नौ साल पहले 2006 के जुलाई की एक बरसाती शाम। मुंबई के कामकाजी लोग दफ्तर से घर को रवाना हो रहे थे। ट्रेन के डिब्बे खचाखच भरे थे। अचानक लोकल ट्रेनों में एक के बाद एक धमाकों की गूंज सुनाई देने लगी। लोग समझ नहीं पाए कि क्या हुआ है। जब तक धमाकों का कारण पता चलता, 200 के आसपास लोग दम तोड़ चुके थे और 800 के करीब घायलों में कई जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए थे। बुधवार को जब इन धमाकों के दोषियों को सजा सुनाई गई, तो लगभग एक हजार परिवारों के जख्म फिर हरे हो गए।
मुंबई ने बाबरी मजिस्द ध्वंस के बाद 1993 में सिलसिलेवार धमाके और उनकी तबाही देखी थी। देश में कहीं भी कौमी फसादात होते हैं तो उसका हरजाना मुंबई को उठाना पड़ता है। बाबरी मस्जिद अयोध्या में गिराई गई। बम मुंबई में फूटे। गोधराकांड के बाद कौमी दंगे गुजरात में हुए। प्रतिक्रिया में बम मुंबई में फूटे। वजह साफ है कि क्रिया की प्रतिक्रिया की आड़ में देश की आर्थिक रीढ़ तोड़ने का काम किया जाता है। लेकिन यह इस शहर का चरित्र है कि तबाही कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, कुछेक घंटों में ही यह उससे उबर कर रफ्तार पकड़ लेता है।
बुधवार को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए बम विस्फोट के जिम्मेदार लोगों को सजा सुनाई गई तो प्रभावितों के परिवार ने उस तबाही को महसूस किया, जो एक झटके में उनके परिवार पर टूटा था। धमाकों में कोई दुनिया से उठ गया। किसी के हाथ-पांव नहीं रहे। किसी के शरीर में लोहे की किरचें घुस गर्इं। किसी को लकवा मार गया। किसी के परिवार का इकलौता कमानेवाला चला गया। धमाके में बहरे होनेवालों की संख्या बहुत ज्यादा थी। इन धमाकों की गूंज को तो वक्त ने कमजोर कर दिया, लेकिन दिमाग पर इन धमाकों का असर आज भी बरकरार है।
Video में देखें: कैसे 7/11 मुंबई ब्लास्ट आरोपी सादिक ने कबूला था- ‘धमाके हमने किए’
धमाकों में मारे गए या घायल हुए हर आदमी की एक कहानी है। इन लगभग एक हजार कहानियों में से कुछ कहानियां बताती हैं कि किस तरह से धमाकों के बाद शरीर में घुसी लोहे की किरचों की पीड़ा के साथ लोग आज भी जी रहे हैं। पराग सावंत की पत्नी और छोटी बेटी के अलावा उनकी मां माधुरी और जयप्रकाश की पीड़ा को महसूस करना आसान नहीं है। पराग सालों तक कोमा में रहा और दो महीने पहले परिवार पर दुख का पहाड़ छोड़कर चला गया। जयप्रकाश कहते हैं कि जो उनके बेटे के साथ हुआ किसी और के साथ ना हो। सुहास तावडे की आंखें आज भी लोकल ट्रेन के डिब्बों में उन अपरिचितों सहयात्रियों के चेहरे तलाश करने की कोशिश करती है, जिन्हें वे रोज देखते थे, लेकिन धमाकों के बाद गायब हो चुके हैं। धमाके के बाद वे ट्रेन में गिरे और धातु के टुकड़े उनके शरीर में घुसे जिनके दर्द के साथ वे आज भी जी रहे हैं।
देवयानी दलवी के पति चंद्रकांत दलवी धमाकों में बच तो गए, लेकिन उन्हें लकवा मार गया। 2009 में उनका इंतकाल हो गया। तबसे देवयानी आर्थिक और मानसिक परेशानियों और जीवन के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही है। कान के पर्दों को नुकसान होनेवालों की संख्या सबसे ज्यादा है। बहरापन लोगों के जीवन का एक हिस्सा बन गया है।
महेंद्र पितले चाहते थे कि इन धमाकों के सभी आरोपियों को फांसी दी जाए। धमाकों में अपना बायां हाथ हमेशा के लिए खो चुके पितले उस कृत्रिम हाथ के सहारे जिंदगी काट रहे हैं, जो अब जवाब देता जा रहा है। वे इस नकली हाथ को कामकाज करने लायक बनाने में लगनेवाले ढाई लाख रुपए जुटाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। डॉक्टर एनएम कामत सरीखे लोगों ने धमाकों के बाद भय के कारण फर्स्ट क्लास में सफर करना ही छोड़ दिया क्योंकि धमाके फर्स्ट क्लास के डिब्बों में हुए थे। और रेल विभाग कहां इस भय से अछूता रहा था।
धमाकों के बाद उसने डिब्बों के अंदर सामान रखने के लिए ऊपर लगाए स्टैंड ही ट्रेनों से निकाल दिए थे क्योंकि सारे धमाके स्टैंड पर रखे सामानों में हुए थे। बाद में यात्रियों ने शोर मचाया कि लोकल ट्रेनों में खड़े होने की जगह होती नहीं, सामान साथ में लेकर कैसे सफर करें। अगर किसी को बम रखना ही होगा तो वह सीट के नीचे रख देगा। इसके बाद रेल विभाग ने वापस सभी स्टैंड लगाए।
मुकदमे का आरोपपत्र प्रस्तुत करने के दिन से ही आरोपियों ने इस मुकदमे को लंबा खींचने की तैयारी कर ली थी। उन्होंने देश की पुलिस, जांच एजंसियां, कानून और न्याय प्रक्रिया पर अविश्वास जताया। आरोप पत्र की प्रतिलिपि लेने से इनकार किया। अदालत में विरोध दर्ज किया। न्यायाधीश मृदुला भाटकर के प्रति अविश्वास जताते हुए किसी और अदालत में मुकदमा चलाने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में गए।
उन्होंने महाराष्ट्र राज्य संगठित अपराध नियंत्रण कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट चले गए। इस तरह न्याय प्रक्रिया की खामियों और खूबियों को समझते हुए मुकदमे को दूसरी पटरी पर डाल कर दो साल खींच दिए। न्याय के इंतजार में नौ साल लग गए, यह बात प्रभावितों और उनके परिवारों को बेचैन कर देती है। सुनियोजित तरीके से धमाकों के दोषियों ने इस मुकदमे को लंबा खींचने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

