प्रधानमंत्री किसानों के साथ मिल-बैठ कर बात करने को तैयार क्यों नहीं हैं, समझना मुश्किल है। एक तरफ नरेंद्र मोदी कहते नहीं थकते कि किसानों के लिए उनके दिल में कितनी जगह है, और दूसरी तरफ जब भी उनसे मिलने की जरूरत होती है, वे गायब हो जाते हैं। पिछली बार जब किसानों ने दिल्ली आने की कोशिश की थी, तो मैंने लिखा था कि मोदी अगर उनके नेताओं से मिलने खुद जाते और उनके साथ चाय पर चर्चा करते, तो शायद किसानों को एक वर्ष से अधिक धरने पर बैठने से रोक सकते थे। पूरा वर्ष गुजर गया तब उन्होंने उन तीन तथाकथित ‘काले कानूनों’ को वापस ले लिए, जिनके खिलाफ किसान मोर्चा खोले हुए थे, दिल्ली की सीमाओं पर।

पिछले सप्ताह फिर आ गए हैं धरना करने, इसलिए कि उनकी नजर में उनकी समस्याएं वही हैं, जो दो साल पहले थीं और इन समस्याओं का समाधान ढूंढ़ने की कोशिश तक नहीं हुई है। इस बार भी किसानों के साथ वैसे ही पेश आए हैं मोदी और उनके मुख्यमंत्री जैसे कि उनके सामने किसान नहीं, देश के सबसे बड़े दुश्मन हों। एक बार फिर दिल्ली की सीमाओं पर नाकाबंदी ऐसी की गई है, जैसी देश की सीमाओं पर होनी चाहिए। सड़कों पर कीलें ठोंकी और कांटेदार तारों की दीवारें खड़ी कर दी गई हैं।

आसमान से ड्रोन आंसू गैस फेंकने का काम कर रहे हैं और सोशल मीडिया पर मोदी भक्त वही झूठ फैला रहे हैं, जो पिछली बार फैलाया था। ये लोग किसान नहीं, खालिस्तानी आतंकवादी हैं। गरीब किसान नहीं, ये अमीर लोग हैं, जो मर्सिडीज गाड़ियों में घूमते हैं। इनके साथ जितनी सख्ती हो, कम है। पिछले सप्ताह भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनलों पर एक वीडियो चलवाया, जिसमें एक तथाकथित सिख किसान कह रहा है कि यह सब किया जा रहा है सिर्फ मोदी की लोकप्रियता को कम करने के वास्ते।

मैंने बड़े ध्यान से एक दूसरा वीडियो देखा, जो एक बुद्धिजीवी मोदी भक्त ने बना कर एक्स पर डाला है। इस वीडियो में वह कहता है कि एमएसपी की मांग देश के ज्यादातर किसान नहीं कर रहे हैं, सिर्फ कुछ मुट्ठीभर किसान कर रहे हैं। बात सही है। मगर इस बात को उसने अनदेखा किया इस वीडियो में कि देश में सिर्फ मुट्ठीभर किसान ऐसे हैं, जो पैदा करते हैं इतना अनाज कि मंडियों और गोदामों तक पहुंच सके। देश के ज्यादातर किसान या तो सिर्फ अपने परिवार के लिए अनाज पैदा करने के लायक हैं या इस लायक कि वे देहातों की छोटी मंडियों में जाकर अपनी उपज बेच सकें।

उन मुट्ठी भर किसानों की जरूर गंभीर समस्याएं होंगी, जिन्हें लेकर वे दिल्ली आने की एक बार फिर कोशिश कर रहे हैं। समस्याएं इतनी गंभीर हैं पंजाब में कि हर दूसरे घर में से कोई न कोई नौजवान कनाडा या अमेरिका चला गया है। मेरा भाई किसान है और उसका कहना है कि पंजाब के कई गांव ऐसे हैं, जहां सिर्फ बुजुर्ग, औरतें और बच्चे रह गए हैं।

इन समस्याओं के बारे में अगर मोदी जानकारी लेने की तकलीफ करेंगे, तो दो चीजें फौरन हो जाएंगी। एक तो किसान खुश हो जाएंगे कि उनकी सुनवाई ऊपर तक हो रही है और दूसरा यह कि उनकी कुछ असली बातें सामने आ जाएंगी। पिछली बार जब किसान दिल्ली आए थे तो कइयों ने कहा पत्रकारों से कि उनको असली चिंता इस बात को लेकर थी कि बड़े-बड़े उद्योगपतियों की चंगुल में फंस जाएंगे। नाम लेकर उन्होंने कहा था कि इन लोगों के ‘साइलो’ अभी से दिखने लगे हैं पंजाब के गांवों में।

इसमें कोई शक नहीं कि कृषि क्षेत्र में सुधारों की सख्त जरूरत है। मंडी व्यवस्था बहुत पुरानी हो गई है और जो भूमिका आढ़तियों की है इन मंडियों में, उसमें भी बदलाव लाने की जरूरत है। यह भी सही है कि उन तीन ‘काले कानूनों’ में कुछ अच्छे सुझाव थे, जिन पर अमल होना चाहिए।

उन कानूनों का विरोध किसानों ने शायद इसलिए किया था कि उनकी सहमति से ये कानून नहीं बने थे। ऊपर से ऐसे थोप दिए गए थे और इतनी जल्दबाजी में कि ऐसा लगा जैसे कि सरकार कुछ छिपा रही हो। इस बार जब सुधार लाने का प्रयास होता है, उम्मीद है कि किसानों की समस्याओं को उनकी जुबान से सुनने के बाद ही कार्यवाही हो।

माना कि इस बार किसानों की मांगें कुछ ज्यादा हैं, जैसे कि हर किसान को दस हजार रुपए मासिक पेंशन की सुविधा हो। ऐसा करना असंभव है, क्योंकि पेंशन बांटने से सरकारी खजाने खाली हो जाएंगे। इस बात पर भी चर्चा होनी चाहिए कि क्या समय नहीं आ गया है कि किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देना बंद हो।

किसानों में इस किस्म की मुफ्तखोरी की आदत डाली गई है कांग्रेस की झूठी समाजवादी नीतियों में। शहरों में गरीब लोग अगर बिजली-पानी के बिल भर सकते हैं, तो किसानों के लिए ऐसा करना मुश्किल नहीं होना चाहिए। छोटे किसान बेशक देने के लायक नहीं हैं, लेकिन जो मुट्ठीभर किसान एमएसपी को कानूनी अधिकार बनवाना चाहते हैं, उनके लिए थोड़ा-बहुत पैसा बिजली-पानी के लिए देना मुश्किल नहीं है।

देश की सत्तर फीसद से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है, इसलिए जरूरत है कि बड़े राजनेता अपनी बातें सोच-समझ कर रखें। राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह वादा किया कि उनकी सरकार अगर बनती है तो एमएसपी को कानूनी अधिकार बना दिया जाएगा। ऐसा कहना गैर-जिम्मेदाराना है। किसानों से झूठे वादे करने के बदले उनके साथ बैठ कर बातें करनी चाहिए, ताकि कृषि क्षेत्र में आवश्यक सुधार किए जाएं।