भारत की चमकती सड़कों, ऊंची इमारतों और ‘स्मार्ट’ शहरों की योजनाओं के पीछे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। देश के कई हिस्सों में आज भी हजारों लोग सीवर और नालियों में उतरकर अपने हाथों से सफाई करने को मजबूर हैं। ऐसे में कई बार जहरीली गैस की वजह से सफाई कर्मियों को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है। यह पेशा नहीं, बल्कि समाज में असमानता और भेदभाव का जीवंत प्रतीक है।

देश में कभी-कभी सफाई कर्मचारियों को वर्ष में दो-चार मौकों पर किसी सरकारी समारोह में सम्मानित किया जाता है। ऐसा करके यह दिखाया जाता है कि सरकार उनकी मेहनत और योगदान के महत्त्व को मानती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कुछ मिनटों का यह सम्मान उनके लिए स्थायी सुरक्षा, गरिमा या बेहतर जीवन की गारंटी नहीं देता है। असली गरिमा तो तब आएगी, जब उनके काम करने के तरीके में बदलाव होगा, उन्हें खतरनाक और अमानवीय परिस्थितियों में नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से काम करने और जीने का अवसर मिलेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ तकनीक का इस्तेमाल इसमें अहम भूमिका निभा सकता है।

हर वर्ष देश में सैकड़ों सफाई कर्मचारी सीवर के गड्ढों और नालियों में दम घुटने, जहरीली गैस या करंट लगने से अपनी जान गंवा देते हैं। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2018 से 2023 के बीच चार सौ से अधिक लोगों की मृत्यु सीवर की सफाई के दौरान हुई। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग का मानना है कि यह संख्या वास्तविकता से कहीं कम है, क्योंकि कई मौतें दर्ज नहीं हो पातीं। इन मृतकों में आमतौर पर दलित समुदाय के लोग होते हैं, जिन्हें सदियों से इस कार्य में धकेला गया है। यह स्थिति हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में उस भारत में रह रहे हैं, जिसने अपने संविधान में समानता और गरिमा का वादा किया था।

भारत का संविधान हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। अनुच्छेद-14 कहता है कि सभी नागरिक कानून की दृष्टि में समान हैं। अनुच्छेद-17 में अस्पृश्यता को समाप्त किया गया है और इसे किसी भी रूप में लागू करने या मानने को अपराध बताया गया है। वहीं अनुच्छेद-21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसका अर्थ केवल जीवित रहना नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण जीवन जीना भी है। यही संविधान का नैतिक आधार है।

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वर्ष 2013 में केंद्र सरकार ने ‘हाथ से मैला ढोने वाले कर्मचारियों के रोजगार प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम’ लागू किया। इस कानून का उद्देश्य हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करना तथा इससे जुड़े लोगों को वैकल्पिक रोजगार, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन देना था। मगर यह दुखद है कि कानून बनने के बावजूद यह अमानवीय प्रथा अब भी जारी है। इसका कारण केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की गहरी जड़ें हैं, जो सफाई के काम को एक खास वर्ग से जोड़कर देखती है।

जब भी किसी इलाके में सीवर की नाली जाम होती है, तो मशीनों की बजाय किसी सफाई कर्मी को नीचे भेजा जाता है। वह भी बिना सुरक्षा उपकरण, बिना प्रशिक्षण और बिना जीवन की गारंटी के। अब समय आ गया है कि इस समस्या को केवल कानून या नैतिकता से नहीं, बल्कि विज्ञान और तकनीक की मदद से भी समाप्त करने के प्रयास किए जाएं। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है। यह वह तकनीक है, जो मशीनों को मानव जैसी समझ, निर्णय क्षमता और सीखने की योग्यता देती है। इसका सही उपयोग हाथ से मैला साफ करने जैसी अमानवीय प्रथा को खत्म करने में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है।

भारत में भी अब कृत्रिम मेधा पर आधारित रोबोट विकसित किए गए हैं, जो सीवर की नालियों में उतरकर सफाई कर सकते हैं। यह रोबोट कैमरे एवं सेंसर की मदद से गंदगी और रुकावट का पता लगाता है तथा मशीनी हाथों से सफाई करता है। इस तकनीक का प्रयोग अब तिरुवनंतपुरम, चेन्नई, लखनऊ और पटना जैसे शहरों में किया जा रहा है। इससे न केवल लोगों की जानें बची हैं, बल्कि यह भी सिद्ध हुआ है कि सफाई गरिमा के साथ भी की जा सकती है।

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दरअसल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणाली सीवर की नालियों में लगे सेंसर के माध्यम से पानी का प्रवाह, गैस का स्तर और दबाव की जानकारी एकत्र करती है। इन आंकड़ों का विश्लेषण मशीन लर्निंग प्रणाली द्वारा किया जाता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से सफाई कर्मचारियों को प्रशिक्षण और पुनर्वास के अवसर भी मिल सकते हैं। उन्हें मशीन संचालन, डेटा विश्लेषण और तकनीकी प्रबंधन जैसे कार्यों में प्रशिक्षित किया जा सकता है, ताकि उनका जीवन सुरक्षित और सम्मानजनक बन सके।

दुनिया के कई देशों ने यह साबित कर दिया है कि सीवर की सफाई इंसान की जान जोखिम में डाले बिना भी संभव है। जापान में ‘पाइप रोवर’ और ‘क्रोबोस’ नामक रोबोट पाइपलाइन की गहराइयों में जाकर कैमरे और सेंसर की मदद से सफाई करते हैं। दक्षिण कोरिया में ‘सीवर बाट’ नामक तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से सीवर व्यवस्था की स्थिति की निगरानी करती है और खतरे के समय चेतावनी देती है। सिंगापुर में पूरे सीवर तंत्र को स्मार्ट सेंसर और स्वचालित मशीनों से नियंत्रित किया जाता है, जिससे किसी इंसान को नालियों या गड्ढों में उतरना नहीं पड़ता। लंदन और एम्स्टर्डम जैसे शहरों में ड्रोन एवं कैमरे पाइपलाइन का नियमित निरीक्षण करते हैं।

इन देशों ने यह दिखाया है कि अगर इच्छाशक्ति और कारगर योजना हो, तो सफाई भी सुरक्षित एवं मानवीय तरीके से की जा सकती है। भारत में भी यदि सरकार और नगरपालिकाएं ऐसे तकनीकी समाधान अपनाएं, तो हाथ से मैला साफ करने की प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है। प्रत्येक नगर निकाय में रोबोटिक सफाई प्रणाली अनिवार्य की जानी चाहिए। सरकार को इस दिशा में अनुसंधान करने वाले नवाचार केंद्रों और निजी संस्थाओं को सहयोग एवं आर्थिक सहायता देनी चाहिए।

‘स्वच्छ भारत मिशन’ का अगला चरण केवल साफ-सफाई तक सीमित न रहकर ‘गरिमा मिशन’ होना चाहिए, जहां उद्देश्य सफाई करने वाले की गरिमा की रक्षा करना भी हो।

हाथ से मैला साफ करना केवल श्रम का नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है। इसे समाप्त करना हमारी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें यह अवसर देती है कि हम एक ऐसे भारत की कल्पना करें, जहां कोई व्यक्ति केवल अपने विशेष वर्ग या जाति के कारण हाथ से मैला साफ करने को मजबूर न हो।

जब मशीनें सफाई करेंगी, तब इंसान को उस अपमान, भय और असमानता से मुक्ति मिलेगी, जो पीढ़ियों से उसका पीछा कर रही है। मानवता को अपमान से मुक्त करना, गरिमा को पुनर्स्थापित करना और संविधान के उस वादे को साकार करना जरूरी है, जो कहता है कि हर व्यक्ति समान है और हर किसी को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार है।

जब कोई भी नागरिक अपने विशेष वर्ग या जाति के कारण नहीं, बल्कि अपनी योग्यता और गरिमा के आधार पर पहचाना जाएगा, तभी यह भी कहा जा सकेगा कि भारत सचमुच में स्वच्छता और सम्मान के मामले में एक संवेदनशील राष्ट्र है।