अभिषेक मिश्रा

दुनिया भर की सरकारें और पर्यावरण और शांति के लिए काम कर रही सरकारी संस्थाएं भी आज ग्लोबल वार्मिंग को एक बड़ी समस्या मानते हुए तरह–तरह के संगठनों का निर्माण कर तो रही हैं लेकिन कॉर्पोरेट के साथ मिलकर उतनी ही तेजी से प्रकृति का दोहन भी कर रही हैं। जिस तरह दुनिया में प्राकृतिक खनिजों पर कब्जा करने की होड़ मची हुई है, ऐसे में पता चलता है कि अभी और तेजी से प्रकृति को नष्ट किया जा सकता है।

हाल ही में आयी एक रिपोर्ट से पता चलता है कि दुनिया का सबसे भू भाग में बर्फ से घिरा ध्रुवीय क्षेत्र अंटार्कटिका में विगत वर्भी तापमान औसतन 2% बढ़ा है। जो पृथ्वी पर तापमान संतुलित बनाए रखने के लिए मददगार रहा है मगर आज भी इस पर्यावरण स्थिरता बनाए रखने के लिए आज भी इस दिशा में कुछ खास निर्णय नहीं लिए जा रहे हैं और न ही कोई इसके दोहन पर रोक लगाया जा रहा है।

जल, जंगल, जमीन के दोहन के खिलाफ और उसे बचाने की लड़ाई आज भारत के लगभग हर प्रदेश में लड़ी जा रही है। इसके पहले भी भारत में पर्यावरण को बचाने के लिए बड़े जन आंदोलन हुए हैं 17वीं शताब्दी में विश्नोई आंदोलन से लेकर चिपको आंदोलन , झारखंड का जल जंगल बचाओ आंदोलन, कर्नाटक के जंगलों को बचाने को लेकर आपिको आंदोलन हुए हैं और भी तमाम जन आंदोलन पर्यावरण दोहन के खिलाफ लड़े. इन आंदोलनों के समक्ष सरकार को अपने निर्णय से हटना भी पड़ा है. लेकिन आज भी ये दोहन जारी है। जो साक्षात अरावली में देखने को मिल रहा है।

साल 2025 में पर्यावरण को लेकर भारत में दो बड़े आंदोलन हुए पहला हैदराबाद के गच्चीबाउली में स्थित हैदराबाद विश्वविद्यालय के कैम्पस के क्षेत्र का जैव विविधता से भरे जंगल को बचाने के लिए आंदोलन, दूसरा अरावली को बचाने के लिए जन आंदोलन जिसका प्रभाव देशव्यापी रहा और जिससे दो बातें निकल कर आती हैं– पहला सरकारी तंत्र पर्यावरण के गहराते संकट को लेकर कितना उदासीन हो चुका है।. दूसरा, विकास का नया पर्याय पर्यावरणीय विखंडन…

दिल्ली की प्रदूषित हवा को देखते हुए अरावली में हो रही माइनिंग और यह पर्यावरणीय विनाश मानव जीवन के लिए कितना भयावह है इसकी परवाह किसी सरकार या सरकारी संस्था को नहीं है। ज्ञातव्य हो कि दिल्ली विश्व का चौथा सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल है. फिलहाल अभी दिल्ली NCR के नागरिकों को जहरीली हवा व प्रदूषण से किसी तरह की राहत मिलने की उम्मीद दूर– दूर तक नहीं दिखाई देती है।

स्वतंत्रत पत्रकारों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, पर्यावरणविद की ओर से हॉल में ऐसी रिपोर्ट आई हैं कि लोगों के स्वास्थ्य पर खतरनाक असर हो रहा है जिसमें तात्कालिक तौर पर दिल का दौरा और स्ट्रोक का जोखिम बढ़ा है, साथ ही गर्भवती महिलाओं और गंभीर तौर पर बीमार लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।

कुछ ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि विगत एक वर्ष में जहरीली हवा और प्रदूषण के चलते एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है लेकिन अभी भी न तो जहरीली हवा और प्रदूषण की गंभीर समस्या को रोकने के लिए किसी तरह के प्रभावी कदम उठाए गए और न ही इससे प्रभावित लोगों की जान माल की रक्षा के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए ठोस रूप से कुछ किया गया जबकि स्थिति इतनी चिंताजनक है कि एम्स सहित कई चिकित्सा विशेषज्ञों ने प्रदूषण को स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करने की मांग की है।

इन विशेषज्ञों के संयुक बयान में प्रदूषण को साइलेंट किलर की संज्ञा दी गई है। जानकारी के लिए बता दें कि एयर क्वालिट इंडेक्स 50 आदर्श स्थिति है लेकिन दिल्ली में कभी हवा की गुणवत्ता 800 या इसके पार भी रहती है जोकि मानव जीवन के लिए बहुत ही हानिकारक है।

अरावली श्रृंखला का पर्यावरणीय स्थिरता बनाए रखने में योगदान और इसकी जरूरत

जैसा की हमें ज्ञात है, अरावली भारत की सबसे पुरानी श्रृंखलाओं में से एक है और पिछले ही महीने सुप्रीम कोर्ट ने अरावली को एक नई परिभाषा के तहत चिन्हित किया जिसमें बताया गया कि 100 से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली के अंतर्गत माना जाएगा।

अरावली राजस्थान,दिल्ली, गुजरात,हरियाणा समेत इन राज्यों के 37 जिले में फैला है जो राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है. जोकि उत्तर भारत के मैदानी भू –भाग को थार से आने वाली रेगिस्तानी हवाओं से बचाता है. जिससे यह भूभाग आज भी भारत में सबसे ज्यादा उत्पादित क्षेत्र में बना है।

इस पर्वत माला पर तरह  – तरह के प्राकृतिक खनिजों की भरमार है जिससे यहां खनन भी ज्यादा होता है और इससे यहां के वनों की कटाई की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है जिससे बाढ़, भूस्खलन आदि तमाम प्राकृतिक आपदाएं आने की संभावना बढ़ती है. माइनिंग से उठने वाली धूल का प्रभाव आस पास के क्षेत्रों में लोगों और फसलों पर भी पड़ता है जिससे कई तरह की स्वास्थ्य संबंधित बीमारियां पैदा होती हैं।

हालंकि पर्यावरण मंत्रालय ने अपना तर्क देते हुए बताया कि यह नईं परिभाषा इसलिए ताकि अरावली में हो रही अवैध माइनिंग को रोका जा सके लेकिन ज्ञात है कि पिछले कुछ सालों में अरावली की पहाड़ियों माइनिंग को और ज्यादा बढ़ावा दिया गया. जिससे उठने वाली धूल का प्रभाव आस पास के क्षेत्रों में पड़ता है।

जन आंदोलन और इसका प्रभाव

हाल ही में आयी एक रिपोर्ट बताती है कि 1990 से लेकर 2020 तक 4.2 हेक्टेयर वनों का विनाश हुआ जो या तो अन्य उपयोग के लिए लाया गया या ऐसे ही छोड़ दिया गया। जिसमें भारत में हुए कुल वनों का नुकसान 3,84000 हेक्टेयर है, जो पूरे विश्व में ब्राजील के बाद दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी संख्या में कटाई करने वाला देश बना। ऐसे यह पता चलता है कि अरावली का संरक्षण होना कितना आवश्यक हो जाता है खासकर जब दिल्ली, जैसे बड़े शहरों की हवा दिन ब दिन बदतर होती जा रही है।

किसी भी बड़े परिवर्तन चाहे वह सामाजिक हो या राजनीतिक – में जन आंदोलनों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है जिसने सत्ता को बड़े से बड़े फैसलों पर झुकने को मजबूर किया है इसका एक बड़ा उदाहरण 2020 का किसान आंदोलन या हैदराबाद के कांचा गच्ची बावली के जंगलों को बचाने के लिए जो एक जुटता लोगों ने दिखाई थी और उसे पूरे विश्व में जिस तरह एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनाया उसपे कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए उस जंगल को संरक्षित करने का फैसला दिया, जोकि आज के बढ़ते निर्वनीकरण के समय में एक बुद्धिमता पूर्ण और जनहित के लिए उचित था. हैदराबाद विश्वविद्यालय का छात्र होते हुए मैं स्वयं लोगों को इस जंगल को बचाने के लिए भारी संख्या में एक जुट होते हुए देखा था जो संघर्ष पूरे महीने भर चला और अंततः न्याय जनहित को ध्यान रखते हुए दिया गया।

दिसंबर 2025 में आए अरावली की नई परिभाषा को लेकर कोर्ट के इस फैसले से नाराज लोगों ने अरावली को बचाने को लेकर एक बड़ा जन आन्दोलन छेड़ा जिसका व्यापक प्रभाव सोशल मीडिया पर भी दिखा, जिसमें लोगों ने अरावली की रक्षा के लिए एक साथ दिखे और अंततः कोर्ट ने अपना फैसला वापस लिया। हम देखते हैं कि आज के समय में जब जल, जंगल और जमीन को बचाने की लड़ाई के लिए तमाम आदिवासी और हाशिए के समुदाय के लोग अपने हिसाब से लड़ाई लड़ रहे हैं ऐसे में एकजुटता और एक व्यापक जन आंदोलन का प्रभाव दिखता है जो कोर्ट के फैसले को बदलने के लिए मजबूर कर देता है, और जंगलों को बचाने के लिए तत्पर दिखता है। 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन तीनों आंदोलनों ( किसान आंदोलन, हैदराबाद के लैंड ग्रैब मूवमेंट या अरावली बचाओ आंदोलन) में एक समानता देखने को मिलती है कि ये आंदोलन सरकार द्वारा कॉर्पोरेट को सौंपे जा रहे इस पर्यावरण के मिटते अस्तित्व के खिलाफ खड़े हुए। विकास के नाम पर कॉर्पोरेट द्वारा हो रहे पारिस्थितिकी तंत्र के दोहन के खिलाफ एकजुटता हुई।  इन जन आंदोलनों से वर्तमान समय की जनचेतना का पता चलता है जिसमें जनता न केवल इन कॉर्पोरेट के लिए वैल्यू बनाने वाली मशीनरी बनना चाहती है बल्कि अपना हित इन्हीं जल, जंगल और जमीनों में देख पा रही है। पढ़िए क्यों जरूरी है अरावली पर्वतमाला?

(लेखक दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में Ad-PR के छात्र हैं)