ऐसा नहीं है कि समाज में नागरिक चेतना का नितांत अभाव है। अनेक लोग चेतना से लैस तो हैं, लेकिन अभी वह चेतना विकास के क्रम में ही है। वह जिस वक्त पूर्ण चेतना बनेगी, तो अनेक समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएंगी। जैसे अपनी कार में यात्रा कर रहे कुछ लोग केले या संतरे आदि खाने के बाद चलती कार से छिलके बाहर सड़क पर फेंक देते हैं। उनमें इतनी चेतना तो है कि अपनी कार के भीतर गंदगी नहीं करनी है। यह उनकी अर्ध चेतना है। पूर्ण चेतना होती कि वे छिलके को संभाल कर रखते और कार के बाहर उतरकर किसी कूड़ेदान में फेंकते। मगर अनेक लोग ऐसा नहीं करते हैं।
यह भी है कि अपनी कार के भीतर तो लोग कचरा नहीं फेंकेंगे, लेकिन अगर बस या ट्रेन में हैं, तो जहां बैठे हैं, वहीं छिलका या कचरा फेंक देने में संकोच नहीं करेंगे। सफाई के प्रति लापरवाही करते हुए वे यह समझ ही नहीं पाते कि उनकी इस हरकत से गंदगी फैलेगी। उनके केले के छिलके पर किसी का पैर पड़ा, तो वह गिर भी सकता है। यह भी अनुभव में आया होगा कि सार्वजनिक जगह में अगर किसी को आप गंदगी करते हुए देखें और टोक दें, तो उसे बुरा लगता है। उसे रत्ती भर यह बोध नहीं होता कि उसने कोई गलती की है।
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लोग औपचारिकता के लिए भी ‘सारी’ नहीं बोलते या माफी नहीं मांगते, उल्टे सामने वाले पर भड़क कर यह कहने लगते हैं कि मुझे मत सिखाएं कि क्या करना है, क्या नहीं करना। ऐसा नहीं कि भड़कने का काम कोई अनपढ़ व्यक्ति करता हो। सूट-बूट पहने व्यक्ति भी कई बार भड़क जाते हैं। ऐसे अनेक लोग समय-समय पर इधर-उधर देखे जा सकते हैं। जिस नदी को लोग श्रद्धा के साथ प्रणाम करते हैं, उसी नदी में कुछ देर बाद ही साथ लाया हुआ कचरा बहा देते हैं।
अगर ऐसे लोगों को भी टोक दिया जाए, तो वे खेद व्यक्त नहीं करते, बल्कि घूर कर देखते हैं। गोया टोकने वाले ने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। धर्मस्थलों पर लोग भावपूर्ण तरीके से ईश्वर को प्रणाम करते हैं और बाहर निकलते ही किसी भी व्यक्ति को या तो ठगने की कोशिश करते हैं या फिर मंदिर में चढ़ावे के नाम पर अपने पास रखा हुआ सबसे फटा-पुराना नोट दान-पेटी में डाल देते हैं। ये सब छोटी-छोटी बातें हैं, लेकिन इससे मनुष्य के व्यक्तित्व का पता चलता है कि वह कितना चेतस है। वह कैसा नागरिक है। चेतनावान है या चेतनाशून्य है। चेतनावान व्यक्ति हर जगह सावधान रहेगा। वह अपने नागरिक होने की जिम्मेदारी को समझ कर व्यवहार करेगा।
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यह भी अनुभव में आया है कि अपने देश में गैरजिम्मेदारी के साथ रहने वाला व्यक्ति किसी अनुशासित देश में जाकर बड़ी सभ्यता से पेश आता है, क्योंकि वह वहां फौरन दंडित हो सकता है। इसलिए वह कचरे को निर्धारित जगह ही फेंकता है। कहीं भी थूकता नहीं है। वह जहां कहीं जाएगा, अनुशासित व्यवहार करेगा, लेकिन जैसे ही अपने देश में पहुंचेगा, सारा अनुशासन भूल जाएगा और एक गैरजिम्मेदार नागरिक की तरह आचरण करने लगेगा। कुछ पैसे बचाने के लिए वह फुटपाथ के किनारे छोटा-मोटा व्यवसाय करने वाले दुकानदार से बहस करेगा। एक व्यक्ति रिक्शा वाले से दस रुपए के लिए लड़ जाएगा, लेकिन वही व्यक्ति जब किसी व्यावसायिक परिसर या माल में जाएगा, तो महंगी से महंगी वस्तु खरीदने के बावजूद किसी किस्म का मोलभाव नहीं करेगा।
कहेगा ही नहीं कि कुछ कम कर दीजिए, क्योंकि वहां उसे अपनी हैसियत का दिखावा करना है। उसको अपनी रईसी का प्रदर्शन करना है। यह दोहरा चरित्र मध्यवर्गीय समाज के अनेक लोगों में अक्सर देखा जाता है। इस तरह के कुछ लोग गरीबों से बहस करते हैं, उनका हक मारने की कोशिश करते हैं, मगर किसी महंगी दुकान में जाकर लुट जाने से भी परहेज नहीं करते।
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अपना फटा-पुराना नोट किसी बैंक में जमा करने के बजाय कुछ लोग अंधेरे का फायदा उठाकर फुटपाथ पर बैठे दुकानदारों को थमा कर चुपचाप खिसक जाते हैं। इसके पीछे व्यक्ति के भीतर कौन-सी छिपी ग्रंथि काम कर रही होती है? मजे की बात यह है कि ऐसे लोग अपनी चालाकी पर बड़े खुश भी होते हैं। घर आकर परिवार के सदस्यों के बीच शान से बताते हैं कि आज मैंने अपना फटा हुआ नोट चला लिया, लेकिन ऐसा करके वे यह भूल जाते हैं कि उनके घर का छोटा बच्चा अनजाने में ही ठगी का एक पाठ सीख रहा है।
और उस पाठ को वह स्कूल में, फिर कालेज में, समाज में और फिर अपने घर में भी अमल में लाना शुरू कर देता है। इस तरह व्यक्ति अपनी मूर्खता के कारण समाज में एक नया ठग पैदा कर देता है। अगर वह नागरिक चेतना से संपन्न होता, तो अपनी गलती को अपने तक ही सीमित रखता। उसको सार्वजनिक नहीं करता। अपनी गलती पर वह मन ही मन शर्मिंदा भी होता। अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता कि मुझे किसी को ठगना नहीं चाहिए।
लेकिन ऐसा होता नहीं है। कुछ लोग मौका पाकर किसी को ठगने की कोशिश करते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं। यही व्यक्ति जब किसी दूसरे से ठगा जाता है, तो भड़क जाता है और लोगों से कहता है कि देखो, समाज का कैसा पतन हो रहा है। अपने ठगे जाने पर लोग उत्तेजित हो जाते हैं, लेकिन वही व्यवहार जब वे दूसरे के साथ करते हैं तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
