सोचने का समय आ गया है कि आरक्षण से फायदा वास्तव में हुआ है उन अति-गरीब, अति-पिछड़े लोगों को जिनके लिए इस व्यवस्था को बनाया गया था? हां या नहीं। सामाजिक तौर पर क्या ये लोग आज भी गांवों के बाहर नहीं रहते गंदी बस्तियों में? उनके साथ अभी भी सवर्ण जातियों के लोग छूआछूत करते हैं कि नहीं?

मेरा इरादा नहीं था दोबारा जातीय आरक्षण पर लिखना। जो कहना था मैंने पिछले हफ्ते वाले अपने लेख में कह दिया था। दोबारा इस विषय पर अगर लिख रही हूं तो इसलिए कि आरक्षण के ठेकेदारों से मुझे इतनी गालियां, इतनी नफरत, इतनी धमकियां मिलीं हैं सोशल मीडिया पर कि उनका जवाब देना जरूरी हो गया है। इस ट्रोल सेना की अगुआई की है दलितों के समर्थन के नाम पर एक ऐसे महा ठेकेदार ने जो अपनी दुकान अमेरिका से चला रहे हैं।

इस व्यक्ति ने मेरी गिरफ्तारी के लिए मुहिम चलाई और जब मेरी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो ट्वीट करके कहा कि मैं इतना डर गई हूं अब कि कभी आरक्षण का विरोध करने की हिम्मत नहीं करूंगी। गलत। मुझे इस तरह की धमकियों से न कभी पहले डर लगा है न ही अब लगनेवाला है। न ही मैं डरी, जब दलितों के तथाकथित समर्थकों ने पिछले हफ्ते मेरी गिरफ्तारी कराने का हैशटैग ट्रेंड करवाया था।

मुझे तकलीफ सिर्फ इस बात से हुई कि मुझपर जातिवादी होने का आरोप लगाया गया। जिस सिख परिवार में पैदा हुई हूं, उसमें बचपन से मुझे सिखाया गया है कि जातिवाद और छूआछूत महापाप हैं, जिनके विरोध में गुरु नानक ने सिख धर्म शुरू किया था। गुरुद्वारों के लंगर में इकट्ठा बैठ कर खाना खाते हैं हर जाति के लोग और हमारे अपने घर में कभी किसी ने नहीं पूछा कि रसोई में खाना किसके हाथ से बना है।

मैंने पहली बार छूआछूत तब पाया, जब पत्रकार बन जाने के बाद गांव में एक दलित के घर गई थी उसपर हुए अत्याचार के बारे में लिखने। मेरे साथ एक ब्राह्मण फोटोग्राफर था, जिसने उसके घर में मुझे चाय पीते देख कर कहा कि उससे कभी किसी दलित के घर में चाय नहीं पी जा सकती है। यह वो जमाना था जब दिल्ली शहर के शिक्षित, सभ्य घरों में भी दलित मालियों, सफाईवालों के लिए अलग बर्तन रखे जाते थे। हमारे घर में नहीं। तो मेरे ऊपर दलितों से नफरत करने का आरोप जो पिछले सप्ताह लगा है वह सरासर झूठ है।

मैंने उस लेख में कहीं नहीं कहा कि अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण समाप्त कर देना चाहिए। मैंने सिर्फ पूछा कि आरक्षण का लाभ क्या राजनेताओं को उनसे ज्यादा मिल रहा है जिनके लिए आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई थी। क्या इस सवाल को पूछा नहीं जाना चाहिए? क्या यह भी पूछा नहीं जाना चाहिए कि 75 वर्षों के बाद आरक्षण का वास्तव में फायदा हुआ है उनको जिनको सदियों से जातिवाद के कारण शिक्षा से भी दूर रखा गया है? मैं मानती हूं कि ये सवाल जरूरी हो गए हैं आज इसलिए कि फिर से कुछ राजनीतिक दल जातिगत जनगणना के नाम पर वोट बैंक बना रहे हैं।

सवाल और भी हैं जिनको पूछना जरूरी है। जो लोग पिछड़ी जातियों की श्रेणी में गिने जाते हैं क्या उनके लिए भी आरक्षण होना चाहिए? क्या सच ये नहीं है कि इस श्रेणी में कई जातियां हैं जो देहातों में सबसे शक्तिशाली हैं? मेरा मानना है कि ऐसे सवाल हम सबको पूछने चाहिए। लेकिन लोग पूछने से डरते हैं, क्योंकि जातिवाद के ठेकेदारों की गालियों और धमकियों से लोग डरते हैं। मेरे साथ जो उन्होंने किया है उससे मैंने यह भी सीखा है कि जातिवाद की बीमारी सिर्फ सवर्ण जातियों में नहीं है। उन जातियों में भी दिखने लग गई है जिन्होंने सदियों से अत्याचार झेला है। उनमें इस किस्म की भावनाएं पैदा की हैं उन ठेकेदारों ने, जिनकी दुकानें चलती हैं जातिवाद को समाप्त करने के नाम पर।

समय आ गया है स्पष्ट शब्दों में कहना कि इन ठेकेदारों ने उनका कोई लाभ नहीं किया है जिनके वे हमदर्द बने फिरते हैं। इनमें और उन राजनेताओं में कोई फर्क नहीं है, जिनकी राजनीति चलती है वोट बैंकों के जरिए। फिर से वह बात दोहराने जा रही हूं जो मैंने अपने पिछले लेख में कही थी। सोचने का समय आ गया है कि आरक्षण से फायदा वास्तव में हुआ है उन अति-गरीब, अति-पिछड़े लोगों को जिनके लिए इस व्यवस्था को बनाया गया था? हां या नहीं। सामाजिक तौर पर क्या ये लोग आज भी गांवों के बाहर नहीं रहते हैं गंदी बस्तियों में? उनके साथ अभी भी सवर्ण जातियों के लोग छूआछूत करते हैं कि नहीं?

इन शब्दों को लिखने के बाद मेरी आंखों के सामने बिहार के जहानाबाद जिले के एक भूमिहार गांव के दृश्य घूमने लग गए हैं। संपन्न गांव है यह। सुंदर और साफ-सुथरा, लेकिन दूर एक किनारे में है मुसहरों की बस्ती जिसमें इतने बुरे हाल में जी रहे हैं लोग कि मैं आजतक वे दृश्य नहीं भूल पाई हूं। ऐसे दृश्य मैंने देहातों में कई जगह देखे हैं और यही वजह है कि मैंने सवाल उठाए हैं आरक्षण के लाभ पर। दशकों के आरक्षण के बाद अगर सबसे जरूरतमंद लोगों का यह हाल है तो क्या आरक्षण नीति के बारे सोचना नहीं चाहिए? सोचना नहीं चाहिए कि आरक्षण के अलावा क्या कर सकते हैं हम इन जातियों के उठान के लिए?

मेरा मानना है कि ऐसे सवाल बहुत पहले पूछे जाते तो ठेकेदारों की दुकानें नहीं चल रही होतीं इन सबसे मजलूम जातियों के नाम पर। इन तथाकथित हमदर्दों को क्यों ना कठघरे में खड़ा करके पूछा जाए कि आरक्षण व्यवस्था के कायम रहने के दशकों बाद इतना भी क्यों नहीं हो सका कि अति-पिछड़ी जातियों के बच्चों के लिए स्कूल इतने अच्छे बने कि उच्च शिक्षा संस्थाओं में उनके लिए आरक्षण की जरूरत नहीं हो। क्या ढोंगी नहीं हैं ये ठेकेदार?