तीन महीने पहले एक किशोर लड़का शिमला जिले की पहाड़ियों में बसे एक छोटे से शहर रामपुर बुशहर (जिसे रामपुर भी कहते हैं) में एक गौशाला में आया। वह काम की तलाश में था, कुछ ऐसा जिससे उसे खाना और सोने की जगह मिल सके। गौशाला ने उसे ये दोनों चीजें दीं, साथ ही 6000 रुपये महीने की सैलरी भी और 19 साल का जयेश बोडाडे उस गौशाला में केयरटेकर बन गया। गौशाला के प्रधान (चीफ) पूरनचंद शर्मा को उनकी पहली बातचीत साफ याद है।

इंडियन एक्सप्रेस से फोन पर बात करते हुए शर्मा याद करते हैं, “मैंने उससे कहा था कि अगर तुम गायों की सच्ची लगन से सेवा और देखभाल करोगे, तो तुम्हारे साथ जरूर कुछ अच्छा होगा।” उस समय, उन दोनों में से किसी को नहीं पता था कि ये शब्द कितने सच साबित होंगे। तीन महीने बाद, जयेश को वह मिल गया जो उसने सालों पहले खो दिया था। वह था महाराष्ट्र के अकोला जिले में उसका घर, उसके पिता और भाई।

2018 में जयेश सिर्फ 12 साल का था, जब उसकी मां उसे और उसके भाई योगेश को लेकर चली गई थी। वे महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में शेगांव के लिए ट्रेन में बैठे। जबकि योगेश जल्द ही शेगांव छोड़कर अकोला जिले के अकोट में अपने पिता के पास लौट आया, जयेश अपनी मां के साथ रहा। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए जयेश कहता है, “मैं शेगांव में भी काम करता था।” एक दिन, उसकी अपनी मां से लड़ाई हो गई और वह शहर छोड़कर चला गया। उसने कहा, “मैं पहले तीन महीने मध्य प्रदेश में रहा, वहां कुछ दोस्त बनाए और फिर गोवा चला गया। उसके बाद, मैं दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर घूमता रहा और आखिरकार हिमाचल प्रदेश पहुंचा, जहां मैं पिछले पांच सालों से हूं।”

सुधाकर बोडाडे ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई

अकोला में घर पर, उसके पिता, सुधाकर बोडाडे ने खदान पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। लेकिन दिन महीनों में और महीने सालों में बदल गए और उसके छोटे बेटे का कोई सुराग नहीं मिला। सुधाकर कहते हैं, “आखिरकार मैंने उम्मीद छोड़ दी। मुझे अपने दूसरे बेटे का ख्याल रखना था। मैंने कड़ी मेहनत की और यह पक्का किया कि वह पढ़े। योगेश ने एजुकेशन में डिप्लोमा किया है, वह जल्द ही टीचर बन जाएगा।”

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इस बीच जयेश अकेले ही छोटी-मोटी नौकरियां करके गुजारा कर रहा था, जहां भी उसे काम मिलता था। आखिरकार, जब वह एक नौकरी से दूसरी नौकरी भटक रहा था, तो जान-पहचान वालों ने उसे उत्तर की ओर हिमाचल प्रदेश भेज दिया। जब जयेश रामपुर की गौशाला पहुंचा, तो उसने किसी को अपनी कहानी नहीं बताई। उसने यह भी नहीं बताया कि वह कहां का रहने वाला है।

कब आया टर्निंग प्वाइंट?

पूरनचंद शर्मा ने कहा, “उसने हमें कभी नहीं बताया कि वह कहां का रहने वाला है। उसने बस इतना कहा, ‘मेरा कोई नहीं है। अगर कोई ऐसा काम है जिससे मुझे खाना और रहने की जगह मिल जाए, तो मुझे बताना।’ इसलिए हमने उसे रख लिया।” दिसंबर में एक रूटीन पुलिस वेरिफिकेशन के दौरान टर्निंग पॉइंट आया। शर्मा बताते हैं कि गौशाला के आस-पास कई राज्यों के लोग रहते हैं और इलाके में तस्करी की खबरों के बाद, स्थानीय पुलिस ने मजदूरों से पहचान पत्र दिखाने को कहा।

जयेश के पास आधार कार्ड या कोई दूसरा वैलिड डॉक्यूमेंट नहीं था। उसे पूछताछ के लिए स्थानीय पुलिस चौकी ले जाया गया। यह पहली बार था जब उसने उन्हें बताया कि वह कहां का रहने वाला है। शर्मा कहते हैं, “उसने उन्हें बताया कि वह महाराष्ट्र के अकोट का रहने वाला है। तभी कनेक्शन बना।”

अकोला में खदान पुलिस स्टेशन पहले से ही ऑपरेशन मुस्कान के तहत पुराने गुमशुदगी के मामलों की फिर से जांच कर रहा था, यह एक ऐसा प्रोग्राम था जिसका मकसद लापता बच्चों का पता लगाना था। खदान पुलिस स्टेशन के पुलिस इंस्पेक्टर (PI) मनोज केदारे ने कहा, “यह मामला 2018 में दर्ज किया गया था। लड़का तब से लापता था, हमने उसे खोजने की कोशिश की, लेकिन नहीं मिला। कोई संपर्क नहीं था, कोई जानकारी नहीं थी।”

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शिमला की पुलिस ने स्थानीय पुलिस से संपर्क किया

अकोला के एसपी अर्चित चंदक कहते हैं कि जयेश के अपने गृहनगर का जिक्र करने के बाद शिमला की स्थानीय पुलिस ने अकोट पुलिस से संपर्क किया। आगे की पूछताछ से वे अकोला के मिसिंग सेल तक पहुंचे और आखिरकार खदान पुलिस स्टेशन में मूल शिकायत तक पहुंचे। 10 जनवरी को एक वीडियो कॉल हुई। केदारे कहते हैं, “मैंने खुद वीडियो कॉल पर लड़के से बात की। हमने सारी डिटेल्स लीं और फिर उसके पिता से संपर्क किया।”

केदार कहते हैं, “उसने तुरंत वापस आने की इच्छा जाहिर नहीं की। लेकिन जब हमने उससे बात की, थोड़ा भरोसा दिलाया, तो उसे एहसास हुआ कि उसका अभी भी परिवार है। मैंने उससे सीधे पूछा, ‘क्या तुम वापस आना चाहते हो?’ उसने कहा कि वह अपने पिता से मिलना चाहता है।” पुलिस की कॉल याद करते हुए सुधाकर कहते हैं, “इतने सालों बाद, पुलिस ने मुझे फोन किया और बताया कि मेरा बेटा शिमला में मिल गया है। सालों तक मैंने उसे हर जगह ढूंढा।” जब पुलिस ने उन्हें वीडियो कॉल पर जयेश को दिखाया, तो उन्होंने तुरंत उसे अपने छोटे बेटे के रूप में पहचान लिया।

आठ साल बाद मिले पिता और बेटे

पिछले हफ्ते 14-15 जनवरी को सुधाकर अकेले शिमला गए और पिता और बेटे लगभग आठ साल बाद पहली बार शिमला के एक पुलिस स्टेशन में मिले। फिर वे दोनों साथ में अकोला लौट आए। जयेश अब घर वापस आ गया है, लेकिन उसका दिल पहाड़ों के लिए तरसता है। उसने कहा, “अभी, वापस आकर अच्छा लग रहा है, लेकिन मुझे लगता है कि मैं फिर से वापस जाऊंगा। मैं यहां पूरे दिन क्या करूंगा? मुझे पहाड़ों में रहने की आदत हो गई है। मुझे यहां आराम महसूस नहीं होता। बहुत शोर है। मौसम ने मेरी सेहत पर असर डाला है। मेरे पिताजी मुझसे कहते रहते हैं कि वापस मत जाओ, लेकिन मैं उन्हें समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि मैं उनसे अक्सर मिलने आऊंगा या वे आकर मुझसे मिल सकते हैं। जब मैं बच्चा था और घर से निकला था, तो मुझे डर लग रहा था। अब, मुझे बिल्कुल भी डर नहीं लगता।”

मैं बहुत इमोशनल हो गया था- जयेश

अभी वह अपना ज्यादातर समय स्कूल के दोस्तों के साथ बिताता है। क्लास 7 तक पढ़ाई करने के बाद जयेश ने आगे पढ़ाई नहीं की। जब उससे पूछा गया कि क्या वह पढ़ना चाहता है, तो उसने कहा, “काम ही करना है।” जब उससे पूछा गया कि इतने सालों बाद अपने पिता से मिलकर उसे कैसा लगा, तो उसने कहा, “मैं बहुत इमोशनल हो गया था। मेरे पिता भी रो रहे थे। मेरा प्लान था कि साल के आखिर में वापस आकर सबको सरप्राइज दूं, उन्हें बताऊं कि मैं जिंदा हूं। लेकिन पुलिस ने पहले मेरे पिता को ढूंढ लिया।” उसकी मां का अभी तक पता नहीं चला है। रामपुर में वापस आकर, शर्मा ने उस लड़के के बारे में सोचा जो कभी उनकी गौशाला में आया था। उन्होंने कहा, “मैंने उससे कहा था कि गायों की सेवा करने से आशीर्वाद मिलता है। शायद, उसे उस सेवा का फल मिला।”