आमतौर पर नशा न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है। यह आदत कब लत में तब्दील हो जाए, पता नहीं चलता। आदत को एक सकारात्मक अवधारणा के तौर पर देखा जाता है, जबकि लत या व्यसन एक नकारात्मक अवधारणा है। यह एक मनोविकार है, क्योंकि जिस नशे के सेवन की लत लग जाए, उसके बिना जीवन की निरंतरता असंभव दिखाई देती है। आदत बदलना संभवत: आसान हो सकता है, पर लत से पीछा छुड़ाना बहुत मुश्किल लगता है। चिकित्सक भी मानते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन अनेक बीमारियों की जड़ है।
हालांकि, देखा जाए तो नशीले पदार्थों का सेवन कहीं न कहीं हमारी सांस्कृतिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है। ग्रामीण परिवेश में हुक्का, बीड़ी और तंबाकू इत्यादि का सेवन लोग इस तर्क पर करते हैं, ताकि अधिक श्रम कर सकें और नींद की उपेक्षा कर सकें। यही नहीं, मनोरंजन के लिए भी इनका उपयोग होता था। इसका एक पक्ष यह भी था कि वे लोग खुद तो इनका सेवन करते थे, पर युवा पीढ़ी को इनसे दूर रहने की नसीहत और हिदायत भी देते थे, क्योंकि वे स्वयं भी मानते थे कि इन पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
इसी तरह, एक समय ‘वाइन’ (शराब) पीना प्रतिष्ठा, पश्चिमी जीवन शैली और आधुनिकीकरण के अनुकरण का प्रतीक बन गया तथा धीरे-धीरे कुछ लोगों की जिंदगी में इसने लत का रूप ले लिया। वहीं सामंतवाद में नशीले पदार्थों का सेवन राजशाही का प्रतीक था और अब पूंजीवाद के दौर में इसने एक बाजार का रूप ले लिया।
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नशीले पदार्थों के सेवन को तीन दृष्टिकोणों के आधार पर समझने का प्रयास किया जा सकता है। पहला, नशे का सेवन एक चलन बन गया है, कुछ जगह इसे प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है, बच्चे या किशोर खुद को परिपक्व दिखाने के लिए इनका सेवन शुरू कर देते हैं। दूसरा, मित्र समूहों के दबाव में नशे का सेवन करना। कुछ लोग इस तरह के दबाव में आकर या घर के किसी सदस्य को नशा करते देखकर इन आदतों को अपना लेते हैं।
तीसरा, राजनीतिक-अर्थवाद के रूप में नशे का सेवन करना। इस दृष्टि से देखें तो नशीले पदार्थों के बाजार से राजस्व की प्राप्ति होती है, जो किसी भी समाज के विकास के लिए आवश्यक है। दूसरी तरफ इसके सेवन से श्रम शक्ति कमजोर होती है, मानव पूंजी नष्ट होती है और उत्पादकता का दायरा कम होता है। यहां यह सवाल विचारणीय है कि नुकसान किसमें ज्यादा है?
इसका एक पहलू यह भी हो सकता है कि नशे का वैश्विक बाजार युवा शक्ति को निर्बल करने का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र हो। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोई देश अगर कमजोर है, तो वह दूसरे देश को हराने के लिए या उसकी अर्थव्यवस्था को नष्ट करने के लिए या उस समाज में बिखराव लाने के लिए नशीले पदार्थों का बाजार विकसित कर सकता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक नई रपट में बताया गया है कि प्रति वर्ष 26 लाख मौतें शराब के सेवन के कारण होती हैं, जो कुल मौतों का 4.7 फीसद है। 15-29 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों में धूम्रपान की लत भी बढ़ी है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह वृद्धि 26 फीसद है, जबकि शहरों में 68 फीसद है। हाल ही में सामने आए टोरंटो विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 18 साल की उम्र में धूम्रपान करने वाले पुरुषों की संख्या में 36 फीसद की वृद्धि हुई है।
रपट में कहा गया है कि नशीले पदार्थों का सेवन व्यक्तिगत स्वास्थ्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाता है। हर साल इससे लाखों ऐसी मौतें होती हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। इससे दुर्घटनाओं और हिंसा का खतरा भी बढ़ जाता है।
इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि नशे के नुकसानों से परिचित होने के बाद भी ये आंकड़े क्यों बढ़ते जा रहे हैं? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं: परिवार एवं अनौपचारिक समूहों के नियंत्रण का अभाव, नशीले पदार्थों की आसानी से उपलब्धता, मित्र समूहों की भूमिका, एकाकीपन, तनाव, अस्थिरता, असुरक्षा, अलगाव, भय, असफलता, कुंठा, आपराधिक प्रवृत्ति और झूठी शान का दिखावा।
इसके अलावा नशीले पदार्थों के सेवन को प्रोत्साहित करने वाली गतिविधियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रपट के अनुसार, 76 फीसद फिल्मों में तंबाकू एवं 72 फीसद फिल्मों में शराब का सेवन दिखाया जाता है। वर्ष 2005 में इस पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन 2009 में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इसे हटा दिया गया और अब केवल लिखित चेतावनी दिखाई जाती है।
इसी तरह, 2008 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाया गया और 2004 में स्कूलों से लगभग 300 मीटर के दायरे में तंबाकू एवं गुटखे की बिक्री और सेवन पर पाबंदी लगाई गई थी। इसके बावजूद भारत नशाखोरी में विश्व में दूसरे स्थान पर है।
नशीले पदार्थों के सेवन का प्रभाव केवल शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, परिवार, रोजगार, व्यक्तित्व विकास, कानून-व्यवस्था, अनुशासन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। समाज पर इसके प्रभावों में आर्थिक दायित्वों को पूरा न कर पाना, उधार लेना, आपराधिक गतिविधियों में संलग्न होना, सामाजिक मूल्यों एवं आत्म-नियंत्रण में कमी, पारिवारिक संघर्षों में वृद्धि और सड़क दुर्घटनाओं का बढ़ना शामिल है।
यह एक गंभीर विरोधाभास है कि राज्य का एक विभाग इनसे होने वाली राजस्व प्राप्ति के लिए काम करता है, जबकि दूसरा विभाग नशा-मुक्ति अभियानों और विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये खर्च करता है। विचार यह करना है कि राजस्व से होने वाला लाभ अधिक है या अभियानों पर होने वाला खर्च। किसी भी देश का मूल दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को शिष्ट, सुरक्षित, स्वस्थ और विकासोन्मुख जीवन प्रदान करे। इसलिए राजस्व हानि की परवाह किए बिना नशे के विभिन्न साधनों पर नियंत्रण आवश्यक हो जाता है।
