति को अधिक संवेदनशील, अधिक जिम्मेदार और अधिक मानवीय बनाती है तो वह सराहनीय है। धन की चाह विवेक, नैतिकता और संतोष के साथ संतुलित हो, तभी वह जीवन को सुखद बनाती है। तुलना से भागना संभव नहीं और न ही आवश्यक है। आवश्यकता है तुलना की दिशा तय करने की। ज्ञान में तुलना करना चाहिए, ताकि दृष्टि विस्तृत हो। शक्ति में तुलना करना चाहिए, ताकि जीवन अनुशासित हो। पद में तुलना किया जाए, ताकि उत्तरदायित्व निभाने की क्षमता बढ़े और धन में तुलना नहीं, संतुलन रखना चाहिए। वास्तविक प्रगति वही है जो व्यक्ति को दूसरों से बड़ा नहीं, बल्कि खुद से बेहतर इंसान बनाती है।

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